भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ६३७ चन्द्रस्वामी और उसके पुत्र महीपाल की कथा राजन् प्राचीन काल में राजा कमलवर्मा के कमलपुर नामक नगर में चन्द्रस्वामी नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था ॥४॥ उस सद्गुणोंवाले ब्राह्मण की साध्वी और सरस्वती के समान तीसरी नम्रता की मूर्ति देवमति नाम की पत्नी थी ॥५॥ उस ब्राह्मण का उस पत्नी में शुभ लक्षणोंवाला एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसके उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि हे चन्द्रस्वामी तू इस बालक का नाम महीपाल रखना। क्योंकि यह राजा होकर चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करेगा ॥६-७॥ इस प्रकार दिव्य वाणी को सुनकर चन्द्रस्वामी ने पुत्र जन्मोत्सव करके उस शिशु का नाम महीपाल ही रख दिया ॥८॥ क्रमशः बड़े होते हुए महीपाल को पिता ने शस्त्र अस्त्र वेद तथा अन्यान्य विद्याओं में समान रूप से शिक्षित कर दिया ॥९॥ इस बीच चन्द्रस्वामी की पत्नी देवमति ने एक सर्वांगसुन्दरी कन्या को जन्म दिया ॥१०॥ उसका नाम चन्द्रवती रखा गया और वे दोनों भाई-बहन माता-पिता के घर में क्रमशः बढ़ने लगे ॥११॥ कुछ दिनों के अनन्तर उस देश में वर्षा न होने के कारण दुर्भिक्ष पड़ गया। खेतों में पड़ा अन्न सूर्य की किरणों से (गर्मी से) जल गया ॥१२॥ दुर्भिक्ष के कारण उस देश का राजा सन्मार्ग को छोड़कर अधर्म-पथ से प्रजा का धन लूटने लगा ॥१३॥ इस अत्याचार और दुर्भिक्ष के कारण उस देश के अत्यन्त दुःखित हो जाने पर देवमति ने चन्द्रस्वामी से कहा-आओ इस नगर से मेरे पिता के घर चलें। अन्यथा इस कष्ट में किसी समय भी इन दोनों बच्चों को हानि पहुँच सकती है ॥१४-१५॥ यह सुनकर चन्द्रस्वामी ने अपनी पत्नी से कहा—ऐसा न करो। दुर्भिक्ष के समय घर से भागना महापाप है ॥१६॥ इसलिए, मैं इन दोनों बच्चों को ले जाकर तुम्हारे पिता के घर रखकर शीघ्र ही लौट आता हूँ ॥१७॥