कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक ५९ राजा के रनिवास में अनेक पुरुष स्त्रियों के रूप में भरे हैं किन्तु यह बेचारा ब्राह्मण बिना अपराध ही मारा जा रहा है—ऐसा सोचकर मत्स्य हँसा था॥२४॥ राजा की अत्यन्त निर्विवेकिता पर हँसनवाले सब के मन्दर में रहनेवाले प्राणियों का ऐसे विचार होते हैं॥२५॥ राक्षसी की इन बातों को सुनकर मैं वहाँ से भाग आया और प्रातःकाल मैंने राजा से मछली के हँसने का कारण बता दिया॥२६॥ मेरे कथनानुसार राजा ने खोज करने पर रनिवास में रहनेवाले स्त्रीवेषधारी अनेक पुरुषों को पकड़ा। तब से मुझ अत्यधिक मानने लगा और ब्राह्मण को भी वध से मुक्त कर दिया॥२७॥ इस प्रकार की राजकीय अव्यवस्थाओं को देखकर मैं खिन्न हो रहा था कि एक बार राजा के पास एक नया चित्रकार आया॥२८॥ उसने एक चित्रपट पर महादेवी और योगनन्द का चित्र ऐसा सजीव बनाया कि वह केवल बोलने की चेष्टा से ही रहित था॥२९॥ राजा ने चित्रकार पर प्रसन्न होकर उसे भरपूर धन दिया और चित्र को अपने निजी भवन (कमरे) की दीवार पर लटकवा दिया॥३०॥ एक बार जब मैं राजा के शयन-कक्ष में गया तब उस चित्र में महारानी के सम्पूर्ण लक्षणों को देखा॥३१॥ अंगराग लक्षणों के सम्बन्ध में मैंने अपनी प्रतिभा के बल से यह जान लिया कि इसकी कमर में तिल का चिह्न होना चाहिए। मैंने चिह्न बना दिया और महारानी को सम्पूर्ण लक्षण से युक्त कर दिया॥३२॥ कुछ समय के अनन्तर राजा जब उस भवन में आया तब उसने मेरे बनाये हुए तिल-चिह्न को देखा॥३३॥ राजा ने उस तिल को देखते ही कामसूत्र के रचयिता से पूछा कि यह चिह्न किसने बनाया? उन्होंने मेरा नाम बता दिया॥३४॥ 'महारानी के गुप्त प्रदेश के इस चिह्न को मेरे बिना दूसरा नहीं जानता इसे वररुचि ने कैसे जान लिया?'॥३५॥ अतः वररुचि ने गुप्त रूप से अवश्य ही मेरी महारानी को भ्रष्ट किया है और इसलिए उसने रनिवास में स्त्रियों का रूप धारण किए हुये पुरुषों को भी देखा होगा॥३६॥ ऐसा सोचकर योगनन्द क्रोध से जलने लगा। सच है मूर्खों में शंका करने वाले अनुगामी ही होते हैं॥३७॥ तब महाराज ने सकटाल को एकान्त कक्ष में बुलाकर कहा कि वररुचि ने महारानी का सतीत्व-भंग किया है। अतः तुम उसे मार डालो ॥३८॥ १ अरेबियन नाइट्स में शहरयार के अन्तःपुर में इसी प्रकार स्त्री-वेषधारी पुरुषों के रहने की चर्चा आती है। २ शेक्सपियर के नाटक सिम्बेललाइन में भी ऐसी शंका का उत्पन्न होना दीखता है।