भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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[Page Header] नवम लम्बक ६१३

इसलिए हे सदाचारिणी तू भी यात्रा से लौटने पर अपने पति को अवश्य प्राप्त करेगी। धैर्य रख उद्विग्नता छोड़। और, पति-प्राप्ति की कामना पूर्ण होने से आनन्द प्राप्त कर ॥४१९॥ इस प्रकार, कहते हुए उस ब्राह्मण को बहुत धन वस्त्र आदि से सत्कृत कर वह सद्गुणोपेता वसुमती धैर्य-धारण करके अपने पति के आगमन की प्रतीक्षा में पिता के घर में निवास करती थी ॥४२०॥ कुछ ही दिनों के पश्चात् उसका पति महीपाल दूसरे देश में रहनेवाली अपनी माता को साथ लेकर पिता-सहित पुनः अपनी राजधानी (तारापुर) में लौट आया ॥४२१॥ प्रजा के नेत्रों को आनन्द देनेवाला महीपाल ने अपनी पत्नी वसुमती को इस प्रकार आनन्दित किया जैसे पूर्णिमा का चन्द्र समुद्र की लक्ष्मी को आनन्दित करता है॥४२२॥ तदनन्तर महीपाल वसुमती के साथ उसके पिता द्वारा दिये गये राज्य के भार को वहन करता हुआ और अभीष्ट भोगों को प्राप्त करता हुआ अपनी पृथ्वी का शासन करने लगा ॥४२३॥ वत्सेश्वर उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त अपनी पत्नियों के साथ मन्त्री मरुभूति के मुँह से इस विचित्र और राग-मनोहर कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥४२४॥

महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती-लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त नवम अलंकारवती-लम्बक समाप्त