कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक १८९
इस कारण कन्या ने अपना अपमान समझा और जंगल में जाने की सोचने लगी। एकबार वह भ्रमण के बहाने नगर के बाहर उद्यान में गई। वहाँ सेवकों के मद्य-पान से उन्मत्त हो जाने पर वह वृक्ष की झुरमुट में छुपकर उनकी आँखों से ओझल हो गई ॥१४० - १४१॥
अकेली ही जंगल में जाती हुई वह बहुत दूर निकल गई और वहाँ एक पर्णकुटी बनाकर फल-मूल खाती हुई वह शंकर की आराधना में तन्मय हो गई ॥१४२॥
उसके पिता उस राजा ने अपनी पुत्री को कहीं चली गई समझकर उसे बहुत ढूँढ़वाया और उसके न मिलने पर राजा को बहुत कष्ट हुआ ॥१४३॥
बहुत दिनों के पश्चात् कष्ट के कुछ शान्त हो जाने पर मनोरंजन करने के निमित्त वह राजा बुद्धिप्रभ शिकार खेलने के लिए निकला ॥१४४॥
और, जंगल में भटकता हुआ वह दैवयोग से बहुत दूर उस दूसरे जंगल में पहुँच गया जहाँ उसकी कन्या हेमप्रभा तपस्या करती हुई रहती थी। राजा को वहाँ कुटी दिखाई पड़ी उसके भीतर निःशंक भाव से प्रवेश करने पर राजा ने देखा कि उसी की पुत्री हेमप्रभा तपस्या करती हुई