कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 14, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ें( ग ) हैं। जिनको वहाँ की सरकार ने सुरक्षित कर रक्खी हैं। जिनका अध्ययन केवल वहाँ के शिखा रखने वाले ही द्वारा कराया जा सकता है। वेद का अर्थ निरुक्त से होता है। प्राचीन काल में प्रत्येक शाखा के भिन्न २ वेदाङ्गं (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) होते थे। इस समय के पहिले १८ निरुक्त कई एक व्याकरण, ज्योतिष आदि मिलते थे। अब तो भारत में एक व्याकरण, निरुक्त (व्यास्क्रीय) एक मिलते हैं। परन्तु जर्मन देश में निरुक्त ३ मिलते हैं। वेद में अनेक प्रकार के वायुयानों का उल्लेख हैं; जिनमें से इस समय तक १८ प्रकार के वायुयानों का पता जर्मनों ने लगाया है। वेद के द्वारा हमारे ऋषि सूर्य आदि अन्य मण्डलों में जा सकते थे। इस समय का वायुयान केवल अधिक से अधिक १०१ मील तक जा सकेगा। अभी केवल २१ ही मील तक जा सकता है। ९ प्रकार के विद्युत को हमारे ऋषिगण जानते थे, एक विद्युत के प्रकाश से जिसको उत्तरी ध्रुव के नीचे बिन्दु सरोवर के ऊपर रक्खा जाता था उसी से सम्पूर्ण एशिया में प्रकाश होता था। इत्यादि आश्चर्यमय विषयों का वर्णन वेदों की सारी शाखाओं में उपदिष्ट हैं। हमारे दुर्भाग्य से वेदों की सब शाखायें नहीं मिल रही है। आज हमने पाठकों के अवलोकनार्थ अमेरिका में प्रकाशित अथर्व- वेदीय कौशिक गृह्यसूत्र को सानुवाद प्रकाशित किया है। आज तक जितने वैदिक गृह्यसूत्र उपलब्ध हुए हैं उनमें लोकहित की ऐसी बातें प्रकाशित नहीं पाई गई हैं जैसा कि इस सूत्र में अलौकिक आश्चर्य शक्ति वाले पदार्थों का वर्णन इसमें पाया जाता है जिनको पाठकवर्ग देखकर उनसे लाभ उठावेंगे। अनुवादक