कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त ।
९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
कुमारीपुरं, मुण्डहर्म्यं द्वितलं मुण्डकद्वारं, भूमिद्रव्यवशेन वा। त्रिभागा- धिकायामा भाण्डवाहिनीः कुल्याः कारयेत् । (१) तासु पाषाणकुद्दालकुठारीकाण्डकल्पनाः । मुसुण्डिमुद्गरा दण्डचक्रयन्त्रशतघ्नयः ॥ कार्याः कार्मारिकाः शूला वेधनाग्राश्च वेणवः । उष्ट्रग्रीव्योऽग्निसंयोगाः कुप्यकल्पे च यो विधिः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे दुर्गविधानं नाम तृतीयोध्यायः; आदितस्त्रयोविंशः ॥
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दुमंजिला हो एवं जिस पर कंगूरे आदि न लगे हों, उसे मुण्डकद्वार कहते हैं । इस प्रकार राजा अपनी भूमि और संपत्ति के अनुसार जैसा उचित समझे, कुछ परिवर्तन करके दरवाजों को बनवाये । किले के अन्दर की नहरें सामान्य नहरों से तिगुनी चौड़ी बनवाये, जिनके द्वारा हर प्रकार का सामान अन्दर और बाहर ले जाया-लाया जा सके ।
( १ ) पत्थर, कुदाली, कुल्हाड़ी, बाण, हाथियों का सामान, गदा, मुद्गर, लाठी, चक्र, मशीनें, तोपें, लोहारों के औजार, लोहे का बना सामान, नुकीले भाले, बाँस, ऊँट की गर्दन के आकार वाले हथियार, अग्निबाण आदि सामान नहर के द्वारा लाया और ले जाया जाता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण २० | |
|---|---|
| अध्याय ४ | # दुर्गनिवेशः |
(१) त्रयः प्राचीना राजमार्गास्त्रय उदीचीना इति वास्तुविभागः। स द्वादशद्वारो युक्तोदकभूमिच्छन्नपथः। (२) चतुर्दण्डान्तरा रथ्याः। राजमार्गद्रोणमुखस्थानीयराष्ट्रविवीतपथाः संयानीयव्यूहश्मशानग्रामपथाश्चाष्टदण्डाः। चतुर्दण्डः सेतुवनपथः। द्विदण्डो हस्तिक्षेत्रपथः। पञ्चारत्नयो रथपथश्चत्वारः पशुपथो द्वौ क्षुद्रपशुमनुष्यपथः। (३) प्रवीरे वास्तुनि राजनिवेशश्चातुर्वर्ण्यसमाजीवे। वास्तुहृदयादुत्तरे नवभागे यथोक्तविधानमन्तःपुरं प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा कारयेत्। तस्य
दुर्ग से संबंधित राजभवनों तथा नगर के प्रमुख स्थानों का निर्माण
( १ ) वास्तुविद्याविशेषज्ञों के निर्देशानुसार जिस भूमि को नगर-निर्माण के लिए चुना जाय उसमें पूरब से पश्चिम की ओर और उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाले तीन-तीन राजमार्ग हों। इन छह राजमार्गों में नगर-निर्माण या गृह-निर्माण की भूमि का विभाग करना चाहिए। चारों दिशाओं में कुल मिलाकर बारह द्वार हों, जिसमें जल, थल तथा गुप्त मार्ग बने हों।
( २ ) नगर में चार दण्ड ( २४ फीट ) चौड़ी रथ्याएँ ( छोटी गलियाँ ) हों। राजमार्ग, द्रोणमुख ( चार सौ गाँवों का मुख्य केन्द्र ), स्थानीय ( आठ सौ गाँवों का मुख्य केन्द्र ) राष्ट्र, चरागाह, संयानीय ( व्यापारी मंडियाँ ), सैनिक छावनियाँ, श्मशान और गाँवों की ओर जाने वाली सभी सड़कों की चौड़ाई आठ दण्ड ( १६ गज ) होनी चाहिये। जलाशयों तथा जंगलों की ओर जाने वाली सड़कों की चौड़ाई चार दंड होनी चाहिये। हाथियों के आने-जाने का मार्ग और खेतों को जाने वाला रास्ता दो दंड चौड़ा होना चाहिये। रथों के लिए पाँच अरत्नि ( ढाई गज ) और पशुओं के चलने का रास्ता दो गज चौड़ा होना चाहिये। मनुष्य तथा भेड़-बकरी आदि छोटे पशुओं के लिए एक गज चौड़ा रास्ता होना चाहिए।
( ३ ) नगर के सुदृढ़ भूमिभाग में राजभवनों का निर्माण कराना चाहिए; साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह भूमि चारों वर्णों की आजीविका के लिए
९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
पूर्वोत्तरं भागमाचार्यपुरोहितेज्यातोयस्थानं मन्त्रिणश्चावसेयुः । पूर्वदक्षिणं भागं महानसं हस्तिशाला कोष्ठागारं च । ततः परं गन्धमाल्यधान्यरस-पण्याः प्रधानकारवः क्षत्रियाश्च पूर्वी दिशमधिवसेयुः । दक्षिणपूर्वं भागं भाण्डागारमक्षपटलं कर्मनिष्ठाश्च । दक्षिणपश्चिमं भागं कुप्यगृहमायुधागारं च । ततः परं नगरधान्यव्यावहारिककार्मान्तिकबलाध्यक्षाः पक्वान्न-सुरामांसपण्याः रूपाजीवास्तालावचरा वैश्याश्च दक्षिणां दिशमधिवसेयुः । पश्चिमदक्षिणं भागं खरोष्ट्रगुप्तिस्थानं कर्मगृहं च । पश्चिमोत्तरं भागं यानरथशालाः । ततः परं ऊर्णासूत्रवेणुचर्मवर्मशस्त्रावरणकारवः शूद्राश्च पश्चिमां दिशमधिवसेयुः । उत्तरपश्चिमं भागं पण्यभैषज्यगृहम्, उत्तरपूर्वं भागं कोशो गवाश्वं च । ततः परं नगरराजदेवतालोहमणिकारवो ब्राह्मणाश्चोत्तरां दिशमधिवसेयुः । वास्तुच्छिद्रानुलासेषु श्रेणीप्रवहणिकनिकाया आवसेयुः ।
उपयोगी हो । गृह-भूमि के बीच से उत्तर की ओर नवें हिस्से में, निशांत-प्रणिधि प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार, अंतःपुर का निर्माण कराना चाहिये, जिसका द्वार पूरब या पश्चिम की ओर हो । अन्तःपुर के पूर्वोत्तर भाग में आचार्य, पुरोहित के भवन, यज्ञशाला, जलाशय और मंत्रियों के भवन बनवाये जाँय । अन्तःपुर के पूर्व-दक्षिण भाग में महानस ( रसोईघर ), हस्तिशाला और कोष्ठागार ( भंडार ) हों । उसके आगे पूरब दिशा में इत्र, तेल, पुष्पहार, अन्न, घी, तेल की दुकानें और प्रधान कारीगरों एवं क्षत्रियों के निवासस्थान होने चाहिए । दक्षिण-पूरब में भांडागार, राजकीय पदार्थों के आय-व्यय का स्थान और सोने-चाँदी की दुकानें होनी चाहिए । इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिम दिशा में शस्त्रागार तथा सोने-चाँदी के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं को रखने का स्थान होना चाहिये । उससे आगे, दक्षिण दिशा में नगराध्यक्ष, धान्याध्यक्ष, व्यापाराध्यक्ष, खदानों तथा कारखानों के निरीक्षक, सेनाध्यक्ष, भोजनालय, शराब एवं मांस की दुकानें, वेश्या, नट और वैश्य आदि के निवासस्थान होने चाहिए । पश्चिम-दक्षिण भाग में ऊँटों एवं गधों के गुप्ति-स्थान ( तबेले ) तथा उनके व्यापार के लिए एक अस्थायी घर बनवाया जाय । पश्चिम-उत्तर की ओर रथ तथा पालकी आदि सवारियों को रखने के स्थान होने चाहिए । उसके आगे, पश्चिम दिशा में ही ऊन, सूत, बाँस और चमड़े का कार्य करने वाले, हथियार और उनके म्यान बनवाने वाले और शूद्र लोगों को बसाया जाना चाहिए । उत्तर-पश्चिम में राजकीय पदार्थों को बेचने-खरीदने का बाजार और औषधालय होने चाहिए । उत्तर-पूरब में कोषगृह और गाय, बैल तथा घोड़ों के स्थान बनवाने चाहिए । उसके आगे, उत्तर दिशा की ओर नगरदेवता, कुलदेवता, लुहार, मनिहार और ब्राह्मणों के स्थान
प्र० २० : अ० ४ ] दुर्गनिवेश ९३
(१) अपराजिताप्रतिहतजयन्तवैजयन्तकोष्ठकान् शिववैश्रवणाश्विश्री- मदिरागृहं च पुरमध्ये कारयेत् । कोष्ठकालयेषु यथोद्देशं वास्तुदेवताः स्थापयेत् । ब्राह्मैन्द्रयाम्यसैनापत्यानि द्वाराणि । बहिः परिखायाः धनुश्श- तावकृष्टश्चैत्यपुण्यस्थानवनसेतुबन्धाः कार्याः, यथादिशं च दिग्देवताः । (२) उत्तरः पूर्वो वा श्मशानवाटः, दक्षिणेन वर्णोत्तमानाम् । तस्या- तिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः । (३) पाषण्डचण्डालानां श्मशानान्ते वासः । (४) कर्मान्तक्षेत्रवशेन वा कुटुम्बिनां सीमानं स्थापयेत् । तेषु पुष्प- फलवाटषण्डके दारान्वान्यपण्यनिचयांश्चानुज्ञाताः कुर्युः, दशकुलीवाटं कूप- स्थानम् । सर्वस्नेहधान्यक्षारलवणभैषज्यशुष्कशाकयवसवल्लूरतृणकाष्ठ-
बनवाये जायें । नगर के ओर-छोर जहाँ खाली जगह छूटी है, धोबी, दर्जी, जुलाहे और विदेशी व्यापारियों को बसाया जाय ।
( १ ) दुर्गा, विष्णु, जयंत, इन्द्र, शिव, वरुण, अश्विनीकुमार, लक्ष्मी और मदिरा, इन देवताओं की स्थापना नगर के बीच में करनी चाहिये । कोष्ठागार आदि में भी कुलदेवता या नगरदेवता की स्थापना करनी चाहिये । प्रत्येक दिशा के मुख्य द्वार पर उसके अधिष्ठाता देवता की स्थापना की जाय । उत्तर का देवता ब्रह्मा, पूर्व का इन्द्र, दक्षिण का यम और पश्चिम का सेनापति ( कुमार ) होता है । नगर की परिखा से बाहर दो-सौ गज को दूरी पर कैत्य, पुण्यस्थान, उपवन और सेतुबंध आदि स्थानों की रचना और यथास्थान दिग्देवताओं की भी स्थापना की जाय ।
( २ ) नगर के उत्तर या पूरव में श्मशान होना चाहिए । दक्षिण दिशा में छोटी जाति वाले लोगों का श्मशान होना चाहिए । जो भी इस नियम का उल्लंघन करे उसे प्रथम साहस-दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) कापालिकों और चाण्डालों का निवासस्थान श्मशानों के ही समीप बनवाया जाय ।
( ४ ) नगर में बसने वाले परिवारों को उनके अध्यवसाय तथा उनके योग्य भूमि की गुञ्जायश देखकर ही, बसाया जाय । उन खेतों में फूल, फल, साग-सब्जी, कमल आदि की क्यारियाँ बनाई जायें । राजा तथा राजपुरुषों की आज्ञा प्राप्त कर उनमें अनाज तथा विक्रय योग्य वस्तुएँ पैदा की जायें । दशकुलीबाट , ( बीस हलों से जोती जाने योग्य भूमि ) के बीच सिंचाई के लिए एक कुआँ होना चाहिए । घी, तेल, इत्र, क्षार, नमक, दवा, सूखे साक, भूसा, सूखा मांस, घास, लकड़ी, लोहा, चमड़ा, कोयला, तांत, विष, सींग, बाँस, छाल, चन्दन या देवदारु की लकड़ी, हथियार, कवच और पत्थर, इन सभी वस्तुओं को दुर्ग के अन्दर इतनी तादात में जमा
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
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लोहचर्माङ्गारस्नायुविषविषाणवेणुवल्कलसारदारुप्रहरणावरणाश्मनिचयान- नैकवर्षोपभोगसहान् कारयेत् । नवेनानवं शोधयेत् । (१) हस्त्यश्वरथपादातमनेकमुख्यमवस्थापयेत् । अनेकमुख्यं हि परस्परभयात् परोपजापं नोपैतीति । (२) एतेनान्तपालदुर्गसंस्कारा व्याख्याताः । (३) न च बाहिरिकान्कुर्यात्पुरराष्ट्रोपघातकान् । क्षिपेज्जनपदस्यान्ते सर्वान्नादापयेत्करान् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे दुर्गनिवेशश्चतुर्थोऽध्यायः; आदितश्चतुर्विशः ॥
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होना चाहिये कि कई वर्षों तक उपयोग में लाने के लिए वे पर्याप्त हों । उनमें पुरानी वस्तु की जगह नई वस्तु रख देनी चाहिए ।
( १ ) हाथी, घोड़े, रथ और पैदल इन चारों प्रकार की सेनाओं को अनेक सुयोग्य सेनाध्यक्षों के संरक्षण में रखा जाना चाहिए । क्योंकि अनेक सेनाध्यक्षों की नियुक्ति से पहिला लाभ तो यह है कि पारस्परिक भय के कारण वे शत्रु में जाकर नहीं मिल पाते और दूसरा लाभ यह है कि एक अध्यक्ष के फूट जाने पर दूसरा अध्यक्ष उसका कार्य सम्भाल सकता है ।
( २ ) इन नगरदुर्गों के निर्माण के नियमों के अनुसार ही जनपद की सीमा के दुर्गों और उनके प्रबन्ध का विधान समझ लेना चाहिये ।
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह नगर में ऐसे लोगों को न बसने दे, जिनके कारण राष्ट्र तथा नगर का नैतिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय स्तर गिरता हो । यदि इनको बसाना ही हो तो सीमा-प्रान्त में बसाया जाय और उनसे राज्यकर वसूल किया जाय ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण २१ | सन्निधातृनिचयकर्म |
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| अध्याय ५ |
(१) सन्निधाता कोशगृहं पण्यगृहं कोष्ठागारं कुप्यगृहमायुधागारं बन्धनागारं च कारयेत् । (२) चतुरश्रां वापीमनुदकोपस्नेहां खानयित्वा पृथुशिलाभिरुभयतः पार्श्वं मूलं च प्रचित्य सारदारुपञ्जरं भूमिसमत्रितलमनेकविधानं कुट्टिमदेशस्थानतलमेकद्वारं यन्त्रयुक्तसोपानं देवतापिधानं भूमिगृहं कारयेत् । तस्योपर्य्युभयतोनिषेधं सप्रग्रीवमैष्टकं भाण्डवाहिनीपरिक्षिप्तं कोशगृहं कारयेत्, प्रासादं वा । जनपदान्ते ध्रुवनिधिमापदर्थमभित्यक्तैः पुरुषैः कारयेत् । (३) पक्वेष्टकास्तम्भं चतुःशालमेकद्वारमनेकस्थानतलं विवृतस्तम्भा-
कोशगृह का निर्माण और कोषाध्यक्ष के कर्त्तव्य
( १ ) सन्निधाता ( कोषाध्यक्ष ) को चाहिए कि वह कोषगृह, पण्यगृह ( राजकीय विक्रेय वस्तुओं का स्थान ), कोष्ठागार ( भाण्डारगृह ), कुप्यगृह ( अन्नागार ), शस्त्रागार और कारागार का निर्माण करवाये ।
( २ ) सीलरहित स्थान में बावड़ी के समान एक चौरस गढ़ा खुदवाकर चारों ओर से उसकी दीवारों और उसके फर्श को मोटी मजबूत शिलाओं से चुनवाना चाहिए। उसके बीच में मजबूत लकड़ियों से बने हुए पिंजरे के समान अनेक कोठरियां हों; उसमें तीन मंजिलें हों; तीनों मंजिलों में बढ़िया दरवाजे तथा सुन्दर फर्श हों; ऊपर-नीचे चढ़ने-उतरने के लिए उसमें लिफ्ट लगा हो, उसके दरवाजों पर देवताओं की मूर्तियाँ अंकित हों, इस प्रकार का एक भूमिगृह ( तहखाना, अण्डर-ग्राउण्ड ) बनवाना चाहिए। उस भूमिगृह के ऊपर एक कोषगृह ( खजाना ) बनवाना चाहिए, उस पर भीतर-बाहर से बन्द की जाने वाली अर्गलाएँ हों, एक बरामदा हो, पक्की ईंटों से उसको बनाया गया हो, एवं वह चारों ओर अनेक पदार्थों से भरे हुए मकानों से घिरा हो । जनपद के मध्यभाग में प्राणदण्ड पाये पुरुषों के द्वारा, आपत्ति में काम आने वाला एक ध्रुवनिधि ( गुप्त खजाना ) बनवाना चाहिए ।
पण्यगृह और गोष्ठागार
( ३ ) पक्की ईंटों से चुना हुआ, चार भवनों से परिवृत, एक दरवाजे वाला,
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पसारमुभयतः पण्यगृहं, कोष्ठागारं च, दीर्घबहुलशालं कक्ष्यावृतकुड्य- मन्तः कुप्यगृहं, तदेव भूमिगृहयुक्तमायुधागारं, पृथग् । (१) धर्मस्थीयं महामात्रीयं विभक्तस्त्रीपुरुषस्थानमपसारतः सुगुप्त- कक्षं बन्धनागारं कारयेत् । (२) सर्वेषां शालाखातोदपानवच्च स्नानगृहाग्निविषत्राणमार्जार- नकुलारक्षाः स्वदैवपूजनयुक्ताः कारयेत् । (३) कोष्ठागारे वर्षमानमरत्निमुखं कुण्डं स्थापयेत् । (४) तज्जातकरणाधिष्ठितः पुराणं नवं च रत्नं सारं फल्गु कुप्यं वा
अनेक कक्षों एवं मंजिलों से युक्त और चारों ओर खुले हुए खम्भों वाले चबूतरे से घिरा हुआ पण्यगृह (विक्रेय वस्तुओं को रखने का घर) तथा कोष्ठागार (कोठार) बनवाना चाहिए ।
कुप्यगृह और शस्त्रागार
अनेक लम्बे दालानों से युक्त, चारों ओर अनेक कोठरियों से घिरी हुई दीवारों वाला, भीतर की ओर कुप्यगृह बनवाना चाहिए । उसी में एक तहखाना बनवाकर शस्त्रागार बनवाया जाय ।
कारागृह
(१) धर्मस्थ (न्यायाधीश) और महायाम (सन्निधाता, समाहर्त्ता आदि) से सजा पाये हुए लोगों को कारागृह में रखना चाहिए । कारागृह में स्त्री-पुरुषों के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिए । उसके बहिर्मार्ग तथा चारों ओर की अच्छी तरह रक्षा होनी चाहिए ।
(२) उक्त सभी कोशगृह आदि स्थानों में शाला, परिखा और कूपों की तरह स्नानागार भी बनवाने चाहिए। अग्नि और विष से भी उनकी रक्षा की जानी चाहिए । विष की रक्षा के लिए बिल्ली और नेवला आदि को पालना चाहिए । इन स्थानों की भलीभांति रक्षा की जानी चाहिए । उनके अधिष्ठित देवताओं जैसे, कोष-गृह का कुबेर, पण्यगृह तथा कोष्ठागार की श्री, कुप्यगृह का विश्वकर्मा, शस्त्रागार का यम और बन्दीगृह का वरुण आदि की पूजा करवानी चाहिए ।
(३) वर्षाजल को मापने के लिए कोष्ठागार में एक ऐसा-कुण्ड बनवाया जाना चाहिए जिसके मुँह का घेरा एक अरत्नि (चौबीस अंगुल) हो ।
(४) कोष्ठागाराध्यक्ष, प्रत्येक वस्तु के विशेषज्ञों की सहायता से नये और पुराने का भेद समझकर रत्न, चन्दन, वस्त्र, लकड़ी, चमड़ा, बाँस आदि उपयोगी वस्तुओं का संग्रह करे । यदि कोई व्यक्ति असली रत्न की जगह नकली रत्न दे और
प्र० २१ : अ० ५ ] कोषाध्यक्ष के कर्तव्य ९७
प्रतिगृह्णीयात् । तत्र रत्नोपधावुत्तमो दण्डः कर्तुः कारयितुश्च, सारोपधौ मध्यमः, फल्गुकुप्योपधौ तच्च तावच्च दण्डः । (१) रूपदर्शकविशुद्धं हिरण्यं प्रतिगृह्णीयाद्, अशुद्धं छेदयेत् । आहर्तुः पूर्वः साहसदण्डः । (२) शुद्धं पूर्णमभिनवं च धान्यं प्रतिगृह्णीयात् । विपर्यये मूलद्विगुणो दण्डः । (३) तेन पण्यं कुप्यमायुधं च व्याख्यातम् । (४) सर्वाधिकरणेषु युक्तोपयुक्ततत्पुरुषाणां पणद्विपणचतुष्पणाः, परमपहारेषु पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः । (५) कोषाधिष्ठितस्य कोशावच्छेदे घातः । तद्वैयावृत्यकाराणामर्धदण्डः । परिभाषणमविज्ञाते । चोराणामभिप्रधर्षणे चित्रो घातः ।
छल से असली रत्न का अपहरण कर ले जाय तो अपहरण करने वाले और कराने वाले, दोनों को उत्तम साहसदंड दिया जाय । चन्दन आदि वस्तुओं में कपट करने पर मध्यम साहसदंड दिया जाना चाहिए । वस्त्र, लकड़ी और चमड़ा जैसे पदार्थों में छल करने वाले व्यक्ति से वैसी ही दूसरी वस्तु ले ली जाय या उसका मूल्य ले लिया जाय और उतना ही उससे दण्डरूप में वसूल कर लिया जाय ।
(१) सिक्कों के पारखी पुरुषों द्वारा स्वर्णमुद्रा का संग्रह किया जाना चाहिए । सिक्कों में से जो नकली मालूम हो उसको तत्काल ही काट दिया जाय, जिससे उसको व्यवहार में न लाया जा सके । नकली सिक्कों को लाने वाले पुरुष भी प्रथम साहस-दण्ड के अपराधी हैं ।
(२) धान्याधिकारी पुरुष को चाहिए कि वह शुद्ध, पूरा तथा नया अन्न ले । यदि वह ऐसा न करे तो उससे दुगुना दण्ड वसूल किया जाय ।
(३) इसी प्रकार पण्य, कुप्य और आयुध के सम्बन्ध में भी नियम समझने चाहिए ।
(४) प्रत्येक अधिकारी पुरुष को, उसके सहकारियों को तथा उन दोनों के बीच काम करने वाले पुरुषों को, पहली बार किसी वस्तु का अपहरण करने पर क्रमशः एक पण, दो पण और चार पण का दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि वे फिर भी अपहरण करें तो क्रमानुसार उन्हें प्रथम साहस, मध्यम साहस और उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । इस पर भी वे न मानें तो उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।
(५) कोषाध्यक्ष यदि सुरंग आदि उपाय से कोष का अपहरण करे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय । इसमें अधीनस्थ लोगों को उसका आधा दण्ड दिया जाय । यदि कोष का अपहरण करने में अधीनस्थ लोगों का हाथ न हो तो उन्हें दण्ड न
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९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) तस्मादाप्तपुरुषाधिष्ठितः सन्निधाता निचयावनुतिष्ठेत् । (२) बाह्यमाभ्यन्तरं चायं विद्याद्वर्षशतादपि ।
यथा पृष्टो न सज्येत व्ययशेषं च दर्शयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सन्निधातृनिचयकर्म पञ्चमोऽध्यायः,
आदितः पञ्चविंशः ॥
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दिया जाय । केवल उनकी निंदा तथा उपहास कर उनको दुत्कारा जाय । यदि चोर सेंध लगाकर चोरी करें तो उन्हें चित्रवध का दण्ड ( कष्टकर प्राणदण्ड ) दिया जाय ।
(१) इसलिए कोषाध्यक्ष को चाहिए कि विश्वासी पुरुषों के सहयोग से ही वह धन-संग्रह आदि का कार्य करे ।
(२) कोषाध्यक्ष को चाहिए कि वह जनपद तथा नगर से होने वाली आय को अच्छी तरह से जाने । इस सम्बन्ध में उसे इतनी जानकारी होनी चाहिए कि यदि उससे सौ वर्ष पीछे की आय का लेखा-जोखा पूछा जाय तो तत्काल ही वह उसकी समुचित जानकारी दे सके । बचे हुए धन को वह सदा कोष में दिखाता रहे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सन्निधातृनिचयकर्म नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण २२ | # समाहर्तृसमुदयप्रस्थापनम् |
|---|---|
| अध्याय ६ |
(१) समाहर्ता दुर्गं राष्ट्रं खनिं सेतुं वनं व्रजं वणिक्पथं चावेक्षेत ।
(२) शुल्कं दण्डः पौतवं नागरिको लक्षणाध्यक्षो मुद्राध्यक्षः सुरा सूना सूत्रं तैलं घृतं क्षारः सौवर्णिकः पण्यसंस्था वेश्या द्यूतं वास्तुकं कारुशिल्पिगणो देवताध्यक्षो द्वारवाहिरिकादेयं च दुर्गम् ।
(३) सीता भागो बलिः करो वणिक् नदीपालस्तरो नावः पट्टनं विवीतं वर्तनी रज्जूश्चोररज्जूश्च राष्ट्रम् ।
(४) सुवर्णरजतवज्रमणिमुक्ता-प्रवालशङ्ख-लोहलवणभूमि-प्रस्तररस-धातवः खनिः ।
समाहर्त्ता का कर-संग्रह कार्य
( १ ) समाहर्त्ता ( कलक्टर जनरल ) को चाहिये कि वह १. दुर्ग, २. राष्ट्र, ३. खनि, ४. सेतु, ५. वन, ६. व्रज और ७. व्यापार सम्बन्धी कार्यों का निरीक्षण करे ।
( २ ) दुर्ग : शुल्क ( चुङ्गी ), दण्ड ( जुर्माना ), पौतव ( तराजू-बाट ), नगराध्यक्ष, लक्षणाध्यक्ष ( पटवारी, कानूनगो, अमीन ), मुद्राध्यक्ष, सुराध्यक्ष ( आबकारी अधिकारी ), सूनाध्यक्ष ( फाँसी देने वाला ), सूत्राध्यक्ष, तेल-घी आदि का विक्रेता, सुवर्णाध्यक्ष, दुकान, वेश्या, द्यूत, वास्तुक ( शिल्पी ), बढ़ई, लुहार, सुनार, मन्दिरों के निरीक्षक, द्वारपाल और नट-नर्तक आदि से लिया जाने वाला धन दुर्ग कहलाता है ।
( ३ ) राष्ट्र : सीता ( खेती ), भाग ( धान्य का षष्ठांश ), बलि ( उपहार ), कर ( फल, वृक्ष आदि का टैक्स ), वणिक् ( व्यापारकर ), नदीपालस्तर ( नदी पार होने का टैक्स ), नाव का कर, पट्टन ( कस्बों की आय ), विवीत ( चरागाहों की आय ), वर्तनी ( मार्गकर ), रज्जू ( भूमि निरीक्षकों द्वारा प्राप्तव्य धन ) और चोर रज्जू ( चोरों को पकड़ने के लिये ग्रामवासियों से मिला धन ) आदि आय के साधन राष्ट्र नाम से कहे जाते हैं ।
( ४ ) खनि : सोना, चाँदी, हीरा, मणि, मोती, मूँगा, शंख, लोहा, लवण, भूमि, पत्थर और खनिज पदार्थ खनि कहे जाते हैं ।
| १०० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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(१) पुष्पफलवाटषण्डकेदारमूलवापाः सेतुः । (२) पशुमृगद्रव्यहस्तिवनपरिग्रहो वनम् । (३) गोमहिषमजाविकं खरोष्ट्रमश्वाश्वतराश्च व्रजः । (४) स्थलपथो वारिपथश्च वणिक्पथः । (५) इत्यायशरीरम् । मूलं भागो व्याजी परिघः कॢप्तं रूपिकमत्यय-श्चायमुखम् । (६) देवपितृपूजादानार्थं स्वस्तिवाचनमन्तःपुरं महानसं दूतप्रावार्तिमं कोष्ठागारमायुधागारं पण्यगृहं कुप्यगृहं कर्मान्तो विष्टिः पत्त्यश्वरथद्विप-परिग्रहो गोमण्डलं पशुमृगपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटश्चेति व्यय-शरीरम् । (७) राजवर्षं मासः पक्षो दिवसश्च व्युष्टम् । वर्षाहिमन्तग्रीष्माणां तृतीयसप्तमा दिवसोनाः पक्षाः, शेषाः पूर्णाः । पृथगधिमासक इति कालः ।
(१) सेतु : फूल, फल, केला, सुपारी, अन्न के खेत, अदरक और हल्दी के खेत इन सबको सेतु कहा जाता है ।
(२) वन : हरिण आदि पशु, लकड़ी आदि द्रव्य और हाथियों के जंगल को वन कहा जाता है ।
(३) व्रज : गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधा, ऊँट, घोड़ा, खच्चर आदि जानवर व्रज नाम से कहे जाते हैं, क्योंकि वे अपने गोष्ठ (व्रज) में रहते हैं ।
(४) वणिक्पथ : स्थलमार्ग और जलमार्ग, व्यापार के इन दो मार्गों को वणिक्पथ कहा जाता है ।
(५) ये सभी आमदनी के साधन हैं । इनके अतिरिक्त मूल (अनाज, साग, सब्जी आदि को बेचकर एकत्र किया गया धन), भाग (पैदावार का षष्ठांश), व्याजी (कपटी व्यापारियों से दण्ड रूप में वसूल किया गया धन), परिघ (लावारिस का धन), कॢप्त (नियत कर), रूपिक (नमककर), अत्यय (जुरमाने का धन), आदि भी आमदनी के साधन हैं ।
(६) देवपूजा, पितृपूजा, दान, स्वस्तिवाचन आदि धार्मिक कृत्य, अन्तःपुर, रसोईघर, दूत प्रेषण, कोष्ठागार, शस्त्रागार, पण्यगृह, कुप्यगृह का व्यय कर्मान्त (कृषि, व्यापार); विष्टि (बेगारी का व्यय), पैदल, हाथी, घोड़ा तथा रथ आदि चारों प्रकार के सेना-संग्रह का व्यय, गाय, भैंस, बकरी आदि उपयोगी पशुओं का व्यय, हरिण, पक्षी तथा अन्य हिंसक जंगली जानवरों की रक्षा के लिए किया गया व्यय और स्थान, लकड़ी, घास आदि के जंगलों की सुरक्षा के लिए किया गया व्यय, ये सभी व्यय के स्थान कहलाते हैं ।
(७) राजा के राज्याभिषेक के बाद, उसके प्रत्येक कार्य में 'व्युष्ट' नाम से कहे
प्र० २२ : अ० ६ ] समाहर्त्ता का कर-संग्रह कार्य १०१
(१) करणीयं सिद्धं शेषमायव्ययौ नीवी च । (२) संस्थानं प्रचारः शरीरावस्थापनमादानं सर्वसमुदयपिण्डः सञ्जातमेतत्करणीयम् । (३) कोशार्पितं राजहरः पुरव्ययश्च प्रविष्टं, परमसंवत्सरानुवृत्तं शासनमुक्तं मुखाज्ञप्तं चापातनीयम्, एतत्सिद्धम् । (४) सिद्धिप्रकर्मयोगः दण्डशेषमाहरणीयं, बलात्कृतप्रतिस्तब्धमवसृष्टं च प्रशोध्यम्, ऐतच्छेषमसारमल्पसारं च । (५) वर्तमानः पर्युषितोऽन्यजातश्चायः । दिवसानुवृत्तो वर्तमानः । परमसंवत्सरिकः परप्रचारसंक्रान्तो वा पर्युषितः । नष्टप्रस्मृतमायुक्तदण्डः पार्श्वं पारिहीणिकमौपायनिकं डमरगतकस्वमपुत्रकं निधिश्चान्यजातः । विक्षेपव्याधितान्तरारम्भशेषश्च व्ययप्रत्यायः । विक्रये पण्यानामर्घवृद्धिरुपजा मानोन्मानविशेषो व्याजी क्रयसङ्घर्षे वा वृद्धिरित्यायः ।
जाने वाले वर्ष, मास, पक्ष और दिन इन चारों बातों का उल्लेख होना चाहिये, राजवर्ष के तीन विभाग हैं : १. वर्षा २. हेमन्त और ३. ग्रीष्म, इन तीनों विभागों में प्रत्येक के आठ-आठ पक्ष होते हैं, प्रत्येक पक्ष पन्द्रह दिन का होता है, प्रत्येक ऋतु के तीसरे तथा सातवें पक्ष में एक-एक दिन कम माना जाय, शेष छहों पक्ष पन्द्रह-पन्द्रह दिन के माने जाँय, इसके अतिरिक्त एक अधिमास ( मलमास ) भी माना जाय, यही काल-विभाजन राजकीय कार्यों में प्रयुक्त किया जाना चाहिये ।
( १ ) समाहर्त्ता को चाहिये कि वह करणीय, सिद्ध, शेष, आय, व्यय तथा नीवी आदि कार्यों को उचित रीति से सम्पन्न करे ।
( २ ) करणीय ६ प्रकार का होता है १. संस्थान २. प्रचार ३. शरीरावस्थान ४. आदान ५. सर्वसमुदयपिण्ड और ६. संजात ।
( ३ ) सिद्ध भी ६ प्रकार का होता है १. कोशार्पित २. राजहार ३. पुरव्यय ४. परसंवत्सरानुवृत्त ५. शासनमुक्त और ६. मुखाज्ञप्त ।
( ४ ) शेष के भी ६ भेद हैं १. सिद्धप्रकर्मयोग ३. दण्डशेष ३. बलात्कृत प्रतिस्तब्ध ४. अवसृष्ट ५. असार और ६. अल्पसार ।
( ५ ) आय तीन प्रकार की है १. वर्तमान २. पर्युषित और ३. अन्यजात । प्रतिदिन की आमदनी को 'वर्तमान' आय कहा जाता है, पिछले वर्ष का बकाया अथवा शत्रुदेश से प्राप्त धन 'पर्युषित' आय है, भूले हुए धन की स्मृति, अपराध-स्वरूप प्राप्त धन, कर के अतिरिक्त अन्य उपायों या प्रभुत्व से प्राप्त धन, कांजी-हाउस से प्राप्त धन, भेंटस्वरूप प्राप्त धन, शत्रुसेना से अपहृत धन और लावारिस का धन 'अन्यजात' आय कहलाती है । इसके अतिरिक्त सैनिक खर्च से बचा हुआ धन, स्वास्थ्य-विभाग के व्यय से बचा हुआ धन और इमारतों के बनवाने से बचा
१०२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
(१) नित्यो नित्योत्पादिको लाभो लाभोत्पादिक इति व्ययः । दिवसानुवृत्तो नित्यः । पक्षमाससंवत्सरलाभो लाभः । तयोरुत्पन्नो नित्योत्पादिको लाभोत्पादिक इति ।
(२) व्ययसञ्जातादायव्ययविशुद्धा नीवी प्राप्ता चानुवृत्ता चेति ।
(३) एवं कुर्यात्समुदयं वृद्धिं चायस्य दर्शयेत् ।
ह्रासं व्ययस्य च प्राज्ञः साधयेच्च विपर्ययम् ॥इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे समाहर्तृसमुदयप्रस्थापनं षष्ठोऽध्यायः, आदितः षड्विंशः ॥
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हुआ धन 'व्ययप्रत्याय' कहलाता है । यह भी एक प्रकार की आय है । बिक्री के समय वस्तुओं की कीमत बढ़ जाने से, निषिद्ध वस्तुओं के बेचने से, बाट-तराजू आदि की बेईमानी से तथा खरीदारों की प्रतिस्पर्धा से प्राप्त धन भी आमदनी का धन है ।
( १ ) व्यय चार प्रकार का होता है : १. नित्य २. नित्योत्पादिक ३. लाभ और ४. लाभोत्पादिक । प्रतिदिन के नियमित व्यय को 'नित्य' व्यय कहते हैं । पाक्षिक, मासिक तथा वार्षिक आय के लिए व्यय किया गया धन 'लाभ' कहलाता है । नियमित व्यय से अधिक खर्च हो जानेवाले धन को 'नित्योत्पादिक' तथा 'लाभोत्पादिक' कहा जाता है ।
( २ ) सब तरह के आय-व्यय का भली-भाँति हिसाब करके भी बचत रूप में निकलने वाला धन 'नीवी' कहलाता है, जो दो प्रकार का होता है १. प्राप्त और और २. अनुवृत्त । प्राप्त वह, जो खजाने में जमा हो और अनुवृत्त वह, जो खजाने में जमा किया जानेवाला हो ।
( ३ ) समाहर्त्ता को चाहिए कि वह ऊपर निर्दिष्ट विधियों, साधनों एवं मार्गों से राजकीय धन का संग्रह करे और आय-व्यय में बचत-हानि का लेखा-जोखा ठीक रखें । यदि किसी अवस्था में भविष्य की विशेष आय की आशा में पहिले अधिक व्यय भी करना पड़े तो वैसा करके आय को बढ़ाये ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में समाहर्तृसमुदयप्रस्थापन नामक छठा अध्याय समाप्त ।
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प्रकरण २३
अध्याय ७
अक्षपटले गाणनिक्याधिकारः
(१) अक्षपटलमध्यक्षः प्राङ्मुखं वा विभक्तोपस्थानं निबन्धपुस्तकस्थानं कारयेत् । (२) तत्राधिकरणानां संख्याप्रचारसञ्जाताग्रं, कर्मन्तानां द्रव्यप्रयोगे वृद्धिक्षयव्ययप्रयामव्याजीयोगस्थानवेतनविष्टप्रमाणं, रत्नसारफल्गुकुप्यानामर्घप्रतिवर्णकप्रतिमानमानोन्मानभाण्डं, देशग्रामजातिकुलसङ्घानां धर्मव्यवहारचारित्रसंस्थानं, राजोपजीविनां प्रग्रहप्रदेशभोगपरिहारभक्तवेतनलाभं, राज्ञश्च पत्नीपुत्राणां रत्नभूमिलाभं निर्देशौत्पादिकप्रतीकारलाभं, मित्रामित्राणां च सन्धिविक्रमप्रदानादानं निबन्धपुस्तकस्थं कारयेत् ।
अक्षपटल में गाणनिक के कार्यों का निरूपण
( १ ) आय-व्यय का निरीक्षक ( एकाउण्ट्स सुपरिन्टेण्डेण्ट ), अक्षपटल ( एकाउण्टेण्ट्स ऑफिस ) का निर्माण करावे, उसका दरवाजा पूरब या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिये, उसमें लेखकों ( क्लर्कों ) के बैठने के लिए कक्ष और आय-व्यय की निबन्ध-पुस्तकों ( एकाउण्ट बुक्स ) को रखने के लिये नियमित व्यवस्था होनी चाहिये ।
( २ ) उसमें विभिन्न विभागों की नामावली, जनपद की पैदावार एवं उसकी आमदनी का विवरण, खान तथा कारखानों के आय-व्यय का हिसाब, कर्मचारियों की नियुक्ति, अन्न एवं सुवर्ण आदि का उपयोग, प्रयास ( अनाज के गोदाम ), व्याजी ( कम तोलने के कारण व्यापारियों से दण्डरूप में हुई आमदनी ), योग ( अच्छे-बुरे द्रव्य की मिलावट ), स्थान ( गाँव ), वेतन, विष्टि ( बेगार ), आदि का ब्यौरा, रत्नसार एवं कुप्य आदि पदार्थों के मूल्य, उनका गुण, तौल, उनकी लम्बाई-चौड़ाई, ऊँचाई, एवं असली मूलधन का उल्लेख, देश, ग्राम, जाति, कुल सभा-सोसाइटियों के धर्म, व्यवहार, चरित्र तथा परिस्थितियों का उल्लेख, राजकीय सहायता से जीवित रहनेवाले प्रग्रह ( देवालय, मंत्री, पुरोहित का सम्मान ), निवासस्थान, भेंट, परिहार ( कर आदि का न लेना ), एवं वेतन आदि का उल्लेख, महारानी तथा राजपुत्रों द्वारा रत्न एवं भूमि आदि की प्राप्ति का विवरण, राजा, महारानी तथा राजपुत्रों को नियमित रूप से दिये जानेवाले धन के अतिरिक्त दिया हुआ धन, उत्सवों तथा
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(१) ततः सर्वाधिकरणानां करणीयं सिद्धं शेषमायव्ययौ नीवीं उपस्थानं प्रचारचरित्रसंस्थानं च निबन्धेन प्रयच्छेत् । उत्तममध्यमावरेषु च कर्मसु तज्जातिकमध्यक्षं कुर्यात् । सामुदायिकेष्ववक्लृप्तिकं यमुपहृत्य न राजानुत्तप्येत ।
(२) सहग्राहिणः प्रतिभुवः कर्मोपजीविनः पुत्रा भ्रातरो भार्या दुहितरो भृत्याश्चास्य कर्मच्छेदं वहेयुः ।
(३) त्रिंशतं चतुःपञ्चाशच्चाहोरात्राणां कर्मसंवत्सरः । तमाषाढीपर्यवसानमूनं पूर्णं वा दद्यात् । करणाधिष्ठितमधिमासकं कुर्यात् । अपसर्पाधिष्ठितं च प्रचारम् । प्रचारचरित्रसंस्थानान्यनुपलभमानो हि प्रकृतः समुदयमज्ञानेन परिहापयति । उत्थानक्लेशासहत्वादालस्येन, शब्दादिष्वि-
स्वास्थ्य सम्बन्धी सुधारों से प्राप्त धन का उल्लेख और मित्र राजाओं तथा शत्रु राजाओं के साथ संधि-विग्रह आदि के निमित्त प्राप्त हुआ अथवा खर्च हुए धन का विवरण आदि सभी ऐसे विषय हैं जिनका उल्लेख निबन्धपुस्तक ( एकाउण्ट बुक्स ) में किया जाना चाहिये ।
( १ ) इसके बाद सभी उत्पत्ति-केन्द्रों एवं विभागों के लिए किए जानेवाले, किए गए तथा बचे हुए आय, व्यय, नीवी, कार्यकर्ताओं की उपस्थिति, प्रचार, चरित्र और संस्थान आदि सब बातों को रजिस्टर में दर्ज करके राजा को दे देना चाहिए । उत्तम, मध्यम और निकृष्ट जैसे भी कार्य हों उनके अनुसार ही उनके अध्यक्ष नियुक्त किये जाने चाहिए । एक ही कार्य को करनेवाले अनेक व्यक्तियों में उसी व्यक्ति को अध्यक्ष नियुक्त किया जाना चाहिए जो निपुण, गुणी, यशस्वी हो और जिसे दण्ड देने के पश्चात् राजा को पश्चात्ताप न करना पड़े ।
( २ ) यदि कोई अध्यक्ष राजकीय धन का गबन करके उसको अदा करने में असमर्थ हो तो वह धन क्रमशः उसके हिस्सेदार, उसके जामिन, उसके अधीनस्थ कर्मचारी, उसके पुत्र एवं भाई, उसकी स्त्री एवं लड़की अथवा उसके नौकर अदा करें ।
( ३ ) तीन-सौ-चौवन दिन-रात का एक कर्मसंवत्सर होता है । उसकी समाप्ति आषाढ़ी पूर्णिमा को समझनी चाहिए । इसी वर्ष-गणना के हिसाब से प्रत्येक अध्यक्ष का वेतन दिया जाना चाहिए । यदि अध्यक्ष की नियुक्ति वर्ष के मध्य में हुई है तो उसको कम वेतन और यदि उसने पूरे वर्ष कार्य किया है तो उसे पूरा वेतन दिया जाना चाहिए । प्रत्येक कर्मचारी के कार्य का ब्यौरा उपस्थिति रजिस्टर से देखना चाहिए । अध्यक्ष को चाहिए कि वह जनपद के समस्त कार्यालयों की कार्य-व्यवस्था का ज्ञान गुप्तचरों से प्राप्त करे । यदि वह ऐसा नहीं करता तो अपनी अज्ञानता के
प्र० २३ : अ० ७ ] गाणनिक के कार्य्य १०५
न्द्रियार्थेषु प्रमादेन, संक्रोशाधर्मानर्थभीरुर्भयेन, कार्य्यार्थिष्वनुग्रहबुद्धिः कामेन हिंसाबुद्धिः कोपेन, विद्याद्रव्यवल्लभापाश्रयाद् दर्पेण, तुलामानतर्कगणिकान्तरोपधानात् लोभेन ।
(१) तेषामानुपूर्व्या यावानर्थोपघातः तावानेकोत्तरो दण्ड इति मानवाः । सर्वत्राष्टगुण इति पाराशराः । दशगुण इति बार्हस्पत्याः । विंशतिगुण इत्यौशनसाः । यथापराधमिति कौटिल्यः ।
(२) गाणनिक्यान्याषाढीमागच्छेयुः । आगतानां समुद्रपुस्तभाण्डनीवीकानामेकत्रासम्भाषावरोधं कारयेत् । आयव्ययनीवीनामग्राणि श्रुत्वा
कारण वह धनोत्पादन में हानिकर सिद्ध होता है । १. अज्ञान २. आलस्य ३. प्रमाद ४. काम ५. क्रोध ६. दर्प ७. लोभ, ये धनोत्पादन में विघ्न डालने वाले दोष हैं । अधिक परिश्रम से कतराने के कारण आलस्य के द्वारा, गाना-बजाना तथा स्त्रियों में आसक्त रहने के कारण प्रमाद के द्वारा, निन्दा, अधर्म तथा अनर्थ के कारण भय द्वारा, किसी कार्यार्थी पर अनुग्रह करने के कारण काम द्वारा, किसी क्रूरता के कारण क्रोध द्वारा, विद्या, धन एवं राजप्रिय होने के कारण दर्प द्वारा, और नाप-तौल तर्कना तथा हिसाब में गड़बड़ कर देने के कारण लोभ के द्वारा, कर्मचारी लोग आमदनी में बाधा डाल देते हैं ।
( १ ) आचार्य मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'जो कर्मचारी ऊपर निर्दिष्ट दोषों के वशीभूत होकर जितना अपराध करे उसको उसी क्रम से दण्ड दिया जाना चाहिये' अर्थात् यदि वह अज्ञान के कारण अपराध करता है तो उसे उतना ही दण्ड दिया जाना चाहिए जितने का कि उसने नुकसान किया है, यदि वह आलस्य के कारण नुकसान करता है तो दुगुना, प्रमाद के कारण नुकसान करता है तो तिगुना दण्ड दिया जाना चाहिए । आचार्य पराशर के मतानुयायियों का कहना है कि 'अपराध करनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को अठगुना दण्ड देना चाहिये, क्योंकि सभी अपराध एक समान हैं ।' आचार्य वृहस्पति के अनुयायी विद्वानों का मत है कि 'सभी अपराधियों को दसगुना दण्ड दिया जाना चाहिए ।' शुक्राचार्य के अनुयायी कहते हैं कि 'सबको बीसगुना दण्ड मिलना चाहिए ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि जो जितना अपराध करे तदनुसार ही उसे दण्ड दिया जाना चाहिए ।'
( २ ) सभी कार्यालयों के अध्यक्ष ( विभिन्न जिलों के एकाउण्टेण्टस ) आषाढ़ के महीने में वर्ष की समाप्ति पर प्रधान कार्यालय में आकर हिसाब का मिलान करें । उन आये हुए लोगों को तब तक एक-दूसरे से बातचीत न करने दी जाय तथा मिलने न दिया जाय, जब तक कि उनके पास राजकीय मोहर लगे रजिस्टर तथा व्यय से बचा हुआ धन मौजूद हैं । सर्व प्रथम आय-व्यय को सुनकर उसके पास जो बचत
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नीमीमवहारयेत् । यच्चाग्रादायस्यान्तरवर्णे नीव्या वर्धेत, व्ययस्य वा यत् परिहापयेत्, तदष्टगुणमध्यक्षं दापयेत् । विपर्यये तमेव प्रति स्यात् ।
(१) यथाकालमनागतानामपुस्तनीवीकानां वा देयदशबन्धो दण्डः । कार्मिके चोपस्थिते कारणिकस्याप्रतिबध्नतः पूर्वः साहसदण्डः । विपर्यये कार्मिकस्य द्विगुणः ।
(२) प्रचारसमं महामात्राः समग्राः श्रावयेयुरविषममात्राः । पृथग्भूतो मिथ्यावादी चैषामुत्तमदण्डं दद्यात् ।
(३) अकृताहोरूपहरं मासमाकाङ्क्षेत । मासादूर्ध्वं मासद्विशतोत्तरं दण्डं दद्यात् । अल्पशेषनीविकं पञ्चरात्रमाकाङ्क्षेत ततः परम् ।
शेष हो उसे ले लिया जाय । अध्यक्ष की बताई हुई आय-राशि से यदि रजिस्टर का हिसाब अधिक निकले और उसी प्रकार बताए हुए व्यय की अपेक्षा रजिस्टर में उससे कम निकले तो अध्यक्ष पर, उसके द्वारा बताई गई कम-अधिक रकम का आठगुना जुर्माना किया जाय । यदि आमदनी से अधिक अथवा व्यय से कम रकम रजिस्टर में चढ़ी हो तो ऐसी दशा में अध्यक्ष को दण्ड न दिया जाय, वरन् आय-व्यय की जो कमी-बेसी हुई है वह उसी को दे दी जाय ।
( १ ) जो अध्यक्ष निश्चित समय में अपने रजिस्टर तथा शेष धन आदि को लेकर प्रधान कार्यालय में उपस्थित नहीं होता उसके हिसाब में जितना बाकी निकले उसका दसगुना जुर्माना उस पर किया जाना चाहिए । यदि प्रधान अध्यक्ष ( एका-उण्ट्स सुपरिन्टेन्डेंट ) निर्धारित समय पर क्षेत्रीय कार्यालयों में पहुँच जाय और वहाँ के विभागीय अध्यक्ष कार्यालय का हिसाब-किताब दिखाने में असमर्थ हों तो उन्हें प्रथम साहस-दण्ड दिया जाना चाहिये । इसके विपरीत यदि प्रधान अध्यक्ष निर्धारित समय पर न पहुँच पावे तो उसे दुगुना प्रथम साहस-दण्ड देना चाहिये ।
( २ ) राजा के महामात्र आदि प्रधान कर्मचारी आय-व्यय तथा नीवीसम्बन्धी सारी राजकीय व्यवस्थाएँ प्रजाजनों को समझायें-बुझायें । यदि उनमें से कोई झूठा प्रचार करे तो उसे उत्तम साहस-दण्ड दिया जाना चाहिये ।
( ३ ) द्रव्य की वसूली करनेवाला राजकर्मचारी यदि निर्धारित समय पर द्रव्य-वसूली न कर सके तो उसे एक मास का और समय दिया जाय । यदि फिर भी वह द्रव्य संग्रह करके राजकोष में न पहुँचा सके तो उस पर प्रति मास के हिसाब से दो-सौ रुपया जुर्माना कर देना चाहिये । जिस अध्यक्ष के पास थोड़ा राजदेय धन बाकी हो, निर्धारित समय से केवल पाँच दिन तक उसकी प्रतीक्षा की जाय । तदनन्तर उसे भी दंडनीय समझा जाय ।
प्र० २३ : अ० ७ ] गाणनिक के कार्य १०७
(१) कोशपूर्वमहोरूपहरं धर्मव्यवहारचरित्रसंस्थानसङ्कलननिर्वर्तना-नुमानचारप्रयोगैरवेक्षेत । (२) दिवसपञ्चरात्रपक्षमासचातुर्मास्यसंवत्सरैश्च प्रतिसमानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखोत्पत्त्यनुवृत्तिप्रमाणदायकदापकनिबन्धकप्रतिग्राहकैश्चायं समानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखलाभकारणदेययोगपरिमाणाज्ञापकोद्धारक-निधातृकप्रतिग्राहकैश्च व्ययं समानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखानुवर्तनरूप-लक्षणपरिमाणनिक्षेपभाजनगोपायकैश्च नीवीं समानयेत् । (३) राजार्थे कारणिकस्याप्रतिबध्नतः प्रतिषेधयतो वाऽज्ञां निबन्धा-दायव्ययमन्यथा वापि कल्पयतः पूर्वः साहसदण्डः ।
( १ ) कोषधन और कोषरजिस्टर लानेवाले अध्यक्ष की परीक्षा पहिले धर्म के द्वारा ली जाय, अर्थात् उसे देखा जाय कि वह धर्मात्मा है या दम्भी, फिर उसके व्यवहार को देखा जाय, तदनन्तर उसके आचार-विचार, उसकी पूर्वस्थिति, उसके कार्य एवं हिसाब-किताब, और अन्त में उसके कार्यों का पारस्परिक मिलान करके उसकी परीक्षा ली जाय, गुप्तचरों द्वारा भी उसके भेद जाने जाँय ।
( २ ) अध्यक्ष को चाहिये कि वह प्रतिदिन, प्रति पाँच दिन, प्रतिपक्ष, प्रतिमास, प्रति चार मास और प्रतिवर्ष के क्रम से राजकीय आय-व्यय एवं नीवी का लेखा-जोखा साफ-सुथरे ढंग में रखे । अर्थात् वर्षारंभ से, पहिले एक दिन का हिसाब, फिर एक साथ पाँच दिन का हिसाब, फिर एक साथ पन्द्रह दिन का हिसाब, फिर एक साथ एक मास का हिसाब, और अन्त में एक साथ पूरे एक वर्ष का हिसाब करके रखे । आय का लेखा निर्दोष और साफ रहे, एदतर्थ रजिस्टर में राजवर्ष ( मास, पक्ष, दिन ), देश, काल, मुख ( आयमुख, आयशरीर ), उत्पत्ति ( आयवृद्धि ), अनुवृत्ति ( स्थानान्तर ) प्रमाण, कर देनेवाले का नाम, दिलानेवाले अधिकारी का नाम, लेखक का नाम और लेनेवाले का नाम, इस प्रकार के स्तंभ ( खाने ) बने होने चाहिए । व्यय का लेखा तैयार करने के लिए रजिस्टर में इस प्रकार के खाने होने चाहिए : व्युष्ट, देश, काल, मुख, लाभ ( पक्ष, मास, वर्ष के क्रम से ) व्यय का कारण, देय वस्तु का नाम, मिलावटी द्रव्य में अच्छाई-बुराई का उल्लेख, तौल, किसकी आज्ञा से व्यय किया गया, किसको दिया गया, भाण्डागारिक और लेनेवाले का पूरा विवरण । इसी प्रकार नीवी ( शेष धन ) का लेखा ; व्युष्ट, देश, काल, मुख, द्रव्य का स्वरूप, द्रव्य की विशेषता, तौल, जिस पात्र में द्रव्य रखा जाय और द्रव्य का संरक्षक, आदि विवरणों के आधार पर तैयार करना चाहिए ।
( ३ ) यदि कारणिक ( क्लर्क ) अर्थलाभ को रजिस्टर में दर्ज नहीं करता है, राजकीय आज्ञा का उल्लंघन करता है, अथवा आय-व्यय के संबंध में विपरीत कल्प-नाऐं भी करता है तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
१०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) क्रमावहीनमुत्क्रममविज्ञातं पुनरुक्तं वा वस्तुक्रमवलिखतो द्वादशपणो दण्डः ।
(२) नीवीमवलिखतो द्विगुणः, भक्षयतोऽष्टगुणः, नाशयतः पञ्चबन्धः प्रतिदानं च । मिथ्यावादे स्तेयदण्डः । पश्चात् प्रतिज्ञाते द्विगुणः प्रस्मृतोत्पन्ने च ।
(३) अपराधं सहेताल्पं तुष्येदल्पेऽपि चोदये । महोपकारं चाध्यक्षं प्रग्रहेणाभिपूजयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे अक्षपटले गाणनिक्याधिकारः सप्तमोऽध्यायः, आदितः सप्तविंशः ॥
(१) क्रम के विरुद्ध, उलट-पलट कर विपरीत लिख देना, किसी वस्तु को बिना समझे-बूझे ही लिख देना और एक वस्तु को दुबारा चढ़ा देना, ऐसी गड़बड़ी करनेवाले कर्मचारी को बारह पण का दण्ड दिया जाय ।
(२) यदि नीवी (बचत धन) के सम्बन्ध में लेखक की ऐसी गड़बड़ी पायी जाय तो चौबीस पण दण्ड, उसका गबन करे तो छियानवे पण दण्ड और उसका अपव्यय करे तो साठ पड़ दण्ड दिया जाना चाहिए । झूठ बोलनेवाले को चोर जितना दण्ड देना चाहिये । हिसाब-किताब के सम्बन्ध में पीछे से किसी बात को स्वीकार करने पर चोरी से दुगुना दण्ड और पूछे जाने पर किसी बात का उत्तर न देकर बाद में उसका उसका उत्तर देने पर भी यही दंड देना चाहिए ।
(३) राजा को चाहिए कि वह अपने अध्यक्ष के थोड़े अपराध को क्षमा कर दे और यदि वह पूर्वापेक्षया आमदनी में थोड़ी भी वृद्धि कर लेता है तो उसके प्रति प्रसन्नता एवं सन्तोष प्रकट करे । महान् उपकार करनेवाले अध्यक्ष का कृतज्ञ होकर राजा को सदैव उसका सम्मान करना चाहिए ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अक्षपटल में गाणनिक्याधिकार नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।
| प्रकरण २४ | ## समुदयस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनम् |
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| अध्याय ८ |
(१) कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः । तस्मात् पूर्वं कोषमवेक्षेत । (२) प्रचारसमृद्धिश्चरित्रानुग्रहश्चोरग्रहो युक्तप्रतिषेधः सस्यसम्पत् पण्यबाहुल्यमुपसर्गप्रमोक्षः परिहारक्षयो हिरण्योपायनमिति कोषवृद्धिः । (३) प्रतिबन्धः प्रयोगो व्यवहारोऽवस्तारः परिहापणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः । (४) सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः । तत्र दशबन्धो दण्डः । (५) कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः ।
अध्यक्षों द्वारा गबन किये गये धन की पुनः प्राप्ति
(१) सारे कार्य कोष पर निर्भर हैं । इसलिए राजा को चाहिए कि सबसे पहिले कोष पर ध्यान दे ।
(२) राष्ट्र की सम्पत्ति को बढ़ाना, राष्ट्र के चरित्र पर ध्यान रखना, चोरों पर निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत लेने से रोकना, सभी प्रकार के अन्नोत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल-स्थल में उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक व्यापार-योग्य वस्तुओं को बढ़ाना, अग्नि आदि के भय से राज्य की रक्षा करना, ठीक समय पर यथोचित कर वसूल करना और हिरण्य आदि की भेंट लेना, ये सब कोषवृद्धि के उपाय हैं ।
(३) कोषक्षय के आठ कारण हैं : १. प्रतिबन्ध, २. प्रयोग, ३. व्यवहार, ४. अवस्तार, ५. परिहायण, ६. उपभोग, ७. परिवर्तन और ८. अपहार ।
(४) राजकर को वसूल करना, वसूल करके उसे अपने अधिकार में न रखना, और अधिकार में करके भी उसे खजाने में जमा न करना, यह तीन प्रकार का प्रतिबन्ध है । जो अध्यक्ष इन माध्यमों से कोष का क्षय करे, उस पर क्षत राशि से दशगुना जुर्माना करना चाहिए ।
(५) कोषधन का स्वयं ही लेन-देन करके वृद्धि का यत्न करना प्रयोग कहलाता है । ऐसे अधिकारी पर दुगुना जुर्माना करना चाहिए ।