भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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१६ मुझको उससे यह प्राप्त करादे उसके लिये स्वाहा"। (यह आहुतियां देने के बाद) वह नाक से धुयें को सूंघे और सर्वांग में घृत का लेपन करे, मौन धारण करते हुए (वह पदार्थ जिसके पास हो उसके पास) चला जाय और अपनी इच्छा प्रकट करे अथवा किसी दूत को भेज कर ऐसा करे। उसको अर्थ की प्राप्ति हो जायेगी ॥ ८ ॥ अथातो दैवःस्मरो यस्य प्रियो बुभूषेद् यस्यै वा एषां वैतेषांमेवैतस्मिन्पर्वण्यग्निमुपसमाधायैतयैवावृत्तैता आज्याहुतीर्जु- होति ।। ६ ।। अब देवस्मर (देवंताओं से पूर्ण होने वाली कामना) कहते हैं। जिस किसी एक पुरुष को वां स्त्री को अथवा अनेक पुरुषों को वा स्त्रियों को हम प्रिय हों ऐसी किसी को इच्छा हो तो वह ऊपर लिखे हुए मुहूर्त पर बराबर उसी रीति के अनुसार अग्नि में नीचे लिखे मन्त्रों से आहुतियां दें॥ ६॥ वाचं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा प्राणं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा चक्षुस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा श्रात्रं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा मनस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा ॥ १० ।। तेरे वाणी का यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा। तेरे श्रोत्र का मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा। तेरे मनका यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा ॥१०॥ प्रज्ञानं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघ्रायाज्यलेपेनांगान्यनुविमृज्य वाचंमयोऽभिप्रवृज्य संस्पर्श जिगमिषेदपि वाताद्वा संभाषमाणस्तिष्ठेत्प्रियो हैव भवति स्मरन्ति हैवास्य ॥११॥ तेरे प्रज्ञान का यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा! (ये आहुतियां