कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक १४५ क्या तुम यह भूल गये कि उस समय मैंने ही तुझे राजा बनाया था। यह सुनकर वह राजा वज्र उस वैद्य से बोला ॥७७॥ अरे ! तू बड़ा ही मूर्ख है। कौन किसका बनाता या बिगाड़ता है ? पूर्वजन्म के कर्म ही देते और बनाते हैं। इसलिए तू घमण्ड न कर । यह राज्य तो मेरे तप से प्राप्त हुआ है। यह मैं शीघ्र ही तुझे प्रत्यक्ष दिखलाऊँगा' ॥७८-७९॥ राजा से इस प्रकार फटकारा गया वैद्य तरणचन्द्र सोचने लगा कि यह मेरे साथ डिठाई नहीं कर रहा है और वीरता के साथ ज्ञानी के समान बातें कर रहा है ॥८० ॥ रहस्य की बातों में अन्तरंग बनना और वह भी इसमें सम्भव नहीं है तो भी मुझे इसके पीछे-पीछे ही चलना चाहिए। यह भी देखता हूँ कि यह मुझे प्रत्यक्ष क्या दिखलायेगा ? यह सोचकर वैद्य उसकी बात मानकर चुप हो गया ॥८१-८२॥ किसी दूसरे दिन राजा वज्र, टहलने के लिए तरणचन्द्र आदि मित्रों के साथ बाहर निकला ॥८३॥ टहलते-टहलते वह नदी के किनारे पहुँचा और उसने नदी के बीच धारा में बहते हुए सोने के पाँच कमल देखे ॥८४॥ राजा ने नौकरों से उन कमलों को मँगवाकर हाथ में रखकर और देखकर पास में खड़े तरणचन्द्र वैद्य से कहा — तुम अभी नदी के किनारे-किनारे ऊपर की ओर जाओ और इन सोने के कमलों का उत्पत्ति-स्थान खोजो ॥८५-८६॥ उसे देखकर तुम मेरे पास आओ मुझे उन सोने के कमलों के लिए बहुत उत्सुकता हो रही है। और तुम मेरे चतुर मित्र हो ॥८७॥ ऐसा कहकर राजा से भेजा गया वह विप्र वैद्य की आज्ञा तथा कहकर राजा के बताये मार्ग से चला गया और राजा अपने महल में लौट आया। कमलों को खोजता हुआ वह वैद्य नदी के तट पर स्थित एक शिव-मन्दिर में पहुँचा ॥८८-८९॥ वैद्य ने नदी के उद्गम-स्थान पर सरोवर के किनारे एक पत्र-बहुल वट को देखा और उसने उस पर लटकते हुए नरकंकाल को भी देखा ॥ ९० ॥ वैद्य उस नरकंकाल को प्रणाम करके देवता का पूजन करके जैसे ही जल से ... ९