भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 320

अष्टम लम्बक १८९ तदनन्तर क्रमशः सभी पाताल के दैत्यों और दानवों के सरदार यहाँ आने लगे। सबसे पहले राजा बलि अगणित असुरों के साथ आया उसके बाद जम्भीक नामक दैत्यराज तथा महा बलवान् दुरारोह नामक दैत्यराज आये। सुमाय तप्तकच्छ विकटाक्ष प्रकम्पन धूमकेतु और महामाय नामक दैत्यराज भी सहस्रों अनुयायियों के साथ वहाँ आये। सारा सभा-भवन परस्पर नमस्कार करते हुए उनसे भर गया और अपने-अपने पद के क्रमानुसार बैठे हुए उनका प्रह्लाद ने स्वागत किया ॥२२३-२२६॥ भोजन का समय आने पर वे सब मय आदि के साथ गंगा-स्नान करके भोजन के लिए विशाल भवन में एकत्र हुए ॥२२७॥ यह भोजन-भवन चार सौ कोस तक फैला हुआ था इसकी भूमि सोने और रत्नों से जड़ी हुई थी। इसमें रत्नों के खंभे लगे हुए थे और अनेक रंगों के मणियों के भोजन-पात्र सजे हुए थे ॥२२८॥ वहाँ पर मय सुनीथ और सचिवों के साथ सूर्यप्रभ आदि सहित समस्त असुरों ने नाना प्रकार के भक्ष्य भोज्य लेह्य आदि षड्रस पदार्थों का भोजन किया और अन्त में विविध पेय पदार्थों का पान किया ॥२२९-२३०॥ भोजन-पान के पश्चात् वे सब रत्नों से जगमगाते हुए सभा-मंडप में बैठे और दैत्यों एवं दानवों की कन्याओं का नाच देखने लगे ॥२३१॥ महस्तिका का प्रेम इसी नाच के प्रसंग में प्रह्लाद की आज्ञा से नाचती हुई उसकी कन्या महस्तिका को सूर्यप्रभ ने देखा ॥२३२॥ वह महस्तिका अपनी अद्भुत कान्ति से चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी और आँखों के लिए अमृत की वर्षा कर रही थी। ऐसा लगता था मानों चन्द्रमा की मूर्ति पाताल देखने के कौतुक से यहाँ उतर आई हो ॥२३३॥ वह मस्तक पर सुन्दर तिलक लगाए हुए थी पैरों में सुन्दर नूपुर, पायजेब आदि पहने हुए थी। उसका मुख मुस्कराता हुआ था मानों ब्रह्मा ने उसे नृत्यमयी ही बनाया था ॥२३४॥ घुँघराले बालों शुभ्र दाँतों और वक्षःस्थल को घेरे हुए स्तन-मंडलों से वह मानों नवीन नृत्य की सृष्टि कर रही थी ॥२३५॥ उस सुन्दरी ने देखते ही अन्य स्त्रियों से हरण किये हुए सूर्यप्रभ के मन का हठात् हरण कर लिया ॥२३६॥ उस महस्तिका ने असुरेन्द्रों के मध्य बैठे हुए सूर्यप्रभ को इस प्रकार देखा मानों शिव के द्वारा कामदेव के भस्म किये जाने पर विधाता ने दूसरे कामदेव की रचना की हो ॥२३७॥ १७