भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० २१ : अ० ५ ] कोषाध्यक्ष के कर्तव्य ९७

प्रतिगृह्णीयात् । तत्र रत्नोपधावुत्तमो दण्डः कर्तुः कारयितुश्च, सारोपधौ मध्यमः, फल्गुकुप्योपधौ तच्च तावच्च दण्डः । (१) रूपदर्शकविशुद्धं हिरण्यं प्रतिगृह्णीयाद्, अशुद्धं छेदयेत् । आहर्तुः पूर्वः साहसदण्डः । (२) शुद्धं पूर्णमभिनवं च धान्यं प्रतिगृह्णीयात् । विपर्यये मूलद्विगुणो दण्डः । (३) तेन पण्यं कुप्यमायुधं च व्याख्यातम् । (४) सर्वाधिकरणेषु युक्तोपयुक्ततत्पुरुषाणां पणद्विपणचतुष्पणाः, परमपहारेषु पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः । (५) कोषाधिष्ठितस्य कोशावच्छेदे घातः । तद्वैयावृत्यकाराणामर्धदण्डः । परिभाषणमविज्ञाते । चोराणामभिप्रधर्षणे चित्रो घातः ।

छल से असली रत्न का अपहरण कर ले जाय तो अपहरण करने वाले और कराने वाले, दोनों को उत्तम साहसदंड दिया जाय । चन्दन आदि वस्तुओं में कपट करने पर मध्यम साहसदंड दिया जाना चाहिए । वस्त्र, लकड़ी और चमड़ा जैसे पदार्थों में छल करने वाले व्यक्ति से वैसी ही दूसरी वस्तु ले ली जाय या उसका मूल्य ले लिया जाय और उतना ही उससे दण्डरूप में वसूल कर लिया जाय ।

(१) सिक्कों के पारखी पुरुषों द्वारा स्वर्णमुद्रा का संग्रह किया जाना चाहिए । सिक्कों में से जो नकली मालूम हो उसको तत्काल ही काट दिया जाय, जिससे उसको व्यवहार में न लाया जा सके । नकली सिक्कों को लाने वाले पुरुष भी प्रथम साहस-दण्ड के अपराधी हैं ।

(२) धान्याधिकारी पुरुष को चाहिए कि वह शुद्ध, पूरा तथा नया अन्न ले । यदि वह ऐसा न करे तो उससे दुगुना दण्ड वसूल किया जाय ।

(३) इसी प्रकार पण्य, कुप्य और आयुध के सम्बन्ध में भी नियम समझने चाहिए ।

(४) प्रत्येक अधिकारी पुरुष को, उसके सहकारियों को तथा उन दोनों के बीच काम करने वाले पुरुषों को, पहली बार किसी वस्तु का अपहरण करने पर क्रमशः एक पण, दो पण और चार पण का दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि वे फिर भी अपहरण करें तो क्रमानुसार उन्हें प्रथम साहस, मध्यम साहस और उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । इस पर भी वे न मानें तो उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

(५) कोषाध्यक्ष यदि सुरंग आदि उपाय से कोष का अपहरण करे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय । इसमें अधीनस्थ लोगों को उसका आधा दण्ड दिया जाय । यदि कोष का अपहरण करने में अधीनस्थ लोगों का हाथ न हो तो उन्हें दण्ड न

७ कौ०