कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्र० २ : अ० ४ ] वृद्ध-संयोगः १५
(१) पूर्वमहर्भागं हस्त्यश्वरथप्रहरणविद्यासु विनयं गच्छेत् । पश्चिममितिहासश्रवणे । पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतीतिहासः । शेषमहोरात्रभागमपूर्वग्रहणं गृहीतपरिचयं च कुर्यात् । अगृहीतानामाभीक्ष्ण्यश्रवणं च । (२) श्रुताद्धि प्रज्ञोपजायते; प्रज्ञाया योगो योगादात्मवत्तेति विद्यासामर्थ्यम् । (३) विद्याविनीतो राजा हि प्रजानां विनये रतः । अनन्यां पृथिवीं भुङ्क्ते सर्वभूतहिते रतः ॥
इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे वृद्धसंयोगः चतुर्थोऽध्यायः ।
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के लिए सदा ही विद्यावृद्ध पुरुषों का सहवास करे, क्योंकि सारा विनय उन्हीं पर निर्भर है ।
( १ ) दिन का पहिला भाग हाथी, घोड़ा, रथ, अस्त्र-शस्त्र आदि विद्याओं की शिक्षा में बिताये । दिन के दूसरे भाग को इतिहास सुनने में लगाये । पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका, उदाहरण (मीमांसा), धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र, ये सभी विषय इतिहास हैं । दिन और रात के बाकी बचे समय में नये ज्ञान का अर्जन और अधीत ज्ञान का मनन-चिन्तन करे । जो विषय एक बार सुनने में बुद्धिस्थ न हो सके, उसको बार-बार सुने ।
( २ ) क्योंकि शास्त्र-श्रवण से बुद्धि का विकास होता है; उससे योगशास्त्रों में रुचि और योग से आत्मबल प्राप्त होता है । यही विद्या का सुपरिणाम है ।
( ३ ) जो विद्वान् राजा प्राणिमात्र की हितकामना में लगा रहता है और प्रजा के शासन तथा शिक्षण में तत्पर रहता है, वह चिरकाल तक पृथिवी का निर्बाध शासन करता है ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ३ |
|---|
| अध्याय ५ |
इन्द्रिय-जयः अरिषड्वर्गत्यागः
(१) विद्याविनयहेतुरिन्द्रियजयः; कामक्रोधलोभमानमदहर्षत्यागात्कार्यः। कर्णत्वगक्षिजिह्वाघ्राणेन्द्रियाणां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धेष्वविप्रतिपत्तिरिन्द्रियजयः।
(२) शास्त्रार्थानुष्ठानं वा। कृत्स्नं हि शास्त्रमिदमिन्द्रियजयः। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति। यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यामभिमन्यमानः सबन्धुराष्ट्रो विननाश। करालश्च वैदेहः। कोपाज्जनमेजया ब्राह्मणेपु विक्रान्तस्तालजङ्घश्च भृगुषु। लोभादैलश्चातुर्वर्ण्यमत्याहारयमाणः सौवीरश्चाजबिन्दुः। मानाद्रावणः परदारानप्रयच्छन्। दुर्योधनो राज्याद्देशं च। मदाद् दम्भोद्भवो भूताव-
काम-क्रोधादि छह शत्रुओं का परित्याग
( १ ) विद्या और विनय का हेतु इन्द्रियजय है; अतः काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष के त्याग से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नासिका को उनके विषयों : शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में प्रवृत्त न होने देना ही इन्द्रियजय कहलाता है।
( २ ) अथवा शास्त्रों में प्रतिपादित कर्तव्यों के सम्यक् अनुष्ठान को ही इन्द्रियजय कहते हैं। सारे शास्त्रों का मूल कारण इन्द्रियजय है। शास्त्रविहित कर्तव्यों के विपरीत आचरण करने वाला इन्द्रिय-लोलुप राजा सारी पृथिवी का अधिपति होता हुआ भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उदाहरणस्वरूप भोजवंशीय दाण्डक्य नामक राजा काम-वश ब्राह्मणकन्या का अपहरण करने के अपराध में, उसके पिता के शाप से, सपरिवार एवं सराष्ट्र विनष्ट हो गया। यही गति विदेह देश के राजा कराल की भी हुई। क्रोधवश राजा जनमेजय भी ब्राह्मणों से कलह कर बैठा और वह भी उनके शाप से नष्ट हो गया। इसी प्रकार भृगुवंशियों से कलह करने पर तालजंघ की भी दुर्गति हुई। लोभाभिभूत होकर इला का पुत्र पुरूरवा, चारों वर्णों से अत्याचारपूर्वक धन का अपहरण करने के कारण, उनके अभिशाप से मारा गया। यही हाल सौवीर देश के राजा अजबिन्दु का भी हुआ। अभिमानी रावण पर-पत्नी के अपहरण के अपराध से और दुर्योधन अपने भाइयों को राज्य का भाग न देने के अन्याय से मारे
प्र० ३ : अ० ५ ] काम-क्रोधादि छह शत्रुओं का परित्याग १७
मानी हैहयश्चार्जुनः । हर्षाद्वातापिरगस्त्यमत्यासादयन्वृष्णिसंघश्च द्वैपायनमिति ।
(१) एते चान्ये च बहवः शत्रुषद्वर्गमाश्रिताः । सबन्धुराष्ट्रा राजानो विनेशुरजितेन्द्रियाः ॥ शत्रुषद्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यो जितेन्द्रियः ।। अम्बरीषश्च नाभागो बुभुजाते चिरं महीम् ॥
इति कौटिलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमेऽधिकरणे इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः पञ्चमोऽध्यायः ।
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गये । मदोन्मत्त राजा दम्भोद्भव अपनी प्रजा का तिरस्कार करता रहा; अन्त में नर-नारायण के साथ युद्ध करते हुए वह भी विनाश को प्राप्त हुआ । इसी कारण हैहयराज अर्जुन, परशुराम के हाथ से मारा गया । हर्ष के वशीभूत होकर वातापि नाम का असुर, अगस्त्य ऋषि के साथ प्रवञ्चना करते हुए और यादवसंघ, द्वैपायन ऋषि के साथ कपट के अपराध में शापवश मृत्युमुख में जा पहुँचे ।
( १ ) कामादि छह शत्रुओं के वश में होकर, ऊपर गिनाये गए राजाओं के अतिरिक्त दूसरे भी बहुत से राजा, सबन्धु-बान्धव एवं सराज्य नष्ट हो गये । किन्तु जामदग्न्य ( परशुराम ), अम्बरीष और नाभाग ( नभाग का पुत्र ) जैसे जितेन्द्रिय राजाओं ने चिरकाल तक इस पृथिवी का निष्कण्टक राज्य भोगा ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।
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२ कौ०
| प्रकरण ३ | |
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| अध्याय ६ | # राजर्षिवृत्तम् |
(१) तस्मादरिषड्वर्गत्यागेनेन्द्रियजयं कुर्वीत। वृद्धसंयोगेन प्रज्ञां, चारेण चक्षुरुत्थानेन योगक्षेमसाधनं, कार्यानुशासनेन स्वधर्मस्थापनं, विनयं विद्योपदेशेन, लोकप्रियत्वमर्थसंयोगेन, हितेन वृत्तिम्।
(२) एवं वश्येन्द्रियः परस्त्रीद्रव्याहिंसाश्च वर्जयेत्। स्वप्नं लौल्यमनृत-मुद्धतवेषत्वमनर्थसंयोगं च; अधर्मसंयुक्तमानर्थसंयुक्तं च व्यवहारम्।
(३) धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत। न निःसुखः स्यात्। समं वा त्रिवर्गमन्योन्यानुबन्धम्। एको ह्यात्यासेवितो धर्मार्थकामानामात्मानमितरौ च पीडयति।
साधु-स्वभाव राजा की जीवनचर्या
(१) इसलिए, काम-क्रोधादि छहों शत्रुओं का सर्वथा परित्याग करके इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करे। विद्वान् पुरुषों की सङ्गति में रहकर बुद्धि का विकास करे। गुप्तचरों द्वारा स्वराष्ट्र एवं परराष्ट्र के वृत्तान्त को अवगत करे। उद्योग के द्वारा राज्य के योग-क्षेम का सम्पादन करे। राजकीय नियमों द्वारा अपने-अपने धर्म पर दृढ़ बने रहने के लिए प्रजा पर नियन्त्रण रखे। शिक्षा के प्रचार-प्रसार से प्रजा को विनम्र और शिक्षित बनावे। प्रजाजनों को धन-सम्मान प्रदान कर अपनी लोकप्रियता को बनाये रखे। दूसरों का हित करने में उत्सुक रहे।
(२) इस प्रकार इन्द्रियों को वश में रखता हुआ वह (राजा) पराई स्त्री, पराया धन और हिंसाप्रवृत्ति को सर्वथा त्याग दे। कुसमय शयन करना, चञ्चलता, झूठ बोलना, अविनीत वृत्ति बनाये रखना, इस प्रकार के आचरणों को और इस प्रकार के आचरण वाले लोगों की सङ्गति को वह छोड़ दे। उसको चाहिए कि वह अधर्माचरण और अनर्थकारी व्यवहार का भी परित्याग कर दे।
(३) काम का भी वह सेवन करे; किन्तु उससे धर्म और अर्थ को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे। सर्वथा सुखरहित जीवन-यापन न करे। परस्पर अनुबद्ध धर्म, अर्थ और काम, इस त्रिवर्ग का सन्तुलित उपभोग करे। इस त्रिवर्ग का असन्तुलित उपभोग बड़ा दुःखदायी सिद्ध होता है।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में छठवां अध्याय समाप्त ।
प्र० ३ : अ० ६ ] राजर्षि का व्यवहार १९
(१) अर्थ एव प्रधान इति कौटिल्यः; अर्थमूलौ हि धर्मकामाविति । (२) मर्यादां स्थापयेदाचार्यानमात्यान् वा । य एनमपायस्थानेभ्यो वारयेयुः । छायानालिकाप्रतोदेन वा रहसि प्रमाद्यन्तमभितुदेयुः । (३) सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् ॥
इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे इन्द्रियजये राजर्षिवृत्तं षष्ठोऽध्यायः ।
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( १ ) आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि 'धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों में अर्थ प्रधान है, धर्म और काम अर्थ पर निर्भर हैं'।
( २ ) गुरुजन और अमात्यवर्ग राजा की मर्यादा को निर्धारित करें । वे ही राजा को अनर्थकारी कार्यों से रोकते रहें । यदि वह एकान्त में प्रमाद करता हुआ बेसुध हो तो समय-सूचक यन्त्र द्वारा अथवा घंटा आदि बजाकर उसको उद्बुद्ध करें ।
( ३ ) एक पहिये की गाड़ी की भांति राजकाज भी बिना सहायता-सहयोग से नहीं चलाया जा सकता है । इसलिए राजा को चाहिए कि वह सुयोग्य अमात्यों की नियुक्ति कर उनके परामर्शों को हृदयंगम करे ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में छठवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ३ | # अमात्यनियुक्तिः # |
|---|---|
| अध्याय ७ |
(१) सहाध्यायिनोऽमात्यान् कुर्वीत, दृष्टशौचसामर्थ्यत्वादिति भारद्वाजः। ते ह्यस्य विश्वास्या भवन्तीति।
(२) नेति विशालाक्षः। सहक्रीडितत्वात् परिभवन्त्येनम्। ये ह्यस्य गुह्यसधर्मणस्तानमात्यान् कुर्वीत, समानशीलव्यसनत्वात्। ते ह्यस्य मर्मज्ञभयान्नापराध्यन्तीति।
(३) साधारण एष दोष इति पराशरः। तेषामपि मर्मज्ञभयाकृताकृतान्यनुवर्तेत।
(४) यावद्भूयो गुह्यमाचष्टे जनेभ्यः पुरुषाधिपः।
अवशः कर्मणा तेन वश्यो भवति तावताम्॥
अमात्यों की नियुक्ति
( १ ) आचार्य भारद्वाज का अभिमत है कि 'राजा, अपने सहपाठियों को अमात्य पद पर नियुक्त करे; क्योंकि उनके हृदय की पवित्रता से वह सुपरिचित होता है; उनकी कार्यक्षमता को भी वह जान चुका होता है। ऐसे ही अमात्य राजा के विश्वासपात्र होते हैं'।
( २ ) आचार्य विशालाक्ष का कहना है कि 'ऐसा उचित नहीं। एक साथ खेलने, तथा उठने-बैठने के कारण सहपाठी अमात्य राजा का तिरस्कार कर सकते हैं। इसलिए अमात्य उनको बनाना चाहिए जो कि गुप्तकार्यों में राजा का साथ देते रहे हों। समान शील और समान व्यसन होने के कारण ऐसे लोग गुप्त बातों का भेद खुल जाने के भय से, राजा का अपमान नहीं करते हैं'।
( ३ ) आचार्य पराशर के मत से आचार्य विशालाक्ष की युक्तियाँ दोषपूर्ण हैं। पराशर का कहना है कि यह बात तो दोनों ही पक्षों पर एक समान चरितार्थ होती है। ऐसा करने से यह भी तो संभव है कि गुप्त बातों का भेद खुल जाने के भय से राजा ही अमात्य की कठपुतली बन जाय ! क्योंकि :
( ४ ) राजा जिन लोगों से जितना ही अपनी गुप्त बातें प्रकट करता है, उतना ही शक्ति से क्षीण होकर वह उनके वश में हो जाता है।
प्र ० ३ : अ ० ७ ] अमात्यों की नियुक्ति २१
(१) य एनमापत्सु प्राणाबाधयुक्तास्वनुगृह्णीयुस्तानमात्यान् कुर्वीत, दृष्टानुरागत्वादिति ।
(२) नेति पिशुनः । भक्तिरेषा न बुद्धिगुणः । संख्यातार्थेषु कर्मसु नियुक्ता ये यथादिष्टमर्थं सविशेषं वा कुर्युस्तानमात्यान् कुर्वीत, दृष्टगुणत्वादिति ।
(३) नेति कौणपदन्तः । अन्यैरमात्यगुणैर्युक्ता ह्येते । पितृपैतामहानमात्यान् कुर्वीत, दृष्टापदानत्वात् । ते ह्येनमपचरन्तमपि न त्यजन्ति, सगन्धत्वात् । अमानुषेष्वपि चैतद् दृश्यते—गावो ह्यसगन्धं गोगणमतिक्रम्य सगन्धेष्वेवावतिष्ठन्ते इति ।
(४) नेति वातव्याधिः । ते ह्यस्य सर्वमपगृह्य स्वामिवत् प्रचरन्तीति । तस्मान्नीतिविदो नवानमात्यान् कुर्वीत । नवास्तु यमस्थाने दण्डधरं मन्यमाना नापराध्यन्तीति ।
( १ ) इसलिए जो पुरुष राजा की प्राणघातक आपत्तियों में रक्षा करें, उनको अमात्य नियुक्त करना चाहिए। उनके अनुराग की परीक्षा राजा कर चुका होता है ।
( २ ) आचार्य पिशुन इसको भक्ति कहते हैं । उनका कहना है कि 'प्राणों की चिन्ता न करके राजा की सहायता करना भक्ति है, सेवाधर्म है; वह बुद्धि का प्रमाण नहीं; जो कि अमात्य का सर्वोच्च गुण है । इसलिए अमात्य पद पर उन्हीं को नियुक्त करना चाहिए जो कि विशिष्ट राजकीय कार्यों पर नियुक्त होकर अपने कार्यों को विशेष योग्यता के साथ संपन्न करके दिखा दें, क्योंकि इस ढंग पर उनके बुद्धि-वैशिष्ट्य की परीक्षा हो जाती हैं' ।
( ३ ) आचार्य कौणपदन्त उक्त मत को नहीं मानते । उनका कहना है कि 'ऐसे लोग अमात्योचित गुणों से शून्य होते हैं। अमात्यपद जिनको वंश-परम्परा से उपलब्ध रहा हो, उन्हीं को इस पद पर नियुक्त करना चाहिए । वे ही उसकी सम्पूर्ण रीति-नीति से सुपरिचित होते हैं । यही कारण है कि वे अपना अपकार होने पर भी, परम्परागत सम्बन्ध के कारण राजा को नहीं छोड़ते । यह बात पशु-पक्षियों तक में देखी जाती है : गाय, अपरिचित गोष्ठ को छोड़कर परिचित गोष्ठ में ही जाकर ठहरती है' ।
( ४ ) आचार्य वातव्याधि, आचार्य कौणपदन्त के अभिमत के समर्थक नहीं हैं । उनकी मान्यता है कि 'इस प्रकार के अमात्य; राजा के सर्वस्व को अपने अधीन करके, राजा के समान स्वतन्त्र वृत्ति वाले हो जाते हैं । इसलिए नीतिकुशल राजा नये व्यक्तियों को ही अमात्य नियुक्त करे । नये अमात्य, दण्डधारी राजा को यम का दूसरा अवतार समझ कर, उसकी कभी भी अवमानना नहीं करते हैं ।'
२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण
२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण
(१) नेति बाहुदन्तीपुत्रः । शास्त्रविददृष्टकर्मा कर्मसु विषादं गच्छेत् । अभिजनप्रज्ञाशौचशौर्यानुरागयुक्तानमात्यान् कुर्वीत, गुणप्राधान्यादिति । (२) सर्वमुपपन्नमिति कौटिल्यः । कार्यसामर्थ्याद्धि पुरुषसामर्थ्यं कल्प्यते सामर्थ्यतश्च । (३) विभज्यामात्यविभवं देशकालौ च कर्म च । अमात्याः सर्व एवैते कार्याः स्युर्न तु मन्त्रिणः ॥
इति विनयाधिकारिके प्रथमाऽधिकरणेऽमात्योत्पत्तिनामकः सप्तमोऽध्यायः ।
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( १ ) आचार्य बाहुदन्तीपुत्र ( इन्द्र ) के मत से यह भी ठीक नहीं है । वे कहते हैं 'नीतिशास्त्रपारंगत, किन्तु क्रियात्मक अनुभव से शून्य व्यक्ति राजकार्यों को नहीं कर सकता है । इसलिए जो लोग कुलीन, बुद्धिमान, विश्वासपात्र, वीर और राज-भक्त हों, उनको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहिए । उनमें गुणों की प्रधानता होती है ।'
( २ ) आचार्य कौटिल्य के मतानुसार, भारद्वाज से लेकर बाहुदन्तीपुत्र तक की विचार-परम्परा, अपने-अपने स्थान पर ठीक है । 'किसी भी पुरुष के सामर्थ्य की स्थिति उसके कार्यों की सफलता पर निर्भर है, और उसकी यह कार्यक्षमता उसकी विद्या-बुद्धि के बल पर ही आँकी जा सकती है ।' इसलिए :
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह सहपाठी आदि की भी सर्वथा अवहेलना न करे । उसके लिए वह परमावश्यक है कि वह विद्या, बुद्धि, साहस, गुण, दोष, देश, काल और पात्र का विचार करके ही अमात्यों की नियुक्ति करे; किन्तु उन्हें अपना मन्त्री कदापि न बनाये ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में सातवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ४ | # मन्त्रि-पुरोहितयोर्नियुक्तिः |
|---|---|
| अध्याय ८ |
(१) जानपदोऽभिजातः स्ववग्रहः कृतशिल्पश्चक्षुष्मान् प्राज्ञो धारयि- ष्ण्णुर्दक्षो वाग्मी प्रगल्भः प्रतिपत्तिमानुत्साहप्रभावयुक्तः क्लेशसहः शुचिर्मैत्रो दृढभक्तिः शीलबलारोग्यसत्त्वसंयुक्तः स्तम्भचापल्यवर्जितः संप्रियो वैराणामकर्तेत्यमात्यसंपत् । अतः पादार्धगुणहीनौ मध्यमावरौ । (२) तेषां जनपदमवग्रहं चाप्ततः परीक्षेत, समानविद्येभ्यः शिल्पं शास्त्रचक्षुष्मत्तां च; कर्मारम्भेषु प्रज्ञां धारयिष्णुतां दाक्ष्यं च; कथायोगेषु वाग्मित्वं प्रागल्भ्यं प्रतिभानवत्त्वं च; आपद्युत्साहप्रभावौ क्लेशसहत्वं च; संव्यवहाराच्छौचं मैत्रतां दृढभक्तित्वं च; संवासिभ्यः शीलबलारोग्यसत्त्व- योगमस्तम्भमचापल्यं च; प्रत्यक्षतः संप्रियत्वमवैरित्वं च ।
मन्त्री और पुरोहित की नियुक्ति
मन्त्री की योग्यता :
(१) स्वदेशोत्पन्न, कुलीन, अवगुणशून्य, निपुण सवार एवं ललितकलाओं का ज्ञाता, अर्थशास्त्र का विद्वान्, बुद्धिमान्, स्मरणशक्तिसम्पन्न, चतुर, वाक्पटु, प्रगल्भ ( दबंग ), प्रतिवाद तथा प्रतिकार करने में समर्थ, उत्साही, प्रभावशाली, सहिष्णु, पवित्र, मित्रता के योग्य, दृढ़, स्वामिभक्त, सुशील, समर्थ, स्वस्थ, धैर्यवान्, निरभिमानी, स्थिरप्रकृति, प्रियदर्शी और द्वेषवृत्तिरहित पुरुष प्रधानमन्त्री पद के योग्य है। जिनमें इसके एक-चौथाई या आधी योग्यताएँ हों उन्हें मध्यम या निकृष्ट मन्त्री समझना चाहिए।
(२) मन्त्री नियुक्त करने से पूर्व राजा को चाहिए कि वह प्रामाणिक, सत्य-वादी एवं आप्त पुरुषों के द्वारा उनके निवासस्थान तथा उनकी आर्थिक स्थिति का; सहपाठियों के माध्यम से उनकी योग्यता तथा शास्त्रप्रवेश का; नये-नये कार्यों में नियुक्त कर उनकी बुद्धि, स्मृति तथा चतुराई का; व्याख्यानों एवं सभाओं के माध्यम से उनकी वाक्पटुता, प्रगल्भता एवं प्रतिभा का; आपत्तियों से उनके उत्साह, प्रभाव तथा सहिष्णुता का; व्यवहार से उनकी पवित्रता, मित्रता एवं दृढ़ स्वामिभक्ति का; सहवासियों एवं पड़ोसियों के माध्यम से उनके शील, बल, स्वास्थ्य, गौरव, अप्रमाद तथा स्थिरवृत्ति का पता लगाये और उनके मधुरभाषी स्वभाव तथा द्वेषरहित प्रकृति की परीक्षा स्वयं राजा करे।
२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहिला अधिकरण
२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहिला अधिकरण
(१) प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः । स्वयंदृष्टं प्रत्यक्षं, परोपदिष्टं परोक्षं, कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम् । यौगपद्यात्तु कर्मणामनेकत्वादने-कस्थत्वाच्च देशकालात्ययो मा भूदिति परोक्षममात्यैः कारयेदित्यमात्य-कर्म ।
(२) पुरोहितमुदितोदितकुलशीलं षडङ्गे वेदे दैवे निमित्ते दण्डनीत्यां चाभिविनीतमापदां दैवमानुषीणाम् अथर्वभिरुपायैश्च प्रतिकर्तारं कुर्वीत । तमाचार्यं शिष्यः, पितरं पुत्रो, भृत्यः स्वामिनमिव चानुवर्तेत ।
(३) ब्राह्मणेनैधितं क्षत्रं मन्त्रिमन्त्राभिमन्त्रितम् ।
जयत्यजितमत्यन्तं शास्त्रानुगतशस्त्रितम् ॥इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे मन्त्रिपुरोहितयोर्नियुक्तिर्नामाष्टमोऽध्यायः ।
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( १ ) प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमेय, राजा के व्यवहार की ये तीन विधियाँ हैं । स्वयं देखा हुआ प्रत्यक्ष, दूसरों के माध्यम से जाना हुआ परोक्ष और सम्पादित कार्यों से किये जाने वाले कार्यों का अनुमान करना ही अनुमेय कहलाता है । कार्यों की विधियाँ और उनके विधान एक जैसे नहीं हैं । राजा उन कार्यों को अकेला नहीं कर सकता है । जिससे कार्यों के सम्पादन में देश-काल का अतिक्रमण न हो, एतदर्थ, अमात्यों के द्वारा परोक्षरूप से राजा उन कार्यों को कराये । इसी हेतु अमात्यों की नियुक्ति और परीक्षा के लिए ऊपर वैसा विधान किया गया है ।
पुरोहित की योग्यता :
( २ ) उच्चकुलोत्पन्न; शील-गुणसम्पन्न; वेद-वेदाङ्गों का ज्ञाता; ज्योतिषशास्त्र, शकुनशास्त्र, दण्डनीति में पारङ्गत; अथर्ववेद में निर्दिष्ट उपायों द्वारा दैवी तथा मानुषी विपत्तियों का प्रतिकार करने वाला; इन योग्यताओं से सम्पन्न पुरोहित को नियुक्त करना चाहिए । जैसे आचार्य के पीछे शिष्य, पिता के पीछे पुत्र और स्वामी के पीछे भृत्य चलता है, वैसे ही राजा को पुरोहित का अनुगामी होना चाहिए ।
( ३ ) इस प्रकार ब्राह्मण पुरोहित से संवर्धित, सर्वगुणसम्पन्न योग्य मन्त्रियों के परामर्श से अभिरक्षित और शास्त्रोक्त अनुष्ठानों का आचरण करने वाला राजकुल युद्ध के बिना भी अजेय एवं अलभ्य वस्तुओं को सहज ही में स्वायत्त कर लेता है ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में आठवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ५ | # उपधाभिः शौचाशौचज्ञानममात्यानाम् |
|---|---|
| अध्याय ९ |
(१) मन्त्रिपुरोहितसखः सामान्येष्वधिकरणेषु स्थापयित्वाऽमात्यानुपधाभिः शोधयेत्। (२) पुरोहितमयाज्ययाजनाध्यापने नियुक्तममृष्यमाणं राजावक्षिपेत्। सत्त्रिभिः शपथपूर्वमेकैकममात्यमुपजापयेत्—अधार्मिकोऽयं राजा, साधु धार्मिकमन्यमस्य तत्कुलीनमवरुद्धं कुल्यमेकप्रग्रहं सामन्तमाटविकमौपपादिकं वा प्रतिपादयामः। सर्वेषामेतद्रोचते, कथं वा तवेति ? प्रत्याख्याने शुचिरिति धर्मोपधा। (३) सेनापतिरसत्प्रतिग्रहणावक्षिप्तः सत्त्रिभिरेकैकममात्यमुपजापयेल्लोभनीयेनार्थेन राजविनाशाय—सर्वेषामेतद्रोचते, कथं वा तवेति ? प्रत्याख्याने शुचिरित्यर्थोपधा।
गुप्त उपायों से अमात्यों के आचरणों की परीक्षा
(१) सामान्य पदों पर अमात्यों की नियुक्ति करके, मन्त्री और पुरोहित के सहयोग से राजा, गुप्त उपायों के द्वारा उनके आचरणों की परीक्षा करे।
(२) धर्मोपधा से राजा, पुरोहित को किसी नीच जाति के यहाँ यज्ञ करने तथा पढ़ाने के लिए नियुक्त करे। जब पुरोहित इस कार्य के लिए निषेध करे तो राजा उसको उसके पद से च्युत कर दे। वह पदच्युत पुरोहित गुप्तचर स्त्री-पुरुषों के माध्यम से शपथपूर्वक प्रत्येक अमात्य को राजा से भिन्न कराये। वह कहे ‘यह राजा बड़ा अधार्मिक है। हमें चाहिए कि उसके स्थान पर, उसके ही वंशज किसी श्रेष्ठ पुरुष को, किसी धार्मिक व्यक्ति को, समीप के किसी सामन्त को, अथवा किसी जंगल के स्वामी को, या जिसको भी एकमत होकर हम निश्चित कर लें, उसको, नियुक्त करें। मेरे इस प्रस्ताव को सब ने स्वीकार कर लिया है। बताओ, तुम्हारी क्या राय है?’ पुरोहित की यह बात सुनकर यदि अमात्य उसको स्वीकार न करे तो उसे पवित्र हृदय वाला समझना चाहिए। गुप्त धार्मिक उपायों द्वारा अमात्य के हृदय की पवित्रता की परीक्षा को ‘धर्मोपधा’ कहते हैं।
(३) अर्थोपधा से राजा, किसी निन्दनीय या अपूज्य व्यक्ति का सत्कार करने के लिए, सेनापति को आदेश दे। राजा की इस बात से जब सेनापति रुष्ट हो जाय
२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [पहला अधिकरण
(१) परिव्राजिका लब्धविश्वासाऽन्तःपुरे कृतसत्कारा महामात्रमेकैक- मुपजपेत्—राजमहिषी त्वां कामयते । कृतसमागमोपाया महानर्थश्चते भवि- ष्यतीति । प्रत्याख्याने शुचिरिति कामोपधा ।
(२) प्रवहणनिमित्तमेकोऽमात्यः सर्वानमात्यानावाहयेत् । तेनोद्वेगेन राजा तानवरुन्ध्यात् । कापटिकच्छात्रः पूर्वाविरुद्धस्तेषामर्थमानावक्षिप्तमेकै- कममात्यमुपजपेत्—असत्प्रवृत्तोऽयं राजा, सहसैनं हत्वाऽन्यं प्रतिपादयामः । सर्वेषामेतद्रोचते, कथं वा तवेति ? प्रत्याख्याने शुचिरिति भयोपधा ।
(३) तत्र धर्मोपधाशुद्धान् धर्मस्थीयकण्टकशोधनेषु स्थापयेत्, अर्थो-
तो राजा उसको भी पदच्युत कर दे । वह पदच्युत अपमानित सेनापति गुप्तभेदियों द्वारा अमात्य को धन का प्रलोभन देकर उसे पूर्वोक्त विधि से राजा के विनाश के लिए उकसाये । वह कहे 'मेरी इस युक्ति को सभी ने स्वीकार कर लिया है । बताओ, तुम्हारी क्या सम्मति है ?' सेनापति की यह बात सुनकर अमात्य यदि उसका विरोध करे तो समझ लेना चाहिए कि वह पवित्र हृदय वाला है । गुप्त आर्थिक उपायों द्वारा अमात्य के हृदय की पवित्रता की परीक्षा को ही 'अर्थोपधा' कहते हैं ।
(१) कामोपधा से राजा किसी सन्यासिनी का वेष धारण करने वाली विशेष गुप्तचर स्त्री को अन्तःपुर में ले जाकर उसका अच्छा स्वागत-सत्कार करे और फिर वह एक-एक अमात्य के निकट जाकर कहे 'महामात्य, महारानी जी आप पर आसक्त हैं । आपके समागम के लिए उन्होंने पूरी व्यवस्था कर दी है । इससे आपको यथेष्ट धन भी प्राप्त होगा ।' अमात्य यदि उसका विरोध करे तो उसे पवित्रचित्त समझना चाहिए । गुप्त कामसम्बन्धी उपायों द्वारा अमात्य के हृदय की पवित्रता की परीक्षा को ही 'कामोपधा' कहते हैं ।
(२) भयोपधा से नौका-विहार के लिए एक अमात्य दूसरे अमात्यों को बुलाये; इस प्रस्ताव पर राजा उत्तेजित होकर उन सब को दण्डित कर दे । तदनन्तर राजा द्वारा पहले अपकृत हुआ कपट-वेषधारी छात्र (छात्र के वेश में गुप्तचर) उस तिरस्कृत एवं दण्डित अमात्य के निकट जाकर उससे कहे 'यह राजा बहुत ही बुरा है । इसका वध करके हम किसी दूसरे राजा को उसके स्थान पर नियुक्त करें । सभी अमात्यों को यह स्वीकृत है । कहिए, आपकी क्या राय है ?' अमात्य यदि उसका विरोध करे तो उसको शुचिचित्त समझना चाहिए । गुप्तभय सम्बन्धी उपायों द्वारा अमात्य की शुचिता की परीक्षा को ही 'भयोपधा' कहते हैं ।
परीक्षित अमात्यों की नियुक्ति
(३) जो अमात्य धर्मपरीक्षा में खरे उतरें उन्हें धर्मस्थानीय (दीवानी कचहरी)
प्र० ५ : अ० ६ ] अमात्यों के आचरणों की परीक्षा २७
पधाशुद्धान् समाहर्तृसन्निधातृनिचयकर्मसु, कामोपधाशुद्धान् बाह्याभ्यन्तर-विहाररक्षासु, भयोपधाशुद्धानासन्नकार्येषु राज्ञः । सर्वोपधाशुद्धान् मन्त्रिणः कुर्यात् । सर्वत्राशुचीन् खनिद्रव्यहस्तिवनकर्मान्तेषूपयोजयेत् ।
(१) त्रिवर्गभयसंशुद्धानमात्यान् स्वेषु कर्मसु । अधिकुर्याद् यथाशौचमित्याचार्या व्यवस्थिताः ॥
(२) न त्वेव कुर्यादात्मानं देवीं वा लक्ष्मीश्वरः । शौचहेतोरमात्यानामेतत् कौटिल्यदर्शनम् ॥
(३) न दूषणमदुष्टस्य विषेनेवाम्भसश्चरेत् । कदाचिद्धि प्रदुष्टस्य नाधिगम्येत भेषजम् ॥
(४) कृता च कलुषा बुद्धिरुपधाभिश्चतुर्विधा । नागत्वाऽन्तन्निवर्तेत स्थिता सत्त्ववतां धृतौ ॥
तथा कण्टकशोधन ( फौजदारी कचहरी ) सम्बन्धी कार्यों में नियुक्त करना चाहिए। अर्थपरीक्षा में उत्तीर्ण अमात्यों को समाहर्ता ( टैक्स कलक्टर ) तथा सन्निधाता ( कोषाध्यक्ष ) के पदों पर रखना चाहिए। कामोपधा में परीक्षित अमात्यों को बाहरी विलास-स्थानों ( विहारों ) तथा भीतरी अन्तःपुर-सम्बन्धी रक्षा का व्यवस्था-भार सौंपना चाहिए। भयपरीक्षा में उत्तीर्ण अमात्यों को राजा अपना अङ्गरक्षक नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त जो अमात्य सभी परीक्षाओं में खरे उतरे हों उन्हें मन्त्रिपद पर नियुक्त किया जाना चाहिए; और सभी परीक्षाओं में असफल अमात्यों को खदानों, हाथियों और जङ्गलों आदि की परिश्रम-साध्य व्यवस्था का भार सौंपना चाहिए।
( १ ) सभी पुरातन अर्थशास्त्रविद् आचार्यों का यही अभिमत है कि 'धर्म, अर्थ, काम और भय द्वारा परीक्षित पवित्र अमात्यों को, उनकी कार्यक्षमता के अनुसार कार्यभार सौंपना चाहिए।'
( २ ) किन्तु, इस सम्बन्ध में आचार्य कौटिल्य का एक संशोधन यह है कि 'अमात्यों की परीक्षा अवश्य ली जाय; पर उस परीक्षा का माध्यम राजा अपने को तथा रानी को न बनाये ।
( ३ ) क्योंकि कभी-कभी किसी निर्दोष अमात्य को छल-प्रपञ्चयुक्त इन गुप्त-रीतियों से ठगा जाना, पानी में विष घोल देने के समान हो जाता है। सम्भव हो सकता है कि उक्त रीतियों से बिगड़ा हुआ अमात्य फिर कभी भी सुधर न सके। क्योंकि :
( ४ ) छल-छद्म जैसे कपट उपायों के द्वारा ठगे गये चरित्रवान पुरुष की बुद्धि
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में नवाँ अध्याय समाप्त ।
२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण
(१)
तस्माद् बाह्यमधिष्ठानं कृत्वा कार्ये चतुर्विधे ।
शौचाशौचममात्यानां राजा मार्गेत सत्त्रिभिः ॥
इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे उपधाभिः शौचाशौच-
ज्ञानममात्यानां नवमोऽध्यायः ।
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तब तक चैन नहीं लेती, जब तक उसने अभीष्ट को प्राप्त न कर लिया हो (अर्थात् अपने अपमान का बदला न ले लिया हो) ।
(१) इसलिये सर्वोत्तम यही है कि उक्त चारों उपायों से परीक्षण के लिए राजा, किसी बाह्य वस्तु को माध्यम बनाये और गुप्तचरों द्वारा अमात्यों के चरित्र की परीक्षा करे ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में नवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ६ | ## गूढपुरुषोत्पत्तिः |
|---|---|
| अध्याय १० |
(१) उपधाभिः शुद्धामात्यवर्गो गूढपुरुषानुत्पादयेत् । कापटिकोदा-
स्थितगृहपतिवैदेहकतापसव्यञ्जनान् सत्रितीक्ष्णरसदभिक्षुकीश्च ।
(२) परमर्मज्ञः प्रगल्भश्छात्रः कापटिकः । तमर्थमानाभ्यामुत्साह्य
मन्त्री ब्रूयात्—राजानं मां च प्रमाणं कृत्वा यस्य यदकुशलं पश्यसि तत्त-
दानीमेव प्रत्यादिशेति ।
(३) प्रव्रज्याप्रत्यवसितः प्रज्ञाशौचयुक्त उदास्थितः । स वार्त्ताकर्मप्रदि-
ष्टायां भूमौ प्रभूतहिरण्यान्तेवासी कर्म कारयेत् । कर्मफलाच्च सर्वप्रव्रजि-
तानां ग्रासाच्छादनावस्थानप्रतिविदध्यात् । वृत्तिकामांश्चोपजपेत्—एतेनैव
वेषेण राजार्थश्चरितव्यो भक्तवेतनकाले चोपस्थातव्यमिति । सर्वप्रव्रजिताश्च
स्वं स्वं वर्गमुपजपेयुः ।
गुप्तचरों की नियुक्ति
( स्थायी गुप्तचर )
( १ ) धर्मोपधा आदि उपायों के द्वारा अमात्यवर्ग की परीक्षा कर लेने के अनन्तर राजा गुप्तचरों की नियुक्ति करे । कापटिक, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक, तापस, सत्री, तीक्ष्ण, रसद और भिक्षुकी आदि अनेक प्रकार के गुप्तचर होते हैं ।
( २ ) दूसरों के रहस्यों को जानने वाला, बड़ा प्रगल्भ ( दबंग ) और विद्यार्थी की वेष-भूषा में रहने वाला गुप्तचर 'कापटिक' कहलाता है । इस गुप्तचर को धन, मान और सत्कार से सन्तुष्ट कर मन्त्री उससे कहे 'जिस-किसी की भी तुम हानि होते देखो, राजा को और मुझे प्रमाण मान कर तत्काल ही तुम मुझे सूचित कर दो ।'
( ३ ) बुद्धिमान्, सदाचारी, संन्यासी के वेष में रहने वाले गुप्तचर का नाम 'उदास्थित' है । वह अपने साथ बहुत-से विद्यार्थी और बहुत-सा धन लेकर, वहाँ जाकर विद्यार्थियों द्वारा कार्य करवाये, जहाँ कृषि, पशुपालन एवं व्यापार के लिए भूमि नियुक्त है । उस कार्य को करने से जो लाभ हो, उससे वह सब संन्यासियों के भोजन, वस्त्र एवं निवास का प्रबन्ध करे । जो भी इस प्रकार की आजीविका की इच्छा करें, उन्हें सब तरह से अपने वश में कर ले और उनसे कहे 'तुम्हें इसी वेष में राजा का कार्य करना है । जब तुम्हारे वेतन तथा भत्ते का समय आये, यहाँ उपस्थित
| ३० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ पहला अधिकरण |
|---|
(१) कर्षको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तो गृहपतिकव्यञ्जनः। स कृषिकर्मप्रदिष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेण। (२) वाणिजको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तो वैदेहकव्यञ्जनः। स वणिक्कर्मप्रदिष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेण। (३) मुण्डो जटिलो वा वृत्तिकामस्तापसव्यञ्जनः। स नगराभ्याशे प्रभूतमुण्डजटिलान्तेवासी शाकं यवसमुष्टिं वा मासद्विमासान्तरं प्रकाशमश्नीयात्, गूढमिष्टमाहारम्। वैदेहकान्तेवासिनश्चैनं समृद्धियोगैरर्चयेयुः। शिष्याश्चास्यावेदयेयुः—असौ सिद्धः सामेशिक इति। समेधाशास्तिभिश्चाभिगतानामङ्गविद्यया शिष्यसंज्ञाभिश्च कर्माण्यभिजनेऽवसितान्यादिशेदल्पलाभमग्निदाहं चोरभयं दूष्यवधं तुष्टिदानं विदेशप्रवृत्तिज्ञानम् इदमद्य श्वो वा भविष्यतीदं वा राजा करिष्यतीति।
हो जाना।' दूसरे संन्यासी भी अपने-अपने संप्रदाय के संन्यासियों को इसी प्रकार समझा-बुझा दें।
(१) बुद्धिमान्, पवित्र हृदय और गरीब किसान के वेष में रहने वाले गुप्तचर को 'गृहपतिक' कहते हैं। वह कृषिकार्य के लिए नियुक्त भूमि में जाकर 'उदास्थित' गुप्तचर के ही समान कार्य करे।
(२) बुद्धिमान्, पवित्र हृदय, गरीब, व्यापारी के वेष में रहने वाला गुप्तचर 'वैदेहक' है। वह व्यापारकार्य के लिए नियुक्त भूमि में जाकर 'उदास्थित' गुप्तचर की भाँति कार्य करता हुआ रहे।
(३) जीविका के लिए सिर मुँड़ाये या जटा धारण किये हुए, राजा का कार्य करने वाला गुप्तचर ही 'तापस' है। वह कहीं नगर के समीप ही बहुत से मुंड या जटिल विद्यार्थियों को लेकर रहे और महीने दो महीने तक लोगों के सामने हरा शाक या मुट्ठीभर अनाज खाता रहे; वैसे छिपे तौर पर अपनी इच्छानुसार सुस्वादु भोजन करता रहे। वैदेहक तथा उसके अनुचर 'तापस' गुप्तचर की पूजा-अर्चना करें। शिष्यमंडली घूम-घूम कर यह प्रचार करे कि यह तपस्वी पूर्ण सिद्ध, भविष्य-वक्ता और लौकिक शक्तियों से संपन्न है। अपना भविष्य-फल जानने की इच्छा से आये हुए लोगों की पारिवारिक पहिचान, उनके शारीरिक चिह्नों के माध्यम से तथा अपने शिष्यों के संकेतों के अनुसार बतावे। ऐसा भी बतावे कि इन-इन कार्यों में थोड़ा लाभ का योग है। इसके अतिरिक्त वह, आग लगने, चोरी हो जाने; दुष्ट लोगों के वधस्वरूप इनाम देने; देश-विदेश के फल; यह कार्य आज होगा या कल; या इस कार्य को राजा करेगा; आदि बातें भी उसको बतावे।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दसवाँ अध्याय समाप्त।
प्र० ६ : अ० १० ] गुप्तचरों की नियुक्ति ३१
(१) तदस्य गूढाः सत्रिरणश्च संवादयेयुः। सत्त्वप्रज्ञावाक्यशक्तिसम्पन्नानां राजभाव्यमनुव्याहरेन्मन्त्रिसंयोगं च। मन्त्री चैषां वृत्तिकर्मभ्यां विद्यतेत। (२) ये च कारणादभिक्रुद्धास्तानर्थमानाभ्यां शमयेत्, अकारणक्रुद्धान् तूष्णींदण्डेन राजद्विष्टकारिणश्च। (३) पूजिताश्चार्थमानाभ्यां राज्ञा राजोपजीविनाम्। जानीयुः शौचमित्येताः पञ्च संस्थाः प्रकीर्तिताः॥
इति कौटलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे गूढपुरुषोत्पत्तौ संस्थोत्पत्तिर्नाम दशमोऽध्यायः॥
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(१) इस प्रश्नोत्तर प्रसंग में 'तापस' गुप्तचर की दूसरे सत्री आदि गुप्तचर सहायता करें। प्रश्नकर्ताओं में यदि धीर, बुद्धिमान्, चतुर लोग हों तो उनसे वह, राजा की ओर से, धन प्राप्त होने की बात कहे; मन्त्री के साथ भी उनकी मुलाकात का संयोग बताये। जब मंत्री से इन लोगों की मुलाकात हो तो उचित यह होगा कि ऐसे लोगों को मंत्री धन तथा आजीविका आदि देकर, गुप्तचर की भविष्यवाणी को सच्ची सिद्ध कर दे।
(२) जो लोग किसी कारणवश क्रुद्ध हो गए हों उन्हें धन एवं सम्मान देकर संतुष्ट किया जाय। जो बिना कारण ही क्रुद्ध हों तथा राजा से द्वेष रखते हों, उनका चुपचाप वध करवा डाले।
(३) इस प्रकार धन और मान से राजा द्वारा सम्मानित गुप्तचर तथा अमात्य आदि राजोपजीवी पुरुषों के सद्व्यवहारों को भली-भांति जान लें। पाँच प्रकार के गुप्तचर पुरुषों की नियुक्ति और उनके कार्यों के विवरण का यही विधान है।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दसवाँ अध्याय समाप्त।
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| प्रकरण ७ | गूढपुरुषप्रणिधिः |
|---|---|
| अध्याय ११ |
(१) ये चास्य सम्बन्धिनोऽवश्यभर्तव्यास्ते लक्षणमङ्गविद्यां जम्भकविद्यां मायागतमाश्रमधर्मं निमित्तमन्तरचक्रमित्यधीयानाः सत्रिणः संसर्गविद्या वा। (२) ये जनपदे शूरास्त्यक्तात्मानो हस्तिनं व्यालं वा द्रव्यहेतोः प्रतियोधयेयुस्ते तीक्ष्णाः। (३) ये बन्धुषु निःस्नेहाः क्रूराश्चालसाश्च ते रसदाः। (४) परिव्राजिका वृत्तिकामा दरिद्रा विधवा प्रगल्भा ब्राह्मण्यन्तःपुरे कृतसत्कारा महामात्रकुलान्यधिगच्छेत्। एतया मुण्डावृषल्यो व्याख्याताः। इति सञ्चाराः।
गुप्तचरों की नियुक्ति
(भ्रमणशील गुप्तचर)
(१) जो राजा के संबंधी न हों; किन्तु जिनका पालन-पोषण करना राजा के लिए आवश्यक हो; जो सामुद्रिक विद्या, ज्योतिष, व्याकरण आदि अंगों का शुभाशुभ फल बताने वाली विद्या; वशीकरण; इन्द्रजाल; धर्मशास्त्र; शकुनशास्त्र; पक्षिशास्त्र; कामशास्त्र तथा तत्संबंधी नाचने-गाने की कला में निपुण हों वे 'सत्री' कहलाते हैं। [ १०वें अध्याय में जिन गुप्तचरों का वर्णन किया गया है वे एक ही स्थान पर रहकर कार्य करने के कारण 'संस्था' कहलाते हैं। इस अध्याय में वर्णित गुप्तचर 'संचार' कहलाते हैं, जो कि घूम-घूम कर कार्य करते हैं।]
(२) अपने देश में रहने वाले ऐसे व्यक्ति, जो द्रव्य के लिए अपने प्राणों की भी परवाह न करके हाथी, बाघ और सांप से भी भिड़ जाते हैं, उन्हें 'तीक्ष्ण' कहते हैं।
(३) अपने भाई-बंधुओं से भी स्नेह न रखने वाले, क्रूरप्रकृति और आलसी स्वभाव वाले व्यक्ति 'रसद' (जहर देने वाला) कहलाते हैं।
(४) आजीविका की इच्छुक, दरिद्र, प्रौढ, विधवा, दबंग ब्राह्मणी, रनिवास में सम्मानित, प्रधान अमात्यों के घर में प्रवेश पानेवाली 'परिव्राजिका' (संन्यासिनी के वेश में खुफिया का काम करने वाली) नाम की गुप्तचरी कहलाती है। इसी प्रकार मुंडा (मुंडित बौद्ध-भिक्षुणी) और वृषली (शूद्रा) आदि नारी गुप्तचरियों को भी जान लेना चाहिए। ये सभी 'संचार' नामक गुप्तचर हैं।
प्र० ७ : अ० ११ ] गुप्तचरों की नियुक्ति ३३
(१) तान् राजा स्वविषये मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजदौवारिकान्तर्वंशिकप्रशास्तृसमाहर्तृसन्निधातृप्रदेष्टृनायकपौरव्यावहारिककार्मान्तिकमन्त्रिपरिषदध्यक्षदण्डदुर्गान्तपालाटाविकेषु श्रद्धेयदेशवेषशिल्पभाषाभिजनापदेशान् भक्तितः सामर्थ्ययोगाच्चापसर्पयेत् । (२) तेषां बाह्यं चारं छत्रभृङ्गारव्यजनपादुकासनयानवाहनोपग्राहिणस्तीक्ष्णा विद्युः । तं सत्त्रिणः संस्थास्वर्पयेयुः । (३) सूदारालिकस्नापकसंवाहकास्तरककल्पकप्रसाधकोदकपरिचारका रसदाः कुब्जवामनकिरातमूकबधिरजडान्धच्छद्मानो नटनर्तकगायनवादकवाग्जीवनकुशीलवाः स्त्रियश्चाभ्यन्तरं चारं विद्युः । तं भिक्षुक्यः संस्थास्वर्पयेयुः ।
( १ ) राजा को चाहिए कि वह, इन सत्री आदि गुप्तचरों को मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, ड्योढ़ीदार, अन्तःपुररक्षक, छावनी-रक्षक, कलक्टर, कोषाध्यक्ष, कमिशनर, हवलदार, नगरमुखिया, खदान-निरीक्षक, मन्त्रि-परिषद् का अध्यक्ष, सेना-रक्षक, दुर्गरक्षक, सीमारक्षक और अटवीपाल आदि अधिकारियों के समीप, वेष, बोली, कौशल, भाषा तथा कुलीनता के आधार पर उनकी भक्ति और उनके सामर्थ्य की परीक्षा करके, तब रवाना करे ।
( २ ) उनमें से तीक्ष्ण नामक गुप्तचर का कर्तव्य है कि वह छत्र, चामर, व्यजन, पादुका, आसन, शिविका ( पालकी ) और घोड़े आदि बाहरी उपकरणों की देख-रेख करता हुआ अमात्य आदि की सेवा करे और उनके व्यवहारों को जाने । तीक्ष्ण गुप्तचर द्वारा जानी हुई बातों को सत्री नामक गुप्तचर स्थानिक कापटिक आदि गुप्तचरों को बता दे ।
( ३ ) सूद ( रसोइया ), आरालिक ( मांस पकाने वाला ), स्नापक ( नहलाने वाला ), संवाहक ( हाथ-पैर दबाने वाला ), आस्तरक ( विस्तर बिछाने वाला ), कल्पक ( नाई ), प्रसाधक ( श्रृंगार करने वाला ) और उदक-परिचारक ( जल भरने वाला ) आदि विभिन्न रूप-नामों में रह कर रसद नामक गुप्तचर, मन्त्री आदि उच्च अधिकारियों के भेदों का पता लगाये । इसी प्रकार कुबड़े, बौने, किरात ( जङ्गली आदमी ), गूँगे, बहरे, मूर्ख, अन्धे आदि के वेष में गुप्तचर और नट, नाचने-गाने-बजाने वाले, कहानी कहने वाले, कूद-फाँद कर खेल दिखाने वाले, आदि के वेष में स्त्री गुप्तचर सब रहस्यों का पता लगा ले । भिक्षुकी वेष धारण करने वाली गुप्तचर महिला को चाहिये कि वह रसद आदि पुरुष गुप्तचरों से प्राप्त समाचारों को कापटिक आदि गुप्तचरों तक पहुँचा दे ।
३ कौ०
| ३४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ पहला अधिकरण |
|---|
(१) संस्थानामन्तेवासिनः संज्ञालिपिभिश्चारसञ्चारं कुर्युः । न चान्योन्यं संस्थास्ते वा विद्युः । (२) भिक्षुकीप्रतिषेधे द्वाःस्थपरम्परा मातापितृव्यञ्जनाः शिल्पकारिकाः कुशीलवा दास्यो वा गीतपाठचवाद्यभाण्डगूढलेख्यसंज्ञाभिर्वा चारं निर्हरेयुः । दीर्घरोगोन्मादाग्निरसविसर्गेण वा गूढनिर्गमनम् । (३) त्रयाणामेकवाक्ये सम्प्रत्ययः । तेषामभीक्ष्णविनिपाते तूष्णींदण्डः प्रतिषेधो वा । (४) कण्टकशोधनोक्ताश्चापसर्पाः परेषु कृतवेतना वसेयुः सम्पातनिश्श्रारार्थं, त उभयवेतनाः ।
( १ ) संस्थाओं ( कापटिक आदि गुप्तचरों ) के विद्यार्थी अपनी विशिष्ट संकेत-लिपि द्वारा उस सूचना को राजा तक पहुँचावें । ऐसा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संस्था-गुप्तचरों को संचार-गुप्तचर और संचार-गुप्तचरों को संस्था-गुप्तचर बिलकुल न जानने पावें ।
( २ ) यदि अमात्य आदि के घरों में भिक्षुकी का अंतःप्रवेश निषिद्ध हो तो वह समाचार द्वारपालों के माध्यम से बाहर भिक्षुकी तक पहुँचे । यदि इसमें भी कुछ आशंका या असम्भव जान पड़े तो अंतःपुर के नौकरों के माता-पिता बनने का बहाना करके वृद्धा स्त्री-पुरुष भीतर प्रवेश करके रहस्य का पता लगायें । या तो रानियों के बाल सवाँरने वाली या नाचने-गाने वाली स्त्रियों अथवा दासियों द्वारा, अथवा निजी संकेतों वाले गीतों, श्लोकों, प्रार्थनाओं, या तो बाजों, बर्तनों, टोकरियों में गुप्त लेख रखकर, अथवा अन्य विधियों से, जैसा भी समय के अनुसार अपेक्ष्य हो, अंतःपुर के समाचारों को बाहर लाया जाय । यदि इन युक्तियों से भी सफलता न मिले तो गुप्तचर को चाहिए कि वह किसी भयङ्कर बीमारी अथवा पागलपन के बहाने से आग लगाकर या किसी को जहर देकर ( जिससे अंतःपुर में कोलाहल मच जाये ) चुपचाप बाहर निकल आवे ।
( ३ ) परस्पर अपरिचित तीन गुप्तचरों द्वारा लाये गये समाचार यदि एक ही तरह से मिलें तो उन्हें ठीक समझना चाहिए । यदि वे परस्पर विरोधी समाचारों को लायें तो उन्हें या तो नौकरी से अलग कर दिया जाय अथवा चुपचाप पिटवाया जाय ।
( ४ ) उक्त गुप्तचरों के अतिरिक्त ‘कंटकशोधन’ प्रकरण में आगे बताये गए गुप्तचरों को भी नियुक्त करना चाहिये । ऐसे गुप्तचर विदेशों में जाकर वहाँ की सरकार के वेतनभोगी नौकर बनें और उनके गुप्त रहस्यों को समझें । ये गुप्तचर मित्र-पक्ष और शत्रु-पक्ष दोनों ओर से वेतन लें ।