भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सैंथम लम्बक १०७ इस प्रकार सूर्यप्रभ के कहने पर महस्तिका क्रोध से बोली—'मेरे ही सामने प्रतिदिन नई-नई स्त्रियों से विवाह कर रहे हो और मेरी सहेलियों को नहीं चाहते ? ॥३५७॥ मैं उनके वियोग में एक क्षण भी मनोरंजन नहीं कर सकती ।—महस्तिका के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ ने उसकी बात मान ली ॥३५८॥ तब प्रह्लाद की पुत्री ने उसे पहले पाताल में से लाकर उन सब कन्याओं को क्रमशः सौंप दे दिया। सूर्यप्रभ ने भी उन विद्याधराओं का रात्रियों में क्रमशः उपभोग करना प्रारम्भ किया ॥३५९-३६०॥ प्रातः काल ही सूर्यप्रभ ने महस्तिका से पूछकर प्रभास द्वारा उन कन्याओं को रसातल में पहुँचाकर छिपा दिया ॥३६१॥ वह स्वयं भी अदृश्य होकर महस्तिका के साथ वहाँ जाता था। एक बार सभा में प्रह्लाद ने मय एवं सुनीथ से कहा कि तुम सब दिति और दनु माताओं का दर्शन करने के लिए जाओ ॥३६२-३६३॥ 'जो आज्ञा' कहकर मय सुनीथ और सूर्यप्रभ तीनों रसातल से निकलकर यथासम्भव असुरों के साथ ध्यान करते ही उपस्थित भूतासन विमान पर बैठकर, सुमेरु शिखर पर स्थित कश्यप के आश्रम को गये ॥३६४॥ वहाँ पर आदर के साथ ऋषियों द्वारा सूचित करने पर वे लोग एक साथ बैठी हुई दिति और दनु को देखकर प्रसन्न हुए और क्रमशः वे लोग उनके चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम करने लगे ॥३६५॥ उन दोनों असुरों और दानवों की माताओं ने अपने साथियों के साथ आये हुए पुत्र मय को देखकर आदर प्रकट किया और प्रसन्नतापूर्वक आँसू बहाते हुए आशीर्वाद दिया ॥३६६॥ और कहा—पुत्र पुनर्जीवित सुनीथ के साथ तुम्हें देखकर हम दोनों को अपार आनन्द हुआ। हमारे नेत्र सफल हुए और हम तुम्हें पुण्यवान् (धन्य) समझती हैं और सूर्यप्रभ के रूप में दिव्य तेज धारी असाधारण गुणों से युक्त और भावी कल्याण से पूर्ण सुमुण्डीक को देखकर सन्तोष के कारण हम लोगों का आनन्द शरीर में नहीं समा रहा है ॥३६७-३६८॥ हे पुत्रो, अब तुम शीघ्र उठो और आर्यपुत्र कश्यप प्रजापति का दर्शन करने जाओ। उनके दर्शन से तुम्हारी कार्यसिद्धि होगी और उनकी बातों का मानना तुम्हारे कल्याण के लिए होगा' ॥३६९॥

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