भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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सप्तम लम्बक ७९ चतुर्थ तरङ्ग राजा विक्रमादित्य और मदनमाला वेश्या की कथा गोमुख से कही गई कथा को सुनकर प्रसन्न हुए नरवाहनदत्त को देखकर उससे मरुभूति बोला— 'स्त्रियाँ अविशङ्कत अवश्य ही चंचल (दुराचारिणी) होती हैं—यह कोई निश्चित बात नहीं है। ऐसी वेश्याएँ भी देखी जाती हैं जो सत्त्वगुणशाली (सदाचारिणी) होती हैं। दूसरी स्त्रियों की तो बात ही क्या ? ॥१-२॥ महाराज ! मैं इस विषय में एक प्रसिद्ध कथा सुनाता हूँ सुनिए—। पाटलिपुत्र नगर में विक्रमादित्य नामक राजा था। उसके दो परम प्रिय मित्र राजा थे। एक का नाम हयपति और दूसरे का गजपति था। इन दोनों राजाओं की सेना में हाथी और घोड़े प्रचुर मात्रा में थे ॥३-४॥ उस राजा विक्रम का एकमात्र शत्रु प्रतिष्ठानपुर का बलवान्-राजा नरसिंह था जो उसके वश में नहीं आया था ॥५॥ राजा विक्रम उस शत्रु के प्रति क्रोध करके और मित्र राजाओं के घोड़ों और हाथियों की शक्ति पर विश्वास करके आवेश में यह प्रतिज्ञा कर बैठा कि मुझे प्रतिष्ठान-नरेश पर ऐसी विजय प्राप्त करनी है कि वह मेरे द्वार पर आने और भृत्यों द्वारा सेवकों के समान सूचना दिये जाने पर प्रवेश पा सके ॥६-७॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके हयपति और गजपति नामक दोनों मित्रों से सम्मति करके उनके साथ ही हाथी-घोड़ों से पृथ्वी को रौंदता हुआ अपनी समस्त सेना के साथ प्रतिष्ठान-नरेश पर अवज्ञा के साथ चढ़ गया ॥ ८-९॥ विक्रम की चढ़ाई का समाचार सुनकर राजा नरसिंह भी अपने पैदल सैनिकों के साथ युद्ध के लिए समरभूमि में निकल आया ॥१० ॥ वहाँ उन दोनों का आश्चर्यजनक घमासान युद्ध हुआ जिसमें पैदल सैनिक घोड़ों और हाथियों के साथ लड़े ॥११॥ क्रमशः नरसिंह के एक करोड़ पैदल सैनिकों से विक्रम की सेना हार गई और भाग गई विक्रमादित्य भी भागकर पाटलिपुत्र में चला आया और उसके मित्र अश्वपति (हयपति) तथा गजपति भी सब अपनी-अपनी राजधानियों को चले गये ॥१२-१३॥ शत्रु पर विजय प्राप्त किया हुआ राजा नरसिंह भी विजयलक्ष्मी के साथ बन्दी-चारणों से स्तुति किया जाता हुआ अपने प्रतिष्ठान नगर में गया ॥१४॥