भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) तस्मादाप्तपुरुषाधिष्ठितः सन्निधाता निचयावनुतिष्ठेत् । (२) बाह्यमाभ्यन्तरं चायं विद्याद्वर्षशतादपि ।
यथा पृष्टो न सज्येत व्ययशेषं च दर्शयेत् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सन्निधातृनिचयकर्म पञ्चमोऽध्यायः,
आदितः पञ्चविंशः ॥

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दिया जाय । केवल उनकी निंदा तथा उपहास कर उनको दुत्कारा जाय । यदि चोर सेंध लगाकर चोरी करें तो उन्हें चित्रवध का दण्ड ( कष्टकर प्राणदण्ड ) दिया जाय ।

(१) इसलिए कोषाध्यक्ष को चाहिए कि विश्वासी पुरुषों के सहयोग से ही वह धन-संग्रह आदि का कार्य करे ।

(२) कोषाध्यक्ष को चाहिए कि वह जनपद तथा नगर से होने वाली आय को अच्छी तरह से जाने । इस सम्बन्ध में उसे इतनी जानकारी होनी चाहिए कि यदि उससे सौ वर्ष पीछे की आय का लेखा-जोखा पूछा जाय तो तत्काल ही वह उसकी समुचित जानकारी दे सके । बचे हुए धन को वह सदा कोष में दिखाता रहे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सन्निधातृनिचयकर्म नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ।

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