भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183
प्रकरण २२# समाहर्तृसमुदयप्रस्थापनम्
अध्याय ६

(१) समाहर्ता दुर्गं राष्ट्रं खनिं सेतुं वनं व्रजं वणिक्पथं चावेक्षेत ।
(२) शुल्कं दण्डः पौतवं नागरिको लक्षणाध्यक्षो मुद्राध्यक्षः सुरा सूना सूत्रं तैलं घृतं क्षारः सौवर्णिकः पण्यसंस्था वेश्या द्यूतं वास्तुकं कारुशिल्पिगणो देवताध्यक्षो द्वारवाहिरिकादेयं च दुर्गम् ।
(३) सीता भागो बलिः करो वणिक् नदीपालस्तरो नावः पट्टनं विवीतं वर्तनी रज्जूश्चोररज्जूश्च राष्ट्रम् ।
(४) सुवर्णरजतवज्रमणिमुक्ता-प्रवालशङ्ख-लोहलवणभूमि-प्रस्तररस-धातवः खनिः ।


समाहर्त्ता का कर-संग्रह कार्य

( १ ) समाहर्त्ता ( कलक्टर जनरल ) को चाहिये कि वह १. दुर्ग, २. राष्ट्र, ३. खनि, ४. सेतु, ५. वन, ६. व्रज और ७. व्यापार सम्बन्धी कार्यों का निरीक्षण करे ।

( २ ) दुर्ग : शुल्क ( चुङ्गी ), दण्ड ( जुर्माना ), पौतव ( तराजू-बाट ), नगराध्यक्ष, लक्षणाध्यक्ष ( पटवारी, कानूनगो, अमीन ), मुद्राध्यक्ष, सुराध्यक्ष ( आबकारी अधिकारी ), सूनाध्यक्ष ( फाँसी देने वाला ), सूत्राध्यक्ष, तेल-घी आदि का विक्रेता, सुवर्णाध्यक्ष, दुकान, वेश्या, द्यूत, वास्तुक ( शिल्पी ), बढ़ई, लुहार, सुनार, मन्दिरों के निरीक्षक, द्वारपाल और नट-नर्तक आदि से लिया जाने वाला धन दुर्ग कहलाता है ।

( ३ ) राष्ट्र : सीता ( खेती ), भाग ( धान्य का षष्ठांश ), बलि ( उपहार ), कर ( फल, वृक्ष आदि का टैक्स ), वणिक् ( व्यापारकर ), नदीपालस्तर ( नदी पार होने का टैक्स ), नाव का कर, पट्टन ( कस्बों की आय ), विवीत ( चरागाहों की आय ), वर्तनी ( मार्गकर ), रज्जू ( भूमि निरीक्षकों द्वारा प्राप्तव्य धन ) और चोर रज्जू ( चोरों को पकड़ने के लिये ग्रामवासियों से मिला धन ) आदि आय के साधन राष्ट्र नाम से कहे जाते हैं ।

( ४ ) खनि : सोना, चाँदी, हीरा, मणि, मोती, मूँगा, शंख, लोहा, लवण, भूमि, पत्थर और खनिज पदार्थ खनि कहे जाते हैं ।