कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक ६९ 'मुझे याद रखना' ऐसा कहते हुए बन्दर से पूछकर निश्चयदत्त यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर अपनी प्रेयसी के पास चला ॥१७९॥ और, आधी रात के समय हिमाचल पर स्थित अनुरागपरा के पिता की नगरी पुष्करावती में पहुँचा ॥१८०॥ इधर विद्याधरी अनुरागपरा ने भी अपनी विद्या के प्रभाव से निश्चयदत्त का आना जान लिया और उसे लाने के लिए वह अपने पिता की नगरी से बाहर निकल आई ॥१८१॥ दूसरे चन्द्रमा के समान यह तुम्हारे नेत्रों को आनन्द देनेवाली तुम्हारी सुन्दरी प्यारी आ रही है। तो अब मैं जाती हूँ इस प्रकार कहती हुई यक्षिणी निश्चयदत्त को कन्धे से उतारकर और उसे नमस्कार करके चली गई ॥१८२-१८३॥ तब उस विद्याधरी ने भी चिरकालीन उत्कण्ठा से भरकर आलिंगन चुम्बन आदि से निश्चयदत्त का भलीभाँति अभिनन्दन किया ॥१८४॥ अत्यन्त क्लेश के अनन्तर प्राप्त होनेवाले समागम से आनन्दित निश्चयदत्त अनुरागपरा का आलिंगन करते हुए उसके शरीर में प्रवेश करके मानो अपने शरीर में की सुध-बुध खो दी ॥१८५॥ अनुरागपरा उसके साथ गान्धर्व-विधिसे विवाह करके अपने विद्या-बल से नया नगर बनाकर उसी में उसके साथ रहने लगी ॥१८६॥ उसी की विद्या के प्रभाव से उसके माता-पिता की दृष्टि से छिपाया हुआ निश्चयदत्त उसके साथ बाहरी नगर में रहने लगा ॥१८७॥ उसके पूछने पर उसने मार्ग में प्राप्त होनेवाले कष्टों का भी वर्णन उससे किया इस कारण वह उससे अधिक प्यार करने लगी और विविध भोगों से उसे प्रसन्न करने लगी ॥१८८॥ तदनन्तर निश्चयदत्त ने बन्दर बने हुए सोमस्वामी की आश्चर्य-जनक कथा उसे सुनाई और कहा कि यदि तुम्हारे प्रयत्न से वह पशु-योनि से छूट जाय तो तुम्हें बहुत पुण्य होगा ॥१८९-१९०॥ ऐसा कहने पर अनुरागपरा उससे बोली—'यह योगिनियों की मन्त्र-सिद्धियों का काम है। हमारा विषय नहीं है ॥१९१॥ तो भी मैं तुम्हारे इस प्रिय कार्य को अपनी सखी मद्ररूपा नाम की सिद्ध योगिनी से प्रार्थना करके, सिद्ध करूँगी' ॥१९२॥ यह सुनकर प्रसन्न वैश्य-पुत्र बोला—'तुम मेरे उस मित्र को देखो। आओ उसके पास चलें' ॥१९३॥