भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ७४९ उस सरोवर में स्नान करके तट की बालू पर बैठे हुए मैंने अपने पूर्वजन्मों के पुण्यों के समान मरीचि नाम के मुनि को देखा ॥५३॥ वह मुनि मुझे देखकर और जल की बूंदों को मेरे मुंह पर डालकर, मुझे धीरज बँधाकर और पत्तों के दोनों में मुझे रखकर कृपापूर्वक अपने आश्रम में ले गये ॥५४॥ वहाँ मुझे देखकर आश्रम के कुलपति पुलस्त्य ऋषि ने हंस दिया। तब अन्य ऋषियों द्वारा उनके हँसने का कारण पूछने पर पुलस्त्य ने कहा-'मैं अपना दैनिक कृत्य समाप्त करके इसकी कथा आप लोगों से कहूँगा। इस कथा को सुनने से यह सुग्गा अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगा और अपना पिछला वृत्तान्त भी स्मरण करेगा'। ऐसा कहकर पुलस्त्य मुनि नित्य-कर्म में लग गए ॥५५-५७॥ नित्यकर्म करने के उपरान्त अन्य मुनियों द्वारा पुनः पूछे गये पुलस्त्य महामुनि ने मेरे सम्बन्ध की कथा का वर्णन किया ॥५८॥

सोमप्रभ मकरन्दिका और मनोरथप्रभा की कथा रत्नाकर नगर में ज्योतिष्प्रभ नाम का राजा था। वह प्रचण्डशासन राजा समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का शासन करता था ॥५९॥ उस राजा की तीव्र तपस्या से प्रसन्न शिवजी के वर से उसकी रानी हर्षवती के पुत्र उत्पन्न हुआ ॥६०॥ रानी ने स्वप्न में चन्द्रमा को अपने मुंह में प्रवेश करते देखा था इसलिए राजा ने उस पुत्र का नाम सोमप्रभ रखा ॥६१॥ प्रजाजन के नेत्रों के आनन्द को बढ़ाता हुआ वह बालक सोमप्रभ अपने अमृतमय गुणों के साथ क्रमशः बढ़ने लगा ॥६२॥ कुछ दिनों के पश्चात् पुत्र सोमप्रभ को गुण, युवा और प्रजा का प्रिय देखकर पिता ज्योतिष्प्रभ ने उसे युवराज के पद पर बैठा दिया ॥६३॥ और प्रभाकर नाम के अपने मन्त्री के सदगुण पुत्र प्रियंकर को उसका मन्त्री बना दिया ॥६४॥ उसी समय मातलि दिव्य घोड़े को लेकर आकाश से उतरा और सोमप्रभ के समीप आकर बोला- ॥६५॥ 'तुम इन्द्र के मित्र विद्याधर भूमि पर अवतरे हो इसलिए इन्द्र ने तुम्हें धषा नामक अपने घोड़े के पुत्र आशुश्रवा को तुम्हारे लिए भेजा है॥६६॥ यह घोड़ा तुम्हें प्राचीन स्नेह के कारण भेजा गया है। इस पर चढ़कर तुम शत्रुओं के लिए अजेय हो जाओगे ॥६७॥

१. यही कादम्बरी का कथाबीज है। २. कादम्बरी का शूद्रकराज। ३. यही कादम्बरी का इन्द्रायुध है।