भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ८४५ यदि यह दूसरा पुत्र भी न हुआ तो क्या करेगी (इस एकमात्र पुत्र से भी हाथ धो बैठेगी)। इस प्रकार पुत्र का वध करती हुई उस मूर्ख स्त्री को उस वृद्धा और भली स्त्री ने बचा दिया॥२९३॥ इसी प्रकार शाकिनी (डाकिनी) आदि के चक्कर में पड़कर स्त्रियाँ नष्ट हो जाती हैं। और, वृद्धा स्त्रियों के नियन्त्रण और उपदेश से वे रक्षित होती हैं ॥२९४॥ एक मूर्खसेवक की कथा स्वामिन् अब आँवले खानेवाले की कथा सुना। किसी धनी गृहस्थ का एक मूर्ख सेवक था। आँवलों के प्रेमी उस गृहस्थ ने सेवक से कहा—जाओ उद्यान से मीठे-मीठे आँवले ले आओ। वह मूर्ख एक-एक आँवले को दाँतों से काट-काटकर और चख-चख कर ले आया और बोला— स्वामी मैं एक-एक आँवले को चख चखकर और मीठे-मीठे बताकर लाया हूँ ॥२९५- २९७॥ स्वामी ने भी उन जूठे आँवलों को उस मूर्ख सेवक के साथ ही छोड़ दिया। (अर्थात् आँवले फेंक दिये और सेवक को निकाल दिया) ॥२९८॥ इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपनी और अपने स्वामी की भी हानि करता है। इसी प्रसंग में दो भाइयों की कथा सुनो ॥२९९॥ दो बन्धुओं की कथा पाटलिपुत्र नगर में दो भाई रहते थे। बड़ा यज्ञसोम और छोटा कीर्तिसोम था। उन दोनों भाइयों के पास पिता का बहुत धन था। दोनों ने आपस में पिता के धन का बँटवारा कर लिया था और कीर्तिसोम अपने धन को ब्याज-बट्टे में लगाकर बढ़ाता था। यज्ञसोम ने खा-पीकर और ले-देकर अपने धन को समाप्त कर दिया। तब निर्धन होने पर यज्ञसोम अपनी पत्नी से बोला—॥३ ०—३ २॥ प्रिये मैं निर्धन होकर भी इस समय अपने इष्ट-सम्बन्धियों में कैसे रहूँ। इसलिए चलो कहीं दूसरे देश में चलें ॥३ ३॥ उसकी पत्नी ने कहा—'मार्ग में खान-पीने आदि के व्यय के बिना कैसे चलें। उसके इस प्रकार कहने पर भी जब वह हठ करने लगा तब उसकी पत्नी ने उससे कहा—'यदि जाना ही आवश्यक है तो जाकर अपने छोटे भाई कीर्तिसोम से कुछ आवश्यक व्यय के लिए धन माँगो ॥३ ४—३ ५॥ तब यज्ञसोम ने जाकर कीर्तिसोम से मार्ग-व्यय के लिए कुछ धन माँगा तो उसकी (कीर्तिसोम की) पत्नी ने उससे कहा—'अपना सब धन नष्ट कर देनेवाले इसे हम कहाँ से और कितना धन देंगे? जो भी निर्धन होजायगा वही हमारे इस प्रकार धन माँगने लगेगा ॥३ ६-३ ७॥

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