भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 872, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 872

षष्ठ लम्बक ८१५ अग्नि-प्रदक्षिणा के समय वर और वधू की शोभा कुछ इस प्रकार थी कि यदि सूर्य और चन्द्रमा दोनों एक साथ मिलकर सुमेरु पर्वत के चारों ओर भ्रमण करें, तो उस समय की शोभा की उपमा दी जा सकती है ॥२५६॥ आकाश में विवाहोत्सव में बजनेवाले वाद्यों के शब्द गूंजने लगे और नगरी में वधू द्वारा अग्नि में हवन किये गये धान के दानों का धुआं और देवताओं द्वारा बरसाये गये पुष्प फैल गये ॥२५७॥ उदार चित्तवाली कलिङ्गसेना ने रत्नों मणियों और सुवर्ण की राशि से जामाता नरवाहनदत्त को इस प्रकार सम्पन्न कर दिया जिससे प्रजा ने उसके आगे कुबेर को भी तुच्छ समझा। अन्यान्य बेचारे राजाओं की तो गणना ही क्या ? ॥२५८॥ इस प्रकार चिरकाल से अभिलषित इस योग्य पाणिग्रहण-संस्कार के भली भांति सम्पन्न हो जाने पर वे वर और वधू दोनों निर्मल लोक-हृदय में चित्रित मूर्ति के समान सुन्दरी रमणियों से भरे हुए कौतुकागार में गये ॥२५९ ॥ इस अवसर पर कौशाम्बी नगरी विशाल वाहिनियों (सेना और नदियों) के पति चिरवन्द्य वीरत्वाभिमानी पहले पराजित होने के कारण नम्र हुए और विविध प्रकार की बहुमूल्य भेंटों को उपहार-स्वरूप हाथों में लिये हुए राजाओं से इस प्रकार भर गई थी मानों चारों ओर रत्नाकर (समुद्र) ही लहरा रहा हो ॥२६० ॥ पुत्र-विवाह के इस अवसर पर वत्सराज उदयन ने प्रसन्नता के कारण इतना सोना और धन वितरित किया कि केवल माताओं के गर्भ में स्थित कन्याएं ही अलंकार-हीन रह गईं ॥२६१॥ इस अवसर पर भिन्न-भिन्न और दूर-दूर देशों से आई हुई वेश्याओं और नर्तकियों बन्दियों और भाटों के गीतों और स्तुतियों से उस नगरी का समस्त वातावरण मानों संगीत और उत्सव मय हो रहा था। नागरिक स्त्रियों द्वारा सजाई-संवारी गई अतएव अलंकार-युक्त एवं वायु से आन्दोलित पताकाओं-रूपी हाथोंवाली कौशाम्बी नगरी नृत्य करती हुई लक्ष्मी के समान लग रही थी ॥२६२-२६३॥