भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक १९५ बिना पाप किये मेरी प्रशंसनीय मृत्यु श्रेष्ठ है। किन्तु, पाप करके निन्दित राज्यासन भोगना अच्छा नहीं ॥५९॥ ऐसा सुनकर वह रानी फिर बोली—'तू मेरी और अपनी आत्मा के साथ विद्रोह मत कर। मैं कहती हूँ सुन—॥६०॥ यह राजा मेरी असंभव बात का भी नहीं टालता। इसलिए, मैं उससे निवेदन करके तुझे किसी देश का राज्य दिला दूँगी। और, सभी सामन्तों को तुम्हारा अनुयायी बना दूँगी। इससे तुम गुणों से उज्ज्वल राजा बन जाओगे ॥६१-६२॥ तब तुझे भय नहीं रहेगा। तुझे कौन और कैसे अपमानित करेगा। इसलिए, शंका छोड़ कर मेरा उपभोग कर। नहीं तो जीवित न रहूँगी' ॥६३॥ गुणशर्मा ने रानी को इतना आग्रह करती हुई देखकर उस समय को टालने के लिए युक्ति पूर्वक कहा—॥६४॥ यदि तेरा अत्यन्त आग्रह ही है तो तेरी बात सफल करूँगा किन्तु रहस्य खुलने के भय से सहसा ऐसा करना उचित नहीं। इसलिए कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करो। मेरी बात मान जाओ। तेरा विरोध करके मैं शत्रुता नहीं मोल ले सकता ॥६५-६६॥ इस प्रकार भविष्य की आशा से उसे सन्तुष्ट करके और उससे पुनर्मीलन का वचन लेकर लम्बी साँस लेता हुआ गुणशर्मा किसी प्रकार वहाँ से बाहर निकला ॥६७॥ तदनन्तर कुछ दिनों के बीतने पर राजा महासेन ने किले में बैठे हुए राजा सोमेश्वर को चढ़ाई करके घेर लिया ॥६८॥ महासेन को उधर फँसा हुआ देखकर गौड़देश के राजा विक्रमशक्ति ने चढ़ाई करके उसे (महासेन को) घेर लिया ॥६९॥ तब महासेन ने गुणशर्मा से कहा—'जबकि हम एक राजा को घेरकर बैठे हैं तभी दूसरे शत्रु द्वारा घेर लिए गये। अब दोनों से एक साथ युद्ध करने में असमर्थ हम लोग संकट में पड़ गये हैं। और बिना युद्ध किए भी कब तक घर में घिरे रहेंगे ॥७०-७१॥ अब इस संकट-काल में हमें क्या करना चाहिए ? राजा के इस प्रकार पूछने पर गुणशर्मा ने उससे कहा—॥७२॥ 'स्वामी धैर्य रखें। मैं इसका उपाय करता हूँ जिससे कि आप इस संकट को पार कर सकें ॥७३॥