कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextप्रथम लम्बक ६१ 'जो आज्ञा'-ऐसा कहकर शकटाल अपने घर आकर सोचने लगा कि मुझमें वररुचि को मारने की शक्ति नहीं है॥३९॥ उसका बुद्धि-प्रभाव अलौकिक है। उसने मुझे मृत्यु से बचाया है। फिर वह ब्राह्मण है। अतः इस समय इसे गुप्त रखकर (वध की आज्ञा) स्वीकार कर लेता हूँ॥४०॥ ऐसा सोचकर उसने राजा के अकारण क्रोध और मेरी वधाज्ञा मुझे सुनाकर कहा॥४१॥ 'मैं हण्ड्य मशान में किसी डिण्डी चोर को मारकर तुम्हारे वध की घोषणा कर देता हूँ। तुम मेरे घर में छिपकर रहो और उस पापी राजा से मेरी रक्षा करो'॥४२॥ इस प्रकार शकटाल के कहने पर मैं गुप्त रूप से उसके घर में रहने लगा। उसने मेरा वध प्रचारित करने के लिए रात में किसी अन्य का वध करा दिया॥४३॥ इस प्रकार, नीति प्रयोग करनेवाले शकटाल को मैंने एक दिन प्रेमपूर्वक कहा कि 'एक मन्त्री तुम हो जिसने मेरे मारने का विचार नहीं किया॥४४॥ मैं मारा भी नहीं जा सकता क्योंकि मेरा मित्र राक्षस है जो स्मरण करते ही उपस्थित होकर पल-भर में मेरी इच्छा से सारे विश्व का नाश कर सकता है॥४५॥ राजा नन्द मेरा इन्द्रदत्त नामक मित्र है और ब्राह्मण है। अतः वह भी मेरे लिए वध्य नहीं है। शकटाल ने कहा कि 'उस राक्षस को मुझे दिखाओ'॥४६॥ तब स्मरण करते ही आये हुए राक्षस को मैंने उसे दिखा दिया उसे देखकर शकटाल आश्चर्य-चकित और भयभीत हुआ॥४७॥ गुग्गल कौन है? राक्षस के अन्तर्धान होने पर शकटाल ने प्रश्न किया कि 'यह राक्षस तुम्हारा मित्र कैसे हुआ'? ॥४८॥ तब मैंने कहा 'बात जिस प्रकार से हुई वह सुनो। रात को भ्रमण (गश्त) करते हुए प्रतिदिन एक-एक नगर रक्षक (शहर कोतवाल) मारा जाता था॥४९॥ परस्पर परास्त हुए राजा नन्द ने एक बार जब ही नया नगर रक्षक (कोतवाल) बना दिया। तब व्याकुल होकर (नगर रक्षक बनकर) मैंने उस राक्षस को देखा। उसने मुझे देखकर कहा कि 'बताओ इस नगर में सब से सुन्दरी स्त्री कौन है'? तब मैंने हँसकर गुप्त रूप से कहा॥५०॥ 'जो दूसरे को अच्छी दिखाई पड़ती है वही उसके लिए सुन्दरी है।' इस प्रश्न का उत्तर दे कर उसके चंगुल से छूटे हुए भागे हुए को फिर उसने—'हे नगर रक्षक! तुम बड़े चतुर हो' फिर इस प्रकार की वार्तालाप सुनकर हिंसामुखी बात से छुड़ा दिया तथा उपदेश दिया—॥५१॥