भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ४८३ वह नरवाहनदत्त भी सदाचार से मनोहर और उदार गुणोंवाली अलङ्कारवती को प्राप्त कर उसी प्रकार प्रसन्न हुआ जिस प्रकार अच्छे छन्दोंवाली और उदार गुणोंवाली कविता को पाकर रसिक सुकवि प्रसन्न होता है ॥२२७॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलङ्कारवती लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग नरवाहनदत्त का अलङ्कारवती के घर जाना तदनन्तर, वह वत्सेश्वर का पुत्र नरवाहनदत्त कौशाम्बी नगरी में पिता के घर पर, नई वधू अलङ्कारवती के साथ रहने लगा ॥१॥ वह वहाँ रहकर दहेज में प्राप्त अलङ्कारवती की दासियों के साथ नाच-गान आदि से मनोविनोद करता हुआ तथा अपने साथी मन्त्रियों के साथ मद्य-सेवन करता हुआ समय व्यतीत करता था ॥२॥ एक बार, अलंकारवती की माता काञ्चनप्रभा नरवाहनदत्त के पास आई और उसके उचित स्वागत कर लेने पर, उससे बोली—॥३॥ बेटा तुम हमारे घर सुन्दरपुर आओ और उस नगर के उद्यानों में अलङ्कारवती के साथ विचरण करो' ॥४॥ यह सुनकर वहाँ जाना स्वीकार करके और उसी की बात को पिता से निवेदन करके पिता के सम-सचिव गोमुख तथा अन्य मन्त्रियों एवं वधू अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त सास द्वारा विद्या के प्रभाव से निर्मित विमान पर सवार होकर आकाश-मार्ग से सुन्दरपुर को गया ॥५ ६॥ विमान पर चढ़ा हुआ वह नरवाहनदत्त नीचे की इस पृथ्वी को एक स्थली के समान और समुद्रों को खाइयों के समान लघु रूप में देखता हुआ सास और भार्या के साथ क्रमशः हिमालय पर्वत पर पहुँचा ॥७॥ आठवां श्लोक मूल पुस्तक में ही त्रुटित है ॥८॥ किन्नरों के गीतों और स्वर्गीय रमणियों के स्वर-संयोग से मुखरित वह हिमालय पर्वत उसे अत्यन्त सुन्दर लग रहा था ॥९॥ उस पर्वत पर अनेक आश्चर्यों को देखता हुआ वह युवा नरवाहनदत्त अपने श्वशुर की राजधानी सुन्दरपुर पहुँचा ॥१०॥