भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [पहला अधिकरण

(१) परिव्राजिका लब्धविश्वासाऽन्तःपुरे कृतसत्कारा महामात्रमेकैक- मुपजपेत्—राजमहिषी त्वां कामयते । कृतसमागमोपाया महानर्थश्चते भवि- ष्यतीति । प्रत्याख्याने शुचिरिति कामोपधा ।

(२) प्रवहणनिमित्तमेकोऽमात्यः सर्वानमात्यानावाहयेत् । तेनोद्वेगेन राजा तानवरुन्ध्यात् । कापटिकच्छात्रः पूर्वाविरुद्धस्तेषामर्थमानावक्षिप्तमेकै- कममात्यमुपजपेत्—असत्प्रवृत्तोऽयं राजा, सहसैनं हत्वाऽन्यं प्रतिपादयामः । सर्वेषामेतद्रोचते, कथं वा तवेति ? प्रत्याख्याने शुचिरिति भयोपधा ।

(३) तत्र धर्मोपधाशुद्धान् धर्मस्थीयकण्टकशोधनेषु स्थापयेत्, अर्थो-

तो राजा उसको भी पदच्युत कर दे । वह पदच्युत अपमानित सेनापति गुप्तभेदियों द्वारा अमात्य को धन का प्रलोभन देकर उसे पूर्वोक्त विधि से राजा के विनाश के लिए उकसाये । वह कहे 'मेरी इस युक्ति को सभी ने स्वीकार कर लिया है । बताओ, तुम्हारी क्या सम्मति है ?' सेनापति की यह बात सुनकर अमात्य यदि उसका विरोध करे तो समझ लेना चाहिए कि वह पवित्र हृदय वाला है । गुप्त आर्थिक उपायों द्वारा अमात्य के हृदय की पवित्रता की परीक्षा को ही 'अर्थोपधा' कहते हैं ।

(१) कामोपधा से राजा किसी सन्यासिनी का वेष धारण करने वाली विशेष गुप्तचर स्त्री को अन्तःपुर में ले जाकर उसका अच्छा स्वागत-सत्कार करे और फिर वह एक-एक अमात्य के निकट जाकर कहे 'महामात्य, महारानी जी आप पर आसक्त हैं । आपके समागम के लिए उन्होंने पूरी व्यवस्था कर दी है । इससे आपको यथेष्ट धन भी प्राप्त होगा ।' अमात्य यदि उसका विरोध करे तो उसे पवित्रचित्त समझना चाहिए । गुप्त कामसम्बन्धी उपायों द्वारा अमात्य के हृदय की पवित्रता की परीक्षा को ही 'कामोपधा' कहते हैं ।

(२) भयोपधा से नौका-विहार के लिए एक अमात्य दूसरे अमात्यों को बुलाये; इस प्रस्ताव पर राजा उत्तेजित होकर उन सब को दण्डित कर दे । तदनन्तर राजा द्वारा पहले अपकृत हुआ कपट-वेषधारी छात्र (छात्र के वेश में गुप्तचर) उस तिरस्कृत एवं दण्डित अमात्य के निकट जाकर उससे कहे 'यह राजा बहुत ही बुरा है । इसका वध करके हम किसी दूसरे राजा को उसके स्थान पर नियुक्त करें । सभी अमात्यों को यह स्वीकृत है । कहिए, आपकी क्या राय है ?' अमात्य यदि उसका विरोध करे तो उसको शुचिचित्त समझना चाहिए । गुप्तभय सम्बन्धी उपायों द्वारा अमात्य की शुचिता की परीक्षा को ही 'भयोपधा' कहते हैं ।

परीक्षित अमात्यों की नियुक्ति

(३) जो अमात्य धर्मपरीक्षा में खरे उतरें उन्हें धर्मस्थानीय (दीवानी कचहरी)