कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० २ : अ० ४ ] वृद्ध-संयोगः १५
(१) पूर्वमहर्भागं हस्त्यश्वरथप्रहरणविद्यासु विनयं गच्छेत् । पश्चिममितिहासश्रवणे । पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतीतिहासः । शेषमहोरात्रभागमपूर्वग्रहणं गृहीतपरिचयं च कुर्यात् । अगृहीतानामाभीक्ष्ण्यश्रवणं च । (२) श्रुताद्धि प्रज्ञोपजायते; प्रज्ञाया योगो योगादात्मवत्तेति विद्यासामर्थ्यम् । (३) विद्याविनीतो राजा हि प्रजानां विनये रतः । अनन्यां पृथिवीं भुङ्क्ते सर्वभूतहिते रतः ॥
इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे वृद्धसंयोगः चतुर्थोऽध्यायः ।
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के लिए सदा ही विद्यावृद्ध पुरुषों का सहवास करे, क्योंकि सारा विनय उन्हीं पर निर्भर है ।
( १ ) दिन का पहिला भाग हाथी, घोड़ा, रथ, अस्त्र-शस्त्र आदि विद्याओं की शिक्षा में बिताये । दिन के दूसरे भाग को इतिहास सुनने में लगाये । पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका, उदाहरण (मीमांसा), धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र, ये सभी विषय इतिहास हैं । दिन और रात के बाकी बचे समय में नये ज्ञान का अर्जन और अधीत ज्ञान का मनन-चिन्तन करे । जो विषय एक बार सुनने में बुद्धिस्थ न हो सके, उसको बार-बार सुने ।
( २ ) क्योंकि शास्त्र-श्रवण से बुद्धि का विकास होता है; उससे योगशास्त्रों में रुचि और योग से आत्मबल प्राप्त होता है । यही विद्या का सुपरिणाम है ।
( ३ ) जो विद्वान् राजा प्राणिमात्र की हितकामना में लगा रहता है और प्रजा के शासन तथा शिक्षण में तत्पर रहता है, वह चिरकाल तक पृथिवी का निर्बाध शासन करता है ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
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