भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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वेला नामक एकादश लम्बक [प्रारम्भिक पद्य का अर्थ सप्तम लम्बक के प्रथम तरङ्ग के प्रारम्भ में देखें।] प्रथम तरङ्ग मङ्गलाचरण निज भक्तों के समस्त दुःखों और विघ्नों को दूर करनेवाले समस्त सिद्धियों के देनेवाले और पाप-रूपी समुद्र से पार लगानेवाले गजानन को प्रणाम है॥१॥ नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) वत्सराज उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त इस प्रकार शक्तियशा नाम की पत्नी को पाकर मदनमञ्चुका आदि पहली रानियों के साथ कौशाम्बी नगरी में अपने मित्रों के सहित पिता के पास रहता हुआ आनन्द-विलास करता था॥२-३॥ रुचिरदेव और पोतक की कथा एक बार जब वह उद्यान में भ्रमण कर रहा था कि अकस्मात् दो राजपूत-बन्धु उसके पास आये॥४॥ नमस्कार, आतिथ्य आदि शिष्टाचार के अनन्तर उन दोनों में से एक ने कहा—'हम दोनों वैशाल नगर के राजा के दो सौतेले पुत्र हैं॥५॥ मेरा नाम रुचिरदेव और इस दूसरे का नाम पोतक है। मेरे पास तेज चलनेवाली एक हथिनी है और इसके पास दो घोड़े हैं ॥६॥ इन पशुओं के कारण हम दोनों में विवाद उत्पन्न हो गया है। मैं कहता हूँ कि हथिनी तेज चलती है और यह कहता है घोड़े ॥७॥