भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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तदनन्तर उस नगर में रहते हुए राजा पृथ्वीरूप ने अपने साथियों के साथ उस द्वीप के अनुसार भोजन-पान आदि स्वीकार किया ॥१८४॥ नाच-गान में दिन व्यतीत करके राजा पृथ्वीरूप रात को उत्कण्ठा के साथ रूपलता के शयन-भवन में गया ॥१८५॥ उस शयनागार में रत्नों से जड़ा हुआ पलंग बिछा था। शयनागार की भूमि भी रत्नों से जड़ी हुई थी। भवन के मध्य में रत्नों से जड़े हुए खम्भे चमक रहे थे और भवन रत्नों के दीपों से जगमगा रहा था ॥१८६॥ उस शयनागार में वह युवा राजा पृथ्वीरूप उस रूपलता के साथ चिरकाल की उत्कण्ठा के कारण दूने और चौगुने उत्साह तथा प्रेम से आनन्द-मग्न हो गया ॥१८७॥ आनन्द-विलास से थककर सोया हुआ राजा पृथ्वीरूप प्रातःकाल गाते हुए बन्दियों द्वारा जगाया गया ऐसा शोभित हो रहा था जैसा कि स्वर्ग में इन्द्र ॥१८८॥ इस प्रकार, श्वशुर रूपधर द्वारा प्रस्तुत किये गये नाना प्रकार के भोगों का आनन्द लेता हुआ पृथ्वीरूप दस दिनों तक उस द्वीप में रहा ॥१८९॥ ग्यारहवें दिन ज्योतिषियों के कथनानुसार रूपलता के साथ राजा पृथ्वीरूप मंगला- चरण करके वहाँ से चला ॥१९०॥ समुद्र के तट तक श्वशुर राजा रूपधर द्वारा पहुँचाया गया राजा पृथ्वीरूप जलयान पर सवार हुआ और उसके साथी भी यथायोग्य जलयानों पर उसके साथ सवार हुए। आठ दिनों तक निरन्तर समुद्र-यात्रा करने के पश्चात् उनके जलयान समुद्र के तीर पर पहुँचे जहाँ राजा की सेना अगवानी के लिए उसकी प्रतीक्षा में खड़ी थी। पद्मपुर का राजा उदारचरित भी वहाँ स्वागत के लिए खड़ा था॥१९१-१९२॥ पद्मपुर के राजा द्वारा कुछ दिनों तक आतिथ्य प्राप्त कर विश्राम कर लेने के पश्चात् राजा पृथ्वीरूप वहाँ से चला ॥१९३॥ वह जयमंगल नामक हाथी पर रूपलता को बैठाकर और कल्याणगिरि नामक हाथी पर स्वयं बैठकर वहाँ से चला ॥१९४॥ इस प्रकार, निरन्तर यात्रा करता हुआ राजा क्रमशः तोरणों और ध्वजाओं से सजाये हुए अपने प्रतिष्ठान नगर में पहुँचा ॥१९५॥ उस नगर में रूपलता के सौन्दर्य को देखती हुई नागरिक रमणियों ने अपने रूप का गर्व त्याग दिया ॥१९६॥ तदनन्तर, राजा पृथ्वीरूप ने राजधानी में प्रवेश करके अपने विवाह का उत्सव किया और चित्रकार को गाँव और जागीरें पुरस्कार में देकर तथा धन आदि से उसे सन्तुष्ट किया ॥१९७॥ उन दोनों मित्रों को भी समुचित रूप से धन देकर उसने सन्तुष्ट किया। इसी प्रकार सामन्तों मन्त्रियों तथा यथायोग्य सम्बन्धित राजवंशों का भी उसने यथोचित सत्कार किया ॥१९८॥