कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ७०३ तदनन्तर वह घड़ा फूटने पर भी फिर उसी तरह का होकर उन यक्षों के पास ही पहुँच गया और वह गुप्तदत्त फिर विषाद युक्त होकर अपनी (साहूकारे की) स्थिति में आ गया ॥४७॥ इस प्रकार मद्यपान करने की बुरी आदतों के प्रभाव ग्रसित अच्छी सम्पत्ति पाकर भी उस पर नहीं मरते ॥४८॥ राजा उदयन इस प्रकार वत्सेश्वर से भद्रघट की हास्यपूर्ण कहानी सुनकर स्नान आहार आदि क्रिया में लग गया ॥४९॥ नरवाहनदत्त भी स्नान करके और पिता के समीप ही भोजन करके वहीं रह गया। सायंकाल में अपने मित्रों मन्त्रियों के साथ अपने महल को गया ॥५०॥ अपने महल में रात्रि के समय पर्यंक पर पड़ा हुआ निद्रा रहित नरवाहनदत्त को उसका मित्र मरुभूति अन्य सभी मन्त्रियों को सुनाते हुए बोला- स्वामिन् ऐसा प्रतीत होता है कि आज छापी (वेश्या) से संगम करने की इच्छा से तुमने मदिरा को नहीं छकाया और न उस दासी को ही बुलाया इसीलिए तुम्हें नींद नहीं आ रही है ॥५१ ५२॥ गुण गए कुछ समझते हुए भी वेश्याओं का साथ क्यों नहीं छोड़ते? वेश्याओं के हृदय में सद्भाव नहीं रहता। इस सम्बन्ध में एक कथा सुनो—॥५३॥ मानप्राण की कथा इस पृथ्वी पर विश्वस्त नाम का खण्ड धन-सम्पन्न नगर है। वहीं राजवर्मा नाम का एक बड़ा ही यशस्वी वीर था ॥५४॥ [L19: ईश्वर की आराधना से उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ इसलिए उसने उसका नाम ईश्वर- वर्मा रख दिया ॥५५॥ बहुमित्र और असाधी से घेरे हुए उस पुत्र को देखकर राजवर्मा ने सोचा— ॥५६॥ 'वेश्या ने इस गमार के यौवन से अंध समझकर के लिए वरुणा को धन और प्राणों का हरण करनेवाला मुख्य संसारी तत्त्व बना दिया है ॥५७॥ दुर्भाग्य इस पुत्र का साम्प्रत यह कष्टप्रद संताप के लिए किसी कुट्टनी को सौं- पूँगा जिससे कि वह वेश्याओं द्वारा ठगा न जा सके ॥५८॥