कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक १२३ इस तिथि में विद्याधर-चक्रवर्ती के लक्षण प्रकट होते हैं। इसलिए, सभी विद्याधर इस तिथि को यहाँ आते हैं ॥५२॥ सुमेरु के इस प्रकार कहने पर वे सब उस दिन सेना का प्रबन्ध करके प्रातःकाल ही सेनाओं के साथ रथों द्वारा वल्मीक ग्राम को गये ॥५३॥ हिमाचल के रजत शशिन शिखर पर सेनाओं के कोलाहल के साथ उन लोगों ने बहुत-से विद्याधरों को देखा ॥५४॥ वे विद्याधर यहाँ कुंडों में अग्नि जलाकर हवन करने में लग गये और बहुत-से विद्याधर जप करने लगे ॥५५॥ तब सूर्यप्रभ ने भी वहाँ एक विशाल अग्निकुंड बनवाया। उसमें उसकी विद्या के प्रभाव से स्वयं ही अग्नि जल उठी ॥५६॥ यह सुनकर सुमेरु को अत्यन्त सन्तोष हुआ और विद्याधर ईर्ष्या से जल उठे। तदनन्तर, उनमें से एक ने कहा— हे सुमेरु, तुम्हें धिक्कार है कि तुम विद्याधरों का राजत्व छोड़कर सूर्यप्रभ मनुष्य का अनुचरण कर रहे हो ॥५७-५८॥ यह सुनकर क्रुद्ध सुमेरु ने उसे खूब फटकारा और सूर्यप्रभ द्वारा उसका नाम पूछे जाने पर सुमेरु ने कहा— भीम नाम का एक विद्याधर है, उसकी पत्नी की ब्रह्मा ने कामना की थी उसी से यह उत्पन्न हुआ है। चूंकि ब्रह्मा के साथ गुप्त रूप से व्यभिचार करने पर यह उत्पन्न हुआ है इसी से इसका नाम ब्रह्मगुप्त है। इसलिए, अपने जन्म के समान ही वचन यह बोल रहा है ॥५९-६१॥ ऐसा कहकर सुमेरु ने भी अग्निकुंड बनवाया तब सूर्यप्रभ ने उसके साथ ही अग्नि में हवन किया ॥६२॥ क्षण-भर में ही पृथ्वी के एक छिद्र से एक भीषण और विशाल अजगर निकला उसे देखकर वह ब्रह्मगुप्त नामक विद्याधरों का राजा घमंड के साथ उसे पकड़ने के लिए दौड़ा जिसने सुमेरु की निन्दा की थी ॥६३-६४॥ उसे अजगर ने अपनी एक फुफकार से ही सूखे पत्ते की तरह सौ हाथ दूर फेंक दिया ॥६५॥