भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 188
१०४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) ततः सर्वाधिकरणानां करणीयं सिद्धं शेषमायव्ययौ नीवीं उपस्थानं प्रचारचरित्रसंस्थानं च निबन्धेन प्रयच्छेत् । उत्तममध्यमावरेषु च कर्मसु तज्जातिकमध्यक्षं कुर्यात् । सामुदायिकेष्ववक्लृप्तिकं यमुपहृत्य न राजानुत्तप्येत ।

(२) सहग्राहिणः प्रतिभुवः कर्मोपजीविनः पुत्रा भ्रातरो भार्या दुहितरो भृत्याश्चास्य कर्मच्छेदं वहेयुः ।

(३) त्रिंशतं चतुःपञ्चाशच्चाहोरात्राणां कर्मसंवत्सरः । तमाषाढीपर्यवसानमूनं पूर्णं वा दद्यात् । करणाधिष्ठितमधिमासकं कुर्यात् । अपसर्पाधिष्ठितं च प्रचारम् । प्रचारचरित्रसंस्थानान्यनुपलभमानो हि प्रकृतः समुदयमज्ञानेन परिहापयति । उत्थानक्लेशासहत्वादालस्येन, शब्दादिष्वि-


स्वास्थ्य सम्बन्धी सुधारों से प्राप्त धन का उल्लेख और मित्र राजाओं तथा शत्रु राजाओं के साथ संधि-विग्रह आदि के निमित्त प्राप्त हुआ अथवा खर्च हुए धन का विवरण आदि सभी ऐसे विषय हैं जिनका उल्लेख निबन्धपुस्तक ( एकाउण्ट बुक्स ) में किया जाना चाहिये ।

( १ ) इसके बाद सभी उत्पत्ति-केन्द्रों एवं विभागों के लिए किए जानेवाले, किए गए तथा बचे हुए आय, व्यय, नीवी, कार्यकर्ताओं की उपस्थिति, प्रचार, चरित्र और संस्थान आदि सब बातों को रजिस्टर में दर्ज करके राजा को दे देना चाहिए । उत्तम, मध्यम और निकृष्ट जैसे भी कार्य हों उनके अनुसार ही उनके अध्यक्ष नियुक्त किये जाने चाहिए । एक ही कार्य को करनेवाले अनेक व्यक्तियों में उसी व्यक्ति को अध्यक्ष नियुक्त किया जाना चाहिए जो निपुण, गुणी, यशस्वी हो और जिसे दण्ड देने के पश्चात् राजा को पश्चात्ताप न करना पड़े ।

( २ ) यदि कोई अध्यक्ष राजकीय धन का गबन करके उसको अदा करने में असमर्थ हो तो वह धन क्रमशः उसके हिस्सेदार, उसके जामिन, उसके अधीनस्थ कर्मचारी, उसके पुत्र एवं भाई, उसकी स्त्री एवं लड़की अथवा उसके नौकर अदा करें ।

( ३ ) तीन-सौ-चौवन दिन-रात का एक कर्मसंवत्सर होता है । उसकी समाप्ति आषाढ़ी पूर्णिमा को समझनी चाहिए । इसी वर्ष-गणना के हिसाब से प्रत्येक अध्यक्ष का वेतन दिया जाना चाहिए । यदि अध्यक्ष की नियुक्ति वर्ष के मध्य में हुई है तो उसको कम वेतन और यदि उसने पूरे वर्ष कार्य किया है तो उसे पूरा वेतन दिया जाना चाहिए । प्रत्येक कर्मचारी के कार्य का ब्यौरा उपस्थिति रजिस्टर से देखना चाहिए । अध्यक्ष को चाहिए कि वह जनपद के समस्त कार्यालयों की कार्य-व्यवस्था का ज्ञान गुप्तचरों से प्राप्त करे । यदि वह ऐसा नहीं करता तो अपनी अज्ञानता के

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