कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक २५ बिना कारण यह घटना कैसे हुई। इसलिए दूत भेजकर सुखधन को बुलवाना चाहिए। देखिए, वह इस विषय में क्या कहता है ? ॥१११ ॥ मन्त्री की सम्मति मानकर राजा बाहुबल ने सुखधन के पास पूछने के लिए दूत भेज दिया। जब राजा की आज्ञा से दूत ने आकर उससे पूछा तब अर्थलोभ की पत्नी मानपरा ने स्वयं सारा समाचार उसे सुनाया ॥१११-११२॥ इस आश्चर्यमय वृत्तान्त को सुनकर और मानपरा के रूप को देखने के लिए राजा अर्थलोभ को साथ लेकर सुखधन के घर पर आया ॥११३॥ वहाँ सुखधन के प्रणाम स्वीकार करते हुए उसने मानपरा को देखा जो अपने लावण्य से ब्रह्मा को भी चकित करनेवाली थी ॥११४॥ पैरों पर पड़ी हुई मानपरा ने राजा के पूछने पर, अर्थलोभ के सामने ही अपना वृत्तान्त स्वयं कहने लगी। उसका कथन सुनकर, उसे सत्य समझकर और अर्थलोभ के चुप हो जाने पर, राजा ने मानपरा से पूछा कि 'हे सुन्दरी ! अब क्या होना चाहिए ? ॥११५-११६॥ तब वह बोली—'महाराज ! जिस लोभी ने बिना किसी आपत्ति या संकट के आये ही मुझे सिर्फ लोभ से बेच डाला ऐसे लोभी पिशाच के पास फिर कैसे जाऊँ ? ॥११७॥ यह सुनकर जब राजा ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार किया तब काम-क्रोध और लज्जा से भरा हुआ अर्थलोभ बोला—॥११८॥ 'महाराज ! मैं और सुखधन दोनों किसी अन्य की सहायता के बिना अपनी-अपनी सेना से युद्ध करें। आप दोनों के बलाबल का निरीक्षण करें ॥११९॥ अर्थलोभ की बातों को सुनकर सुखधन बोला—'यदि ऐसा हो तो सेना की क्या आव- श्यकता है। हमीं दोनों परस्पर द्वन्द्व-युद्ध करके निपटारा कर लें ॥१२० ॥ इस द्वन्द्व-युद्ध में जो विजयी होगा मानपरा उसी की होगी। यह सुनकर राजा ने भी कहा कि 'ठीक है। यही हो' ॥१२१॥ तदनन्तर, राजा और मानपरा के समक्ष दोनों घोड़े पर चढ़कर युद्ध-भूमि में उतरे। युद्ध में गदाओं से लड़ते हुए उन दोनों में सुखधन ने अर्थलोभ को गदा की मार से पृथ्वी पर गिरा दिया ॥१२२-१२३॥ इसी प्रकार, उसने अर्थलोभ को तीन बार गिराया और उसके घोड़े को मार डाला किन्तु धार्मिक सुखधन ने जबलोभ को प्राणों से वियुक्त नहीं किया ॥१२४॥