कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ८६३ इस आश्चर्यजनक अपने सौभाग्य को देखकर उस वृद्ध बनिये ने चारों ओर देखा तो एक कोने में उसे चोर दिखाई दिया ॥८६॥ 'तू मेरा उपकारी है इसलिए मैं तुझे अपने सेवकों से पिटवाऊँगा नहीं' उस चोर से ऐसा कहकर उस बनिये ने उसे सुरक्षित रूप से बाहर निकाल दिया ॥८७॥ इसी प्रकार, अपने उपकारी इस चिरजीवी की हमें रक्षा करनी चाहिए। यह कहकर दीप्तनयन नाम का मन्त्री चुप हो गया ॥८८॥ तब उलूकराज ने वक्रनास नामक अपने दूसरे मन्त्री से पूछा कि 'इसका क्या करना चाहिए, आप अच्छी तरह बताइए' ॥८९॥ तब वक्रनास ने कहा- शत्रुओं के मर्म (गुप्त भेद) को जाननेवाले इस चिरजीवी की रक्षा करनी चाहिए। शत्रु राजा और उसके मन्त्री का बैर, हमारे कल्याण के लिए होगा मैं कहता हूँ ॥९०॥ ब्राह्मण चोर और राक्षस की कथा इस विषय में उदाहरण के लिए एक कथा सुनो। किसी ब्राह्मण ने दान में दो गौएँ पाईं। यह देखकर चोर ने उसकी गायें चुराने की इच्छा की और उसी समय एक राक्षस ने उस ब्राह्मण को खाने की बात सोची ॥९१-९२॥ अपने-अपने कार्य के लिए, रात में बाहर जाते हुए दोनों (चोर और राक्षस) मिले और अपना-अपना प्रयोजन बताकर एक साथ हो लिये ॥९३॥ पहले मैं गायें चुरा लेता हूँ क्योंकि तुमसे पकड़ा हुआ ब्राह्मण यदि जाग उठा तो मैं कैसे गौएँ चुराऊँगा ? ऐसा नहीं पहले मैं ब्राह्मण को खा लेता हूँ। यदि गायों के खुरों की खट- पटाहट से ब्राह्मण जाग उठा तो मेरा परिश्रम व्यर्थ हो जायगा ॥९४-९५॥ जब ब्राह्मण के घर में पहुंचकर चोर और राक्षस इस प्रकार बोल-चालकर लड़ने लगे तो उनके शब्द से वह ब्राह्मण जाग उठा ॥९६॥ उसने उठकर, राक्षसों के नाश करने का मन्त्र जपते हुए हाथ में तलवार उठाई तो वे दोनों चोर और राक्षस भाग गये ॥९७॥ जिस प्रकार चोर और राक्षस का आपसी झगड़ा ब्राह्मण के लिए हितकर हुआ वैसे ही काकराज और चिरजीवी का झगड़ा हमारे लिए हितकर होगा ॥९८॥ वक्रनास के ऐसा कहने पर उलूकराज ने प्राकारकर्ण नाम के मन्त्री से पूछा और मन्त्री ने उससे कहा-॥९९॥