भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 918 में से

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पृष्ठ 86

२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

(१) विद्यासमुद्देशः ॥ १ ॥ वृद्धसंयोगः ॥ २ ॥ इन्द्रियजयः ॥ ३ ॥ अमात्योत्पत्तिः ॥ ४ ॥ मन्त्रिपुरोहितोत्पत्तिः ॥ ५ ॥ उपधाभिः शौचाशौचज्ञानममात्यानाम् ॥ ६ ॥ गूढपुरुषोत्पत्तिः ॥ ७ ॥ गूढपुरुषप्रणिधिः ॥ ८ ॥ स्वविषये कृत्याकृत्यपक्षरक्षणम् ॥ ९ ॥ परविषये कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः ॥ १० ॥ मन्त्राधिकारः ॥ ११ ॥ दूतप्रणिधिः ॥ १२ ॥ राजपुत्ररक्षणम् ॥ १३ ॥ अवरुद्धवृत्तम् ॥ १४ ॥ अवरुद्धे च वृत्तिः ॥ १५ ॥ राजप्रणिधिः ॥ १६ ॥ निशान्तप्रणिधिः ॥१७॥ आत्मरक्षितकम् ॥१८॥
इति विनयाधिकारिकं प्रथममधिकरणम् ।

(२) जनपदविनिवेशः ॥ १ ॥ भूमिच्छिद्रविधानम् ॥ २ ॥ दुर्गविधानम् ॥ ३ ॥ दुर्गविनिवेशः ॥ ४ ॥ संनिधातृनिचयकर्म ॥ ५ ॥ समाहर्तृसमुदयप्रस्थापनम् ॥ ६ ॥ अक्षपटलेगाणनिक्याधिकारः ॥ ७ ॥ समुदयस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनम् ॥ ८ ॥ उपयुक्तपरीक्षा ॥ ९ ॥ शासनाधिकारः ॥ १० ॥ कोशप्रवेश्यरत्नपरीक्षा ॥ ११ ॥ आकरकर्मान्तप्रवर्तनम् ॥१२॥ अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षः ॥ १३ ॥ विशिखायां सौवर्णिकप्रचारः ॥ १४ ॥ कोष्ठागाराध्यक्षः ॥ १५ ॥ पण्याध्यक्षः ॥ १६ ॥ कुप्याध्यक्षः ॥ १७ ॥ आयुधागाराध्यक्षः ॥ १८ ॥ तुलामानपौतवम् ॥ १९ ॥ देशकालमानम्

पहला अधिकरण : विनयाधिकारिक-( राजवृत्ति )-निरूपण

( १ ) १. विद्या-विषयक विचार; २. वृद्धजनों की संगति; ३. इन्द्रियजय; ४. अमात्यों की नियुक्ति; ५. मन्त्री और पुरोहित की नियुक्ति; ६. गुप्त उपायों से अमात्यों के आचरणों की परीक्षा; ७. गुप्तचरों का निरूपण; ८. गुप्तचरों की कार्यों पर नियुक्ति; ६. अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा; १०. शत्रुदेश में कृत्य-अकृत्य पक्ष को मिलाना; ११. मंत्राधिकार; १२. दूतों की कार्यों पर नियुक्ति; १३. राजपुत्र की रक्षा; १४. नजरबन्द राजकुमार का व्यवहार; १५. नजरबन्द ( राजकुमार ) के प्रति राजा का व्यवहार; १६. राजा के कार्य-व्यापार; १७. राजभवन का निर्माण; १८. आत्मरक्षा का प्रबन्ध ।

दूसरा अधिकरण : अध्यक्षों का निरूपण

( २ ) १. जनपदों की स्थापना; २. भूमि को उपयोगी बनाने का विधान; ३. दुर्गों का निर्माण; ४. दुर्गविनिवेश; ५. सन्निधाता के कार्य; ६. समाहर्त्ता का कर-संग्रह कार्य; ७. अक्षपटल में गाणनिक के कार्य; ८. गबन किए गये राजधन को पुनः प्राप्त करना; ६. उपयुक्त परीक्षा; १०. शासनाधिकार; ११. कोष में रखने योग्य रत्नों की परीक्षा; १२. खान के कार्यों का संचालन; १३. अक्षशाला में स्वर्णाध्यक्ष का कार्य; १४. विशिखा में सौवर्णिक का व्यापार; १५. कोष्ठागार का अध्यक्ष; १६. पण्य का अध्यक्ष; १७. कुप्य का अध्यक्ष; १८. आयुधागार का अध्यक्ष;

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