कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 1079 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ५४७ वह व्याकुल कार्पटिक भी उस फल को हाथ में लेकर उसे ही राजा की कृपा समझता हुआ सभा से बाहर निकला ॥४८॥ उसके बाहर निकलते ही उसके सामने किसी ग्राम का एक अधिकारी राजा के दर्शन के लिए सभा में आता हुआ आ गया ॥४९॥ उसने कार्पटिक के हाथ में नीबू देखकर और उसे अच्छा शकुन समझकर तथा कार्पटिक को धोती-दुपट्टे के दो जोड़े दे कर उसने उससे नींबू ले लिया और राजसभा में जाकर राजा के चरणों में झुककर उसको पहले नींबू ही उसने भेंट-स्वरूप रखा और उसके पश्चात् दूसरी वस्तुएं राजा को अर्पित कीं ॥५०-५१॥ राजा ने उस नींबू को पहचानकर उस ग्रामाधिकारी से पूछा कि यह फल तुम्हें कहाँ से प्राप्त हुआ ? उत्तर में उसने कहा—'कार्पटिक से'। यह सुनकर—'आश्चर्य है कि उस अभागे को लक्ष्मी अब भी दर्शन नहीं देना चाहता'—ऐसा सोचता हुआ राजा बहुत खिन्न हुआ ॥५२-५३॥ और, उस नींबू को लेकर वह सभा से उठ गया। उधर उस कार्पटिक ने उन कपड़ों के जोड़ों में एक को दूकान में बेचकर अपने भोजन-पानी का प्रबन्ध किया और बचे हुए जोड़े के दो हिस्से करके अपने पहनने के काम में लिया ॥५४-५५॥ तब तीसरे दिन राजा ने उसी प्रकार सभा की और सभी लोग पहले की भाँति वहाँ एकत्र हुए ॥५६॥ और, सभा में आये हुए कार्पटिक को पहले की भाँति आर्या पढ़वाकर नींबू का फल पुनः उसे प्रदान किया ॥५७॥ यह देखकर सभी उपस्थित व्यक्ति चकित हुए और कार्पटिक ने उस फल को राजा की वेश्या को ले जाकर दिया ॥५८॥ राजा के सम्मान-वृक्ष की चलती-फिरती लता के समान उस वेश्या ने उस कार्पटिक को भारी फलसूचक सोना उसके बदले में दिया ॥५९॥