कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
॥ ३ ॥ गूढाजीविनां रक्षा ॥ ४ ॥ सिद्धव्यञ्जनैर्माणवप्रकाशनम् ॥ ५ ॥ शङ्कारूपकर्माभिग्रहः ॥ ६ ॥ आशुमृतकपरीक्षा ॥ ७ ॥ वाक्यकर्मानुयोगः ॥ ८ ॥ सर्वाधिकरणरक्षणम् ॥ ९ ॥ एकाङ्गवधनिष्क्रयः ॥ १० ॥ शुद्ध-श्चित्रश्च दण्डकल्पः ॥ ११ ॥ कन्याप्रकर्म ॥ १२ ॥ अतिचारदण्डः ॥ १३ ॥
इति कण्टकशोधनं चतुर्थमधिकरणम् ।
(१) दाण्डकर्मिकम् ॥ १ ॥ कोशाभिसंहरणम् ॥ २ ॥ भृत्यभरणीयम् ॥ ३ ॥ अनुजीविवृत्तम् ॥ ४ ॥ सामयाचारिकम् ॥ ५ ॥ राज्यप्रतिसंधा-नम् ॥ ६ ॥ एकैश्वर्यम् ॥ ७ ॥
इति योगवृत्तं पञ्चममधिकरणम् ।
(२) प्रकृतसम्पदः ॥ १ ॥ शमव्यायामिकम् ॥ २ ॥
इति मण्डलयोनिः षष्ठमधिकरणम् ।
(३) षाड्गुण्यसमुद्देशः ॥ १ ॥ क्षयस्थानवृद्धिनिश्चयः ॥ २ ॥ संश्रय-वृत्तिः ॥ ३ ॥ समहीनज्यायसां गुणाभिनिवेशः ॥ ४ ॥ हीनसंधयः ॥ ५ ॥ विगृह्यासनम् ॥ ६ ॥ संधायासनम् ॥ ७ ॥ विगृह्ययानम् ॥ ८ ॥ संधाय-यानम् ॥ ९ ॥ संभूयप्रयाणम् ॥ १० ॥ यातव्यामित्रयोरभिग्रहचिन्ता ॥ ११ ॥ क्षयलोभविरागहेतवः प्रकृतीनाम् ॥ १२ ॥ सामवायिकविपरि-
आपत्तियों का प्रतीकार; ४. गुप्त षड्यन्त्रकारियों से देश की रक्षा; ५. सिद्ध पुरुषों के बहाने प्रलोभन-विद्याओं का प्रकाशन; ६. सन्देह, वस्तु और कार्य के द्वारा चोरों को पकड़ना; ७. आशुमृत की परीक्षा; ८. वाक्यकर्मानुयोग; ६. सभी राजकीय विभागों की रक्षा; १०. एक अङ्ग का वध या उसकी जगह द्रव्यदण्ड; ११. शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड; १२. कुंवारी कन्या से सम्भोग करने का दण्ड; और १३. अतिचार का दण्ड ।
पाँचवाँ अधिकरण : योगवृत्त-निरूपण
(१) १. दंडव्यवस्था; २. कोश का संग्रह; ३. भृत्यों का भरण-पोषण; ४. राज्य-कर्मचारियों का व्यवहार; ५. व्यवस्था का यथोचित पालन; ६. राज्य का प्रतिसंधान और ७. एकैश्वर्य ।
छठा अधिकरण : प्रकृतियों का निरूपण
(२) १. प्रकृतियों के गुण; और २. शांति तथा उद्योग ।
सातवाँ अधिकरण : छह गुणों का निरूपण
(३) १. छह गुणों का उद्देश्य; २. क्षय, स्थान तथा वृद्धि का निश्चय; ३. बल-वान् का आश्रय; ४. सम, हीन तथा बलवान् आदि राजाओं का चरित; ५. हीन संधि; ६. विग्रह कर के आसन; ७. संधि कर के आसन; ८. विग्रह कर के यान; ६. संधि कर के यान; १०. सामूहिक प्रयाण; ११. यातव्य और शत्रु के प्रति यान का