कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक २११ उसके पास मोहिनी विद्या है, जिसके कारण वह जीता नहीं जा सकता। अनुमान है कि उस विद्या को उसने अवश्य ही प्रधान शत्रु के लिए सुरक्षित रखा होगा॥११०॥ इसीलिए, उसने तुम्हारे इन मित्र पर इस समय उसका प्रयोग नहीं किया, क्योंकि वह उस विद्या का एक ही बार प्रयोग कर सकता है, बार-बार नहीं॥१११॥ चंड-दंड ने गुरु पर ही उस विद्या का प्रभाव जानने के लिए उसका प्रयोग किया था। अतः गुरु ने ही उसे वैसा शाप दिया॥११२॥ यह विचारणीय है। ऐसी विद्याओं का प्रभाव कठिनाई से ही प्राप्त होता है। इसका कारण आप लोग मय से पूछें। उसके रहते मैं क्या कहूँ। सूर्य के सामने दीपक की क्या बात है? सूर्यप्रभ से सुमेरु के ऐसा कहने पर मय ने कहा—॥११३-११४॥ 'सुमेरु ने सच कहा है, इसे मैं बताता हूँ, सुनो। अव्यक्त परमात्मा से वे शक्तियाँ और अनुषक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। उसी अव्यक्त से बिन्दु-मात्र पर आवृत्त प्राण-शक्ति का उद्गम हुआ। वही परमात्मतत्त्व की कला से युक्त होकर विद्या के मन्त्रों का रूप धारण करती है॥११५-११६॥ उन्हीं मन्त्र-विद्याओं के ज्ञान में या तप से अथवा सिद्धा की आज्ञा से सिद्धि प्राप्त करने वालों का प्रभाव बहुत कठिन हो जाता है॥११७॥ तो हे पुत्र, तूने सभी विद्याओं की साधना तो कर ली और वे सिद्ध भी हो गईं। किन्तु, दो विद्याएँ अभी तुझे नहीं आईं—एक मोहिनी और दूसरी परिवर्त्तिनी। इनकी सिद्धि तूने नहीं की है॥११८॥ इन दोनों विद्याओं को याज्ञवल्क्य ऋषि जानता है। अतः उसके समीप जाकर उससे प्रार्थना करो। मय के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ याज्ञवल्क्य ऋषि के पास गया॥११९॥ उस मुनि याज्ञवल्क्य ने सूर्यप्रभ को सात दिनों तक अग्नि में रखकर तपस्या कराई॥१२०॥ ज्वाला के दर्शन का सहन किये हुए सूर्यप्रभ को सात दिनों में मोहिनी विद्या और तीन दिनों तक अग्नि-ताप सहन कर लेने पर विपरिवर्त्तिनी विद्या उस थी॥१२१॥ विद्या प्राप्त कर लेने पर मुनि ने उसे फिर अग्नि-कुण्ड में प्रवेश करने के लिए कहा और उसने आज्ञानुसार अग्नि में प्रवेश किया॥१२२॥ उसी क्षण सूर्यप्रभ को इच्छानुसार चलनेवाला महापद्म नामक आकाश-यान प्राप्त हुआ। यह विशाल एक सौ आठ पंगोंवाला था और एक-एक पग में एक-एक नगर था। इस प्रकार, सौ नगर उसमें बने थे। अनेक प्रकार के रत्न उसमें जड़े हुए थे और विचित्र प्रकार से उसकी रचना की गई थी॥१२३-१२४॥