भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक ३५५ यद्यपि शत्रु की सेना में सैनिक योद्धा हमसे अधिक हैं, फिर भी शिवजी की कृपा से वे हमारी सेना के लिए पर्याप्त नहीं हैं ॥३३॥ इस प्रकार, मय दानव अपने ज्येष्ठ पुत्र सुनीथ को जब अपनी शक्ति का परिचय दे रहा था, इतने में ही श्रुतशर्मा के पिता द्वारा भेजा हुआ दूत उसके समीप आया ॥३४॥ और कहने लगा—'त्रिकूटाधिपति ने आपको यह सन्देश दिया है कि संग्राम शूर-वीरों का महोत्सव है ॥३५॥ किन्तु, इस संग्राम-महोत्सव के लिए यह भूमि छोटी है, अतः हमलोग विस्तृत मैदानवाले कलापग्राम में चलें इसलिए यहाँ से आप वहीं आवें' ॥३६॥ यह सन्देश सुनकर सुनीथ आदि ने इस बात को स्वीकार किया और सूर्यप्रभ आदि सभी कलापग्राम को गये ॥३७॥ इसी प्रकार युद्ध के लिए तत्पर श्रुतशर्मा आदि भी विद्याधर-सेना के साथ उसी स्थान पर पहुँचे ॥३८॥ श्रुतशर्मा की सेना में हाथियों को देखकर सूर्यप्रभ आदि ने विमानों द्वारा अपने हाथी मँगवाये ॥३९॥ तदनन्तर, श्रुतशर्मा के सेनापति विद्याधरराज दामोदर ने अपनी सेना में महासूचीव्यूह की रचना की ॥४०॥ उस व्यूह के पार्श्व में श्रुतशर्मा स्वयं मन्त्रियों के साथ खड़ा हुआ और उसके अग्रभाग में दामोदर सेनापति था तथा अग्रगण्य विशेष स्थानों में और और विद्याधर-राजा थे ॥४१॥ उधर सूर्यप्रभ के सेनापति प्रभास ने अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया और उसके बीच स्वयं रहा। व्यूह के दोनों कोनों पर कुम्भीरवार और प्रहस्त खड़े थे। सूर्यप्रभ और सुनीथ आदि व्यूह के पृष्ठ भाग में उनकी रक्षार्थ तत्पर हुए ॥४२-४३॥ सुमेरु और श्रुतशर्मकुमार के इन व्यूहों के समीप खड़े होने पर दोनों सेनाओं में रण भेरी बज उठी ॥४४॥ भयङ्कर युद्ध देखने के कौतुक से आये हुए चारणादि देवताओं, सिद्धगणों और अप्सराओं से स्थान भर गया ॥४५॥ पार्वती के साथ शिवजी स्वयं भी आये। उनके पीछे देवता गण, मातृगण एवं भूत प्रेत आदि भी थे ॥४६॥

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