कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ३५३ इसका कारण पूछने पर लोगों ने उसे बताया कि यहाँ महीपाल नाम का एक ब्राह्मण कुमार रहता है। उसे व्यापारी सार्थवाह ने शून्य जंगल में पाया था। उसके अच्छे लक्षणों को देखकर उसकी बहन के साथ उसे मन्त्री अनन्तस्वामी व्यापारी से माँग लाये थे और पुत्रहीन मन्त्री ने उसे अपना पुत्र बना लिया था। इसलिए वह उसका बहुत प्रिय हो गया था ॥१२४-१२५॥ वह सर्वगुण बालक यहाँ के राजा का बहुत प्रिय था। उसे आज काले साँप ने काट लिया इसलिए आज सारे नगर में हाहाकार मच रहा है ॥१२६॥ यह समाचार सुनकर चन्द्रस्वामी ने सोचा कि यह तो मेरा ही पुत्र है। इस प्रकार सोचता हुआ चन्द्रस्वामी शीघ्र ही मन्त्री के घर पर आया ॥१२७॥ वहाँ सब लोगों से घिरे हुए उसे देखकर और पहचानकर हाथ में देवी के दिये हुए ओषधि-रूप कमल को लिया हुए चन्द्रस्वामी प्रसन्न हुआ ॥१२८॥ उसने उस कमल को महीपाल की नाक में लगा दिया जिससे वह बालक उसी समय विष हीन हो गया ॥१२९॥ और, इस प्रकार उठ बैठा मानों नींद में सो रहा था। तब उस नगर में उसके जीवित होने का उत्सव राजा-सहित सारी प्रजा ने मनाया ॥१३०॥ तदनन्तर, चन्द्रस्वामी भी किसी देवता का अवतार है ऐसा समझा जाकर जनता से और राजा से धन आदि द्वारा सम्मान किया गया ॥१३१॥ वह चन्द्रस्वामी मन्त्री के घर पर अपने पुत्र महीपाल और कन्या चन्द्रवती को देखता हुआ सम्मान के साथ रहने लगा ॥१३२॥ वे तीनों परस्पर एक दूसरे को पहचानते हुए भी मौन रहे। कार्य की अपेक्षा करके बुद्धिमान् व्यक्ति असमय में प्रकट नहीं होते ॥१३३॥ कुछ दिनों के अनन्तर महीपाल के गुणों से मुग्ध राजा तारावर्मा ने उसे तारावती नाम की अपनी कन्या दे दी ॥१३४॥ और साथ ही उस पुत्रहीन राजा ने अपने राज्य का आधा भाग और सारे राज्य का भार भी उसे देकर स्वयं शान्ति प्राप्त की ॥१३५॥ महीपाल भी राज्य प्राप्त करके और चन्द्रस्वामी को अपना वास्तविक पिता घोषित करके तथा अपनी छोटी बहन का योग्य पात्र के साथ विवाह कराके सुखपूर्वक रहने लगा ॥१३६॥ एकबार महीपाल के पिता चन्द्रस्वामी ने उससे कहा-‘चलो अपनी माता को लाने के लिए अपने गाँव को चल ॥१३७॥