भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ५ : अ० ६ ] अमात्यों के आचरणों की परीक्षा २७

पधाशुद्धान् समाहर्तृसन्निधातृनिचयकर्मसु, कामोपधाशुद्धान् बाह्याभ्यन्तर-विहाररक्षासु, भयोपधाशुद्धानासन्नकार्येषु राज्ञः । सर्वोपधाशुद्धान् मन्त्रिणः कुर्यात् । सर्वत्राशुचीन् खनिद्रव्यहस्तिवनकर्मान्तेषूपयोजयेत् ।

(१) त्रिवर्गभयसंशुद्धानमात्यान् स्वेषु कर्मसु । अधिकुर्याद् यथाशौचमित्याचार्या व्यवस्थिताः ॥

(२) न त्वेव कुर्यादात्मानं देवीं वा लक्ष्मीश्वरः । शौचहेतोरमात्यानामेतत् कौटिल्यदर्शनम् ॥

(३) न दूषणमदुष्टस्य विषेनेवाम्भसश्चरेत् । कदाचिद्धि प्रदुष्टस्य नाधिगम्येत भेषजम् ॥

(४) कृता च कलुषा बुद्धिरुपधाभिश्चतुर्विधा । नागत्वाऽन्तन्निवर्तेत स्थिता सत्त्ववतां धृतौ ॥


तथा कण्टकशोधन ( फौजदारी कचहरी ) सम्बन्धी कार्यों में नियुक्त करना चाहिए। अर्थपरीक्षा में उत्तीर्ण अमात्यों को समाहर्ता ( टैक्स कलक्टर ) तथा सन्निधाता ( कोषाध्यक्ष ) के पदों पर रखना चाहिए। कामोपधा में परीक्षित अमात्यों को बाहरी विलास-स्थानों ( विहारों ) तथा भीतरी अन्तःपुर-सम्बन्धी रक्षा का व्यवस्था-भार सौंपना चाहिए। भयपरीक्षा में उत्तीर्ण अमात्यों को राजा अपना अङ्गरक्षक नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त जो अमात्य सभी परीक्षाओं में खरे उतरे हों उन्हें मन्त्रिपद पर नियुक्त किया जाना चाहिए; और सभी परीक्षाओं में असफल अमात्यों को खदानों, हाथियों और जङ्गलों आदि की परिश्रम-साध्य व्यवस्था का भार सौंपना चाहिए।

( १ ) सभी पुरातन अर्थशास्त्रविद् आचार्यों का यही अभिमत है कि 'धर्म, अर्थ, काम और भय द्वारा परीक्षित पवित्र अमात्यों को, उनकी कार्यक्षमता के अनुसार कार्यभार सौंपना चाहिए।'

( २ ) किन्तु, इस सम्बन्ध में आचार्य कौटिल्य का एक संशोधन यह है कि 'अमात्यों की परीक्षा अवश्य ली जाय; पर उस परीक्षा का माध्यम राजा अपने को तथा रानी को न बनाये ।

( ३ ) क्योंकि कभी-कभी किसी निर्दोष अमात्य को छल-प्रपञ्चयुक्त इन गुप्त-रीतियों से ठगा जाना, पानी में विष घोल देने के समान हो जाता है। सम्भव हो सकता है कि उक्त रीतियों से बिगड़ा हुआ अमात्य फिर कभी भी सुधर न सके। क्योंकि :

( ४ ) छल-छद्म जैसे कपट उपायों के द्वारा ठगे गये चरित्रवान पुरुष की बुद्धि