भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

प्र० २३ : अ० ७ ] गाणनिक के कार्य्य १०५

न्द्रियार्थेषु प्रमादेन, संक्रोशाधर्मानर्थभीरुर्भयेन, कार्य्यार्थिष्वनुग्रहबुद्धिः कामेन हिंसाबुद्धिः कोपेन, विद्याद्रव्यवल्लभापाश्रयाद् दर्पेण, तुलामानतर्कगणिकान्तरोपधानात् लोभेन ।

(१) तेषामानुपूर्व्या यावानर्थोपघातः तावानेकोत्तरो दण्ड इति मानवाः । सर्वत्राष्टगुण इति पाराशराः । दशगुण इति बार्हस्पत्याः । विंशतिगुण इत्यौशनसाः । यथापराधमिति कौटिल्यः ।

(२) गाणनिक्यान्याषाढीमागच्छेयुः । आगतानां समुद्रपुस्तभाण्डनीवीकानामेकत्रासम्भाषावरोधं कारयेत् । आयव्ययनीवीनामग्राणि श्रुत्वा


कारण वह धनोत्पादन में हानिकर सिद्ध होता है । १. अज्ञान २. आलस्य ३. प्रमाद ४. काम ५. क्रोध ६. दर्प ७. लोभ, ये धनोत्पादन में विघ्न डालने वाले दोष हैं । अधिक परिश्रम से कतराने के कारण आलस्य के द्वारा, गाना-बजाना तथा स्त्रियों में आसक्त रहने के कारण प्रमाद के द्वारा, निन्दा, अधर्म तथा अनर्थ के कारण भय द्वारा, किसी कार्यार्थी पर अनुग्रह करने के कारण काम द्वारा, किसी क्रूरता के कारण क्रोध द्वारा, विद्या, धन एवं राजप्रिय होने के कारण दर्प द्वारा, और नाप-तौल तर्कना तथा हिसाब में गड़बड़ कर देने के कारण लोभ के द्वारा, कर्मचारी लोग आमदनी में बाधा डाल देते हैं ।

( १ ) आचार्य मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'जो कर्मचारी ऊपर निर्दिष्ट दोषों के वशीभूत होकर जितना अपराध करे उसको उसी क्रम से दण्ड दिया जाना चाहिये' अर्थात् यदि वह अज्ञान के कारण अपराध करता है तो उसे उतना ही दण्ड दिया जाना चाहिए जितने का कि उसने नुकसान किया है, यदि वह आलस्य के कारण नुकसान करता है तो दुगुना, प्रमाद के कारण नुकसान करता है तो तिगुना दण्ड दिया जाना चाहिए । आचार्य पराशर के मतानुयायियों का कहना है कि 'अपराध करनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को अठगुना दण्ड देना चाहिये, क्योंकि सभी अपराध एक समान हैं ।' आचार्य वृहस्पति के अनुयायी विद्वानों का मत है कि 'सभी अपराधियों को दसगुना दण्ड दिया जाना चाहिए ।' शुक्राचार्य के अनुयायी कहते हैं कि 'सबको बीसगुना दण्ड मिलना चाहिए ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि जो जितना अपराध करे तदनुसार ही उसे दण्ड दिया जाना चाहिए ।'

( २ ) सभी कार्यालयों के अध्यक्ष ( विभिन्न जिलों के एकाउण्टेण्टस ) आषाढ़ के महीने में वर्ष की समाप्ति पर प्रधान कार्यालय में आकर हिसाब का मिलान करें । उन आये हुए लोगों को तब तक एक-दूसरे से बातचीत न करने दी जाय तथा मिलने न दिया जाय, जब तक कि उनके पास राजकीय मोहर लगे रजिस्टर तथा व्यय से बचा हुआ धन मौजूद हैं । सर्व प्रथम आय-व्यय को सुनकर उसके पास जो बचत