भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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नवम लम्बक ६२३ एक बार रात्रि में शयनागार में अकेले सोये हुए राजा ने पर्यंग पर पड़े-पड़े ही द्वार बन्द रहने पर भी सहसा अन्दर आई हुई एक स्त्री को देखा ॥१४४॥ वह स्त्री नम्र और शान्त-स्वरूप थी। उसने शय्या से उठे और प्रणाम करते हुए राजा को आशीर्वाद देकर कहा—॥१४५॥ 'बेटा मैं तुम्हारे पिता की बड़ी बहन और नागराज वासुकि की कन्या हूँ। मेरा नाम रत्नप्रभा है ॥१४६॥ मैं अदृश्य रूप से तेरी रक्षा के लिए सदा तेरे पास रहती हूँ। आज तुम्हें अधिक चिन्तित देखकर तेरे सामने प्रकट हुई हूँ। मैं तुझे खिन्न नहीं देख सकती। दुःखी होने का कारण क्या है बताओ। पिता की बहन (बुआ) के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे कहा—॥१४७-१४८॥ 'माता मैं धन्य हूँ कि तुम मेरी रक्षा का ध्यान रखती हो। किन्तु, पुत्र न होने का मुझे दुःख है। जब कि प्राचीन काल के राजर्षि दशरथ ऐसे महान् व्यक्तियों ने स्वर्ग के लिए पुत्र की इच्छा की तो मेरे ऐसे व्यक्ति क्यों न करें' ॥१४९ १५ ॥ राजा कनकवर्ष के यह वचन सुनकर वह रत्नप्रभा नागिन भाई के पुत्र (राजा) से बोली—॥१५१॥ यदि ऐसा है तो हे पुत्र मैं तुमसे कहती हूँ कि तू जाकर पुत्र के लिए स्वामी कार्तिक से प्रार्थना कर ॥१५२॥ उनकी आराधना में विघ्न करने के लिए सिर पर कुमार-धारा गिरती है तू मेरे शरीर में प्रविष्ट हो जाने के कारण उस धारा को सहन कर सका ॥१५३॥ और भी असाध्य विघ्नों को जीतकर तू अपना ईप्सित फल प्राप्त कर लेगा। इतना कहकर वह नागिन अन्तर्धान हो गई। और राजा ने वह रात्रि प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत की ॥१५४॥ प्रातःकाल राजा ने राज्य का भार मन्त्रियों पर छोड़कर पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से स्वामी कार्तिक के चरणों में प्रस्थान किया ॥१५५॥ वहाँ जाकर उसने कार्तिक की आराधना के लिए कठोर तप प्रारम्भ किया क्योंकि शरीर में प्रविष्ट नागिन (बुआ) का बल उसे प्राप्त था ॥१५६॥ तब राजा के सिर पर वज्र के समान तीव्र कुमार-धारा निरन्तर गिरने लगी ॥१५७॥ शरीर के अन्दर प्रविष्ट नागिन के बल से राजा ने धारा के वेग को सहन कर लिया। तब उनकी तपस्या में विघ्न करने के लिए कार्त्तिकेय ने यमेश्वरों को प्रेरित किया ॥१५८॥