भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ४६५

एक बार उन दोनों बालकों ने आश्रम के एक मृग को मारकर उसका मांस खा डाला और मुनि वाल्मीकि के पूजन करने के शिवलिङ्ग को बिछौना बनाकर खेल डाला ॥९५॥ इस कारण मुनि खिन्न हुए, तो सीतादेवी ने उनसे क्षमा-प्रार्थना की। तब मुनि ने उन दोनों के लिए इस प्रकार प्रायश्चित्त की आज्ञा दी ॥९६॥ 'यह लव कुबेर के सरोवर में जाकर सोने के कमल ले आवे और उसके उद्यान से मंदार के पुष्प। उनसे ये दोनों भाई इस शिवलिङ्ग की पूजा करें तो इस पाप की शान्ति होगी' ॥९७-९८॥ यह सुनते ही उस बालक लव ने कुबेर के सरोवर और उद्यान पर धावा बोल दिया और उसके रक्षक यक्षों को मारकर कमल और मन्दार-पुष्प प्राप्त किये। उन्हें लेकर लौटते समय मार्ग में श्रान्त होने के कारण उसने एक वृक्ष के नीचे विश्राम किया ॥९९-१००॥ इसी बीच राम के नरमेध यज्ञ में किसी अच्छे लक्षणोंवाले पुरुष को ढूँढ़ता हुआ लक्ष्मण उधर आ निकला ॥१०१॥ वह (लक्ष्मण) युद्ध के लिए ललकारे हुए लव को सम्मोहनास्त्र से मोहित करके क्षात्र धर्म के अनुसार उसे बाँधकर अयोध्या नगरी को ले गया ॥१०२॥ उधर लव के आने में विलम्ब होने पर दुःखित सीता को धैर्य देकर ज्ञानी वाल्मीकि ने अपने आश्रम में कुश से कहा—॥१०३॥ 'पुत्र! लव को लक्ष्मण पकड़कर अयोध्या ले गया है। तू जा और इन दिव्य अस्त्रों से उसको जीतकर और लव को छुड़ाकर ले आ' ॥१०४॥ मुनि के ऐसा कहने पर दिव्य अस्त्रों से युक्त कुश अयोध्या गया और युद्ध करते हुए उसने यज्ञभूमि को घेर लिया ॥१०५॥ और युद्ध करने के लिए आये हुए लक्ष्मण को उसने दिव्य महान् अस्त्रों से जीत लिया। तब राम ने उस पर आक्रमण किया किन्तु वाल्मीकि मुनि के प्रभाव से राम भी उसे अपने अस्त्रों से जीत न सके। तब राम ने कुश से पूछा-'तुम कौन हो ? ॥१०६-१०७॥ तब कुश ने कहा-'लक्ष्मण ने मेरे बड़े भाई लव को बाँध लिया है उसे यहाँ लाओ। मैं उसे छुड़ाने के लिए ही यहाँ आया हूँ ॥१०८॥ हम लव और कुश दोनों राम के पुत्र हैं। ऐसा माता जानकी कहती हैं। इतना कहकर फिर उसने अपना समाचार कहा ॥१०९॥ ५९