भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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श्री आचार्य जिनवचन्द्र ज्ञान भण्डार ७ सांगा भवन घी का रास्ता, जयपुर सिटी ( राजस्थान ) रत्नप्रभा नाम सप्तमो लम्बकः इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्थराक्ष्णोत्थना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम् । प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसावेन ते ॥ रत्नप्रभा नामक सप्तम लम्बक नगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-मन्थराक्षक के मन्थन द्वारा शिवजी के मुख रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रहपूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्य पद लाभ करते हैं। श्रीमान् सेठशंकर भाइ दुर्लभजी द्वारा उनके सुपुत्र रश्मिकान्त के शुभ विवाह पर भेंट ।