कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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पसारमुभयतः पण्यगृहं, कोष्ठागारं च, दीर्घबहुलशालं कक्ष्यावृतकुड्य- मन्तः कुप्यगृहं, तदेव भूमिगृहयुक्तमायुधागारं, पृथग् । (१) धर्मस्थीयं महामात्रीयं विभक्तस्त्रीपुरुषस्थानमपसारतः सुगुप्त- कक्षं बन्धनागारं कारयेत् । (२) सर्वेषां शालाखातोदपानवच्च स्नानगृहाग्निविषत्राणमार्जार- नकुलारक्षाः स्वदैवपूजनयुक्ताः कारयेत् । (३) कोष्ठागारे वर्षमानमरत्निमुखं कुण्डं स्थापयेत् । (४) तज्जातकरणाधिष्ठितः पुराणं नवं च रत्नं सारं फल्गु कुप्यं वा
अनेक कक्षों एवं मंजिलों से युक्त और चारों ओर खुले हुए खम्भों वाले चबूतरे से घिरा हुआ पण्यगृह (विक्रेय वस्तुओं को रखने का घर) तथा कोष्ठागार (कोठार) बनवाना चाहिए ।
कुप्यगृह और शस्त्रागार
अनेक लम्बे दालानों से युक्त, चारों ओर अनेक कोठरियों से घिरी हुई दीवारों वाला, भीतर की ओर कुप्यगृह बनवाना चाहिए । उसी में एक तहखाना बनवाकर शस्त्रागार बनवाया जाय ।
कारागृह
(१) धर्मस्थ (न्यायाधीश) और महायाम (सन्निधाता, समाहर्त्ता आदि) से सजा पाये हुए लोगों को कारागृह में रखना चाहिए । कारागृह में स्त्री-पुरुषों के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिए । उसके बहिर्मार्ग तथा चारों ओर की अच्छी तरह रक्षा होनी चाहिए ।
(२) उक्त सभी कोशगृह आदि स्थानों में शाला, परिखा और कूपों की तरह स्नानागार भी बनवाने चाहिए। अग्नि और विष से भी उनकी रक्षा की जानी चाहिए । विष की रक्षा के लिए बिल्ली और नेवला आदि को पालना चाहिए । इन स्थानों की भलीभांति रक्षा की जानी चाहिए । उनके अधिष्ठित देवताओं जैसे, कोष-गृह का कुबेर, पण्यगृह तथा कोष्ठागार की श्री, कुप्यगृह का विश्वकर्मा, शस्त्रागार का यम और बन्दीगृह का वरुण आदि की पूजा करवानी चाहिए ।
(३) वर्षाजल को मापने के लिए कोष्ठागार में एक ऐसा-कुण्ड बनवाया जाना चाहिए जिसके मुँह का घेरा एक अरत्नि (चौबीस अंगुल) हो ।
(४) कोष्ठागाराध्यक्ष, प्रत्येक वस्तु के विशेषज्ञों की सहायता से नये और पुराने का भेद समझकर रत्न, चन्दन, वस्त्र, लकड़ी, चमड़ा, बाँस आदि उपयोगी वस्तुओं का संग्रह करे । यदि कोई व्यक्ति असली रत्न की जगह नकली रत्न दे और