भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

३९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) प्रोषितपतिकामपचरन्तीं पतिबन्धुस्तत्पुरुषो वा संगृह्णीयात् । संगृहीता पतिमाकांक्षेत । पतिश्चेत् क्षमेत, विसृज्येतोभयम् । अक्षमायां स्त्रियाः कर्णनासाच्छेदनम् । वधं जारश्च प्राप्नुयात् ।

(२) जारं चोर इत्यभिहरतः पञ्चशतो दण्डः । हिरण्येन मुञ्चतस्तदष्टगुणः ।

(३) केशाकेशीकं संग्रहणम् । उपलिङ्गनाद्वा शरीरोपभोगानां तज्जातेभ्यः स्त्रीवचनाद्वा ।

(४) परचक्राटवीहतामोघप्रव्यूढामरण्येषु दुर्भिक्षे वा त्यक्तां प्रेतभावोत्सृष्टां वा परस्त्रियं निस्तारयित्वा यथासम्भाषितं समुपभुञ्जीत । जातिविशिष्टामकामामपत्यवतीं निष्क्रयेण दद्यात् ।

(५) चोरहस्तान्नदीवेगाद् दुर्भिक्षाद्देशविभ्रमात् ।
निस्तारयित्वा कान्ताराद्भ्रष्टां त्यक्तां मृतेति वा ॥


( १ ) जिस स्त्री का पति विदेश में हो, यदि वह व्यभिचार कराये तो उसका देवर या नौकर उसको नियंत्रण में रखे । उनके नियन्त्रण में रहकर वह स्त्री अपने पति के आने की प्रतीक्षा करे । यदि पति उसके अपराध को क्षमा कर दे तो, जार सहित उसको दण्ड से बरी किया जाय, यदि क्षमा न करे तो स्त्री के नाक-कान काट दिये जाँय और उसके जार को प्राणदंड की सजा दी जाय ।

( २ ) व्यभिचार छिपाने के लिए यदि कोई रक्षक पुरुष जार को चोर बताये तो उस पर पाँच सौ पण जुरमाना किया जाय । रक्षक पुरुष यदि हिरण्य की रिश्वत लेकर जार को छोड़ दे तो उस पर रिश्वत का अठगुना जुरमाना किया जाय ।

( ३ ) यदि कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ फँसी हो तो उसका पता उसकी इन चेष्टाओं से किया जाय : यदि वह रास्ते में चलती हुई दूसरी स्त्री की चुटिया पकड़े, यदि उसके शरीर पर संभोग चिह्न लक्षित हों, यदि कामोत्तेजना के लिए अपने शरीर पर उसने चंदन आदि का लेप किया हो, यदि वह पुरुषों से इशारों से बात करे, यदि वह बात-चीत से स्वयं ही प्रकट कर दे ।

( ४ ) जो पुरुष शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से रोग या मूर्च्छा से त्यागी हुई पराई स्त्रियों का उद्धार करे, वह उस स्त्री की रजामन्दी से उसके साथ तृप्त होकर संभोग कर सकता है । यदि वह स्त्री कुलीन हो, समान जाति की होने पर भी वह उद्धारकर्ता से संभोग की इच्छा न करे और बाल-बच्चों वाली हो तो उद्धार करने वाला उसको उसके पति के पास सौंप कर उससे यथोचित पुरस्कार प्राप्त करे ।

( ५ ) शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से,

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