कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
बारहवाँ अधिकरण
बारहवाँ अधिकरण
आबलीयस
| प्रकरण १६२ | दूतकर्माणि |
|---|---|
| अध्याय १ |
(१) बलीयसाऽभियुक्तो दुर्बलः सर्वत्रानुप्रणतो वेतसधर्मा तिष्ठेत् । 'इन्द्रस्य हि स प्रणमति यो बलीयसो नमति' इति भारद्वाजः ।
(२) 'सर्वसन्दोहेन बलानां युध्येत, पराक्रमो हि व्यसनमपहन्ति । स्वधर्मश्चैष क्षत्रियस्य, युद्धे जयः पराजयो वा' इति विशालाक्षः ।
(३) नेति कौटिल्यः । सर्वत्रानुप्रणतः कुलैडक इव निराशो जीविते वसति । युध्यमानश्चाल्पसैन्यः समुद्रमिवाप्लवोऽवगाहमानः सीदति । तद्विशिष्टं तु राजानमाश्रितो दुर्गमविषह्यं वा चेष्टेत ।
दूतकर्म
(१) 'जब किसी दुर्बल राजा पर कोई बलवान् राजा आक्रमण करे तो उसे चाहिए कि वह हर प्रकार का अपमान सहन करता हुआ उसके सामने बेत की तरह झुक जाय। जो अपने से बलवान् राजा के सामने झुकता है, वह दंड के सामने झुकता है'—यह आचार्य भारद्वाज का मत है।
(२) किन्तु इसके विरुद्ध आचार्य विशालाक्ष की राय है कि 'दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपनी सारी सैन्य-शक्ति को लगाकर बलवान् राजा के साथ युद्ध करे; क्योंकि पराक्रम ही आपत्तियों को नष्ट करता है और पराक्रम तो क्षत्रिय का धर्म है। युद्ध में विजय हो या पराजय, क्षत्रिय को अपने क्षात्रधर्म का पालन करना चाहिए; शत्रु के आगे कदापि न झुकना चाहिए।'
(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त दोनों मतों से सहमत नहीं है। उसका कहना है कि 'जो दुर्बल राजा हर तरह का अपमान होने पर भी नम्र ही बना रहता है उसका जीवन वैसा ही दूभर हो जाता है, जैसा कि अपने समूह से अलग हुए मेंढे का। इसी प्रकार थोड़ी सेना को लेकर जो युद्ध में जाता है उसकी वही स्थिति है; जो तैरने के साधनों को साथ लिये बिना ही समुद्र में कूद पड़ता है। इसलिए दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी राजा के सामने या उससे भी अधिक शक्तिशाली किसी दूसरे राजा का आश्रय प्राप्त करे। अथवा ऐसे दुर्ग में जाकर शत्रु का मुकाबला करे, जो कि अभेद्य हो।
६८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) त्रयोऽभियोक्तारो धर्मलोभासुरविजयिन इति । तेषामभ्यवपत्त्या धर्मविजयी तुष्यति; तमभ्यवपद्येत परेषामपि भयात् । भूमिद्रव्यहरणेन लोभविजयी तुष्यति; तमर्थेनाभ्यवपद्येत । भूमिद्रव्यपुत्रदारप्राणहरणेन असुरविजयी, तं भूमिद्रव्याभ्यामुपगृह्याग्राह्यः प्रतिकुर्वीत । (२) तेषामुत्तिष्ठमानं सन्धिना मंत्रयुद्धेन कूटयुद्धेन वा प्रतिव्यूहेत । शत्रुपक्षमस्य सामदानाभ्यां, स्वपक्षं भेददण्डाभ्याम् । दुर्गं राष्ट्रं स्कन्धावारं वास्य गूढाः शस्त्ररसाग्निभिः साधयेयुः । (३) सर्वतः पार्ष्णिमस्य ग्राहयेत्, अटवीभिर्वा राज्यं घातयेत्, तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां वा हारयेत् । (४) अपकारान्तेषु चास्य दूतं प्रेषयेत् । अनपकृत्य वा सन्धानम् । तथाप्यभिप्रयान्तं कोशदण्डयोः पादोत्तरमहोरात्रोत्तरं वा सन्धि याचेत ।
(१) दुर्बल राजा पर आक्रमण करने वाला बलवान् राजा तीन प्रकार का होता है : १. धर्मविजयी २. लोभविजयी और ३. असुरविजयी । उनमें धर्मविजयी तो आत्मसमर्पण करने से संतुष्ट हो जाता है । उस धर्मविजयी राजा की शाखा में जाने से दुर्बल राजा अपने वर्तमान संकट को तो दूर कर ही लेता है, वरन् दूसरे बलवान् राजाओं से भी वह अपनी रक्षा कर लेता है लोभविजयी राजा भूमि और धन देने से संतुष्ट हो जाता है । इसलिए दुर्बल राजा धनादि देकर उसको संतुष्ट करे । किन्तु असुरविजयी राजा तो भूमि, द्रव्य, स्त्री, पुत्र और प्राणों तक ले लेने के बाद ही सूझता है । इसलिए उससे दूर रहकर ही उसको भूमि आदि देकर अपने अनुकूल बनाना चाहिए या संधि आदि के द्वारा उसका प्रतीकार करना चाहिए ।
(२) यदि उक्त राजाओं में से कोई राजा दुर्बल राजा पर आक्रमण करे तो संधि, मंत्र-युद्ध अथवा कूट-युद्ध के द्वारा उसका मुकाबला करना चाहिए । उस बलवान् अभियोक्ता के शत्रुपक्ष को साम तथा दाम द्वारा अपने अनुकूल बनाना चाहिए और अपने प्रकृतिवर्ग को भेद तथा दण्ड द्वारा अपने वश में रखना चाहिए । उस प्रबल राजा के दुर्ग, राष्ट्र तथा छावनियों को अपने गुप्तपुरुषों द्वारा शस्त्र, विष तथा अग्नि आदि से नष्ट कर देना चाहिए ।
(३) यथावसर उसके आगे-पीछे, अगल-बगल से छापा मारना चाहिये; अथवा आटविक पुरुषों द्वारा उसके दुर्ग, जनपद को नष्ट करवा देना चाहिए; अथवा उसके द्वारा अवरुद्ध उसके किसी बंधु-बांधव द्वारा ही उसके राज्य का अपहरण करवा देना चाहिए ।
(४) इस प्रकार उसका अनिष्ट कर देने के बाद संधि के लिए उसके पास अपना दूत भेजना चाहिए । अथवा यदि उसका अनिष्ट न किया जा सके तो उससे
प्र० १६२ : अ० १ ] दूतकर्म ६८१
(१) स चेद्दण्डसन्धि याचेत, कुण्ठमस्मै हस्त्यश्वं दद्यात् । उत्साहितं वा गरयुक्तम् । (२) पुरुषसन्धि याचेत, दूष्यामित्राटवीबलमस्मै दद्याद्योगपुरुषाधिष्ठितम् । तथा कुर्याद्यथोभयविनाशः स्यात् । तीक्ष्णबलं वाऽस्मै दद्यात्, यदवमानितं विकुर्वीत । मौलमनुरक्तं वा, यदस्य व्यसनेऽपकुर्यात् । (३) कोशसन्धि याचेत, सारमस्मै दद्यात् । यस्य क्रेतारं नाधिगच्छेत्; कुप्यमयुद्धयोग्यं वा । (४) भूमिसन्धि याचेत, प्रत्यादेयां नित्यामित्रामनपाश्रयां महाक्षयव्ययनिवेशां वास्मै भूमिं दद्यात् । (५) सर्वस्वेन वा राजधानीवर्जेन सन्धि याचेत बलीयसः ।
संधि की याचना करनी चाहिए। यदि वह इतने पर भी रजामंद न हो और चढ़ाई करने पर ही आमादा हो तो पूर्वप्रतिज्ञात धन में अपने कोष तथा सेना का चौथाई भाग अधिक बढ़ाकर उससे संधि के लिए याचना करनी चाहिए।
( १ ) यदि वह बलवान् अभियुक्ता संधि की शर्तों में केवल सेना को ही लेना चाहे तो सर्वथा अशक्त हाथी, घोड़े अथवा विष खिलाकर सशक्त हाथी, घोड़े देकर संधि कर लेनी चाहिए ।
( २ ) यदि वह संधि की शर्तों में पैदल सेना की माँग करे तो अपने गुप्तचरों को साथ मिलाकर दूष्यबल, शत्रुबल तथा आटविकबल शर्तनामा में देने चाहिए और इस प्रकार का प्रबंध करे कि अपनी वे दूष्य आदि सेनायें तथा शत्रु की सेनायें नष्ट हो जायें । अथवा ऐसे तीक्ष्ण बल को देना चाहिए जो थोड़ी सी बात पर बिगड़ उठे और शत्रु का अपकार करने के लिए तैयार हो जाय । अथवा वंशपरंपरा से चली आती अनुरक्त तथा विश्वासी सेना को संधि में देना चाहिए, जो आपत्ति के समय शत्रु का अपकार कर सके ।
( ३ ) यदि अभियुक्ता संधि के बदले में धन लेना पसंद करे तो ऐसे बहुमूल्य रत्न आदि दिये जायें, जिन्हें कोई न खरीद सके अथवा ऐसा सामान दिया जाय जो युद्ध में काम न आ सके ।
( ४ ) यदि अभियुक्ता भूमिसंधि की माँग करे तो उसको ऐसी भूमि दी जाय, जिसको आसानी से वापस लिया जा सके अथवा जिसके स्थायी शत्रु हों या जिसमें कोई दुर्ग न हो और जिसमें अधिक क्षय-व्यय की आशंका हो ।
( ५ ) अथवा जो अत्यंत बलवान् अभियुक्ता हो उसको राजधानी के अलावा अपना सर्वस्व देकर, उससे संधि कर लेनी चाहिए ।
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में दूतकर्म नामक पहला अध्याय समाप्त ।
६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) यत्प्रसह्य हरेदन्यस्तत्प्रयच्छेदुपायतः ।
रक्षेत्स्वदेहं न धनं का ह्यनित्ये धने दया ॥
इति आबलीयसनाम्नि द्वादशेऽधिकरणे दूतककर्मणि सन्धियाचनं नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितः पञ्चत्रिंशदधिकशततमः ।
—: ० :—
( १ ) यदि कोई बलवान् अभियोक्ता किसी दुर्बल राजा से बलात् धन आदि का अपहरण करे तो वह धन संधि आदि के बहाने उसी को दे देना चाहिए । धन की की अपेक्षा अपने प्राणों की अधिक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि अनित्य धन पर अधिक मोह करना ठीक नहीं है । यदि जीवन रहेगा तो नष्ट हुआ धन फिर से पैदा किया जा सकता है ।
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में दूतकर्म नामक पहला अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण १६३ | मन्त्रयुद्धम् |
|---|---|
| अध्याय २ |
(१) स चेत्सन्धौ नावतिष्ठेत, ब्रूयादेनम्—‘इमे षड्वर्गवशगा राजानो विनष्टाः, तेषामनात्मवतां नार्हसि मार्गमनुगन्तुम्, धर्ममर्थं चावेक्षस्व, मित्रमुखा ह्यमित्रास्ते ये त्वां साहसधर्ममर्थातिक्रमं व ग्राहयन्ति, शूरैस्त्यक्तात्मभिः सह योद्धुं साहसं जनक्षयमुभयतः कर्तुमधर्मः; दृष्टमर्थं मित्रमदुष्टं च त्यक्तुमर्थातिक्रमः। मित्रावांश्च स राजा भूयश्चैतेन अर्थेन मित्राण्युद्योजयिष्यति, यानि त्वा सर्वतोऽभियास्यन्ति। न च मध्यमउदासीनयोर्मण्डलस्य वा परित्यक्तः, भवांस्तु परित्यक्तो ये त्वां समुद्युक्तमुपप्रेक्षन्ते—‘भूयः क्षयव्ययाभ्यां युज्यतां, मित्राच्च भिद्यताम्, अथैनं परित्यक्तमूलं सुखेनोध्छेत्स्याम’ इति। स भवान् नार्हति मित्रमुखानाममित्राणां श्रोतुं मित्राण्युद्वेज-
मंत्रयुद्ध
( १ ) यदि प्रबल अभियोक्ता संधि के लिए राजी न हो तो उससे कहा जाय कि 'देखिए; काम, क्रोधादि अरि षड्वर्ग के चंगुल में फँस कर इन विनष्ट हुए राजाओं का उदाहरण आपके सामने प्रत्यक्ष है, आपको ऐसे नीच-राजाओं का अनुसरण करना शोभा नहीं देता है, अपने धर्म और अर्थ की ओर तो देखिए। आपके ये ऊपरी मित्र वस्तुतः आपके भीतरी शत्रु हैं, जो आपको युद्ध, अधर्म और अपव्यय की ओर प्रेरित कर रहे हैं, अपने प्राणों को हथेली पर रखकर दूसरे बलवान् राजा के साथ युद्ध करना ही तो साहस है, उसमें दोनों ओर के आदमियों का नाश होता है, यही तो अधर्म है; विद्यमान धन और अत्यन्त सज्जन मित्र को छोड़ने के लिए आपको जो प्रोत्साहित किया जा रहा है, वही तो धन का अपव्यय है; उस राजा के और भी मित्र हैं, इसी धन से वह अपने उन मित्रों को साथ लेकर आप पर ही आक्रमण कर देगा; मध्यम और उदासीन राजा भी उसकी मदद के लिए तैयार बैठे हैं; लेकिन आपको तो उन्होंने त्याग दिया है, युद्ध के लिए तैयार आपको वे लोग चुपचाप देख रहे हैं कि आपके प्रभूत जन-धन का नाश हो जाय और आपका अपने मित्र के साथ मतभेद हो जाय, इस प्रकार जब आपकी सारी शक्ति क्षीण हो जायेगी और जब आप अपनी राजधानी को छोड़कर युद्ध में चले जायेंगे तो वे बड़ी सरलता से आपका उच्छेद कर देंगे, इसलिए आपके लिए यही उचित है कि ऊपर से मित्र बने
६८४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ बारहवाँ अधिकरण
यितुम्, अमिश्रांश्च श्रेयसा योक्तुम्, प्राणसंशयमनर्थं चोपगन्तुम्' इति । यच्छेत् ।
(१) तथापि प्रतिष्ठमानस्य प्रकृतिकोपमस्य कारयेद् यथा संघवृत्ते व्याख्यातं, योगवामने च । तीक्ष्णरसदप्रयोगं च । यदुक्तमात्मरक्षितके रक्ष्यं, तत्र तीक्ष्णान् रसदांश्च प्रयुञ्जीत ।
(२) बन्धकीपोषकाः परमरूपयौवनाभिः स्त्रीभिः सेनामुख्यानुन्मादयेयुः । बहूनामेकस्यां द्वयोर्वा मुख्ययोः कामे जाते तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । कलहे पराजितपक्षं परत्रापगमने यात्रासाहाय्यदाने वा भर्तुर्योजयेयुः ।
(३) कामवशान् वा सिद्धव्यञ्जनाः सांवननिकीभिरोषधिभिरतिसन्धानाय मुख्येषु रसं दापयेयुः ।
(४) वैदेहकव्यञ्जनो वा राजमहिष्याः सुभगायाः प्रेष्यामासन्नां काम-
उन भीतरी शत्रुओं का आप विश्वास न करें, अपने मित्रों को खिन्न कर शत्रुओं के कल्याण-साधन मत बनायें, अपने प्राणों को विपत्ति में डालकर अपने धन का इस प्रकार अपव्यय न कीजिए।' इस प्रकार समझाये गये राजा को जिस शर्त पर संधि के लिए तैयार किया जाय, उस शर्त को पूरा करके संधि को पक्की बनाने के लिए यत्न किया जाना चाहिए ।
(१) यदि इस प्रकार समझाने-बुझाने पर भी वह राजी न हो और युद्ध के लिए तैयार हो तो संघवृत्त तथा योगवृत्त अधिकरणों में निर्दिष्ट उपायों के द्वारा उसके प्रकृतिमंडल को कुपित कर देना चाहिए । उस आक्रमणकारी को मारने के लिए तीक्ष्ण तथा रसद गुप्तचर नियुक्त किये जाँय । आत्मरक्षित प्रकरण में जिन रक्षायोग्य स्थानों का निरूपण किया गया है वहाँ पर तीक्ष्ण तथा रसद आदि गुप्त-चरों को नियुक्त कर उस राजा का काम तमाम कर देना चाहिए ।
(२) कुलटा स्त्रियों का पालन-पोषण करने वाले गुप्तचरों को चाहिए कि वे सुन्दर रूपवती युवती स्त्रियों के द्वारा सेना के प्रमुख व्यक्तियों को प्रमादी बनवा दें, जब बहुत सारे अथवा दो सेनामुख्यों को एक ही स्त्री में कामासक्ति हो जाय तब तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें परस्पर कलह पैदा कर दें । आपसी झगड़े में जो हार जाय उसको विजिगीषु के पक्ष में भेज दिया जाय और जब विजिगीषु आक्रमण करने लगे तब सहायतार्थ उसको नियुक्त किया जाय ।
(३) अथवा जो सेना मुख्य कामासक्त हों, उन्हें सिद्ध के वेश में रहने वाले गुप्तचर वशीकरण द्वारा उस सुन्दरी युवती को वश में करने के उपायों का बहाना करके विषमिश्रित औषधि खिलाकर मार डालें ।
(४) व्यापारी के वेश में रहने वाला गुप्तचर अति सुन्दरी पटरानी की अंतरंग
प्र० १६३ : अ० २ ] मन्त्रयुद्ध ६८५
निमित्तमर्थेनाभिवृष्य परित्यजेत् । तस्यैव परिचारकव्यञ्जनोपदिष्टः सिद्धव्यञ्जनः सांवननिकीमोषधिं दद्याद्, वैदेहकशरीरेऽवघातव्येति । सिद्धे सुभगया अप्येनं योगमुपदिशेद्—राजशरीरेऽवघातव्या इति । ततो रसेनातिसन्दध्यात् । (१) कार्तान्तिकव्यञ्जनो वा महामात्रं राजलक्षणसम्पन्नं क्रमाभिनीतं ब्रूयात् । भार्यामस्य भिक्षुकी—'राजपत्नी राजप्रसविनी वा भविष्यसि' इति । (२) भार्याव्यञ्जना वा महामात्रं ब्रूयात्—'राजा किल मामवरोधयिष्यति, तवान्तिकाय पत्रलेख्यमाभरणं चेदं परिव्राजिकयाऽऽहृतम्' इति । (३) सूदारालिकव्यञ्जनो वा रसप्रयोगार्थं राजवचनामर्थं चास्य
सेविका को प्रचुर धन दे कर अपने उपभोग के लिए उसे फुसलाये और एक बार उसका भोग कर दुबारा उसके पास न जाये । फिर उसी गुप्तचर से प्रेरित होकर दूसरा सिद्ध वेषधारी उस पटरानी की सेविका को वशीकरण औषधि देकर उससे कहे कि 'इस औषधी को अपने व्यापारी प्रेमी के शरीर पर छिड़क देना, वह तुम्हारे वश में हो जायेगा ।' जब दिखावा मात्र के लिए वह व्यापारी वेषधारी गुप्तचर उस सेविका के वश में हो जाय तब उस सुन्दरी पटरानी को भी वशीकरण के प्रयोग का उपदेश दिया जाय । उससे कहा जाय कि 'इस औषधि को राजा के शरीर पर छिड़क देने से वह तुम्हारे काबू में हो जायेगा ।' उस वशीकरण योग में विष मिलाकर इस प्रकार राजा का वध कर दिया जाय ।
(१) अथवा ज्योतिषी ( कार्तान्तिक ) के वेश में रहने वाला गुप्तचर, विश्वासी राजलक्षण-संपन्न महामात्र को यह कहकर फुसलाये कि 'तुम अवश्य ही राजा बनोगे ।' और भिक्षुकी गुप्तचर स्त्री द्वारा उस महामात्र की पत्नी को कहला दिया जाय कि 'तुम पटरानी बनोगी और तुम राजा होने योग्य पुत्र को पैदा करोगी ।' इस प्रकार राजा बनने की इच्छा रखने वाले महामात्र का राजा से विरोध हो जायेगा ।
(२) अथवा महामात्र की स्त्री बनकर रहने वाली छद्मवेश स्त्री उससे कहे कि 'राजा मुझे अवश्य ही अपने अंतःपुर में रोक लेगा । दूती द्वारा लाये गये तुम्हारे नाम के इस पत्र और इन आभरणों से यह साफ जाहिर होता है ।' ऐसा करने से भी महामात्र का राजा के साथ विरोध हो जायेगा ।
(३) अथवा रसोइया ( सूद ) और मांस बनाने वालों ( आरालिक ) के वेष में रहने वाले गुप्तचर विष का प्रयोग करने के लिए राजा के गुप्त कथन को तथा इस लोभ में डालने के लिए दिये हुए राजा के धन को कि, महामात्र को मारना है,
| ६८६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ बारहवां अधिकरण |
|---|
लोभनीयमभिनयेत् । तदस्य वैदेहकव्यञ्जनः प्रतिसन्दध्यात्, कार्यसिद्धिं च ब्रूयात् । एवमेकेन द्वाभ्यां त्रिभिरित्युपायैरेकैकस्य महामात्रं विक्रमायाप-गमनाय वा योजयेदिति ।
(१) दुर्गेषु चास्य शून्यपालालाञ्छाः सत्रिणः पौरजानपदेषु मैत्रोनिमित्त-मावेदयेयुः—‘शून्यपालेनोक्ता योधाश्च अधिकरणस्थाश्च—‘कृच्छ्रगतो राजा जीवन्नागमिष्यति न वा; प्रसह्य वित्तमार्जमध्वममित्रांश्च हत’ इति । बहुली-भूते तीक्ष्णाः पौरान् निशास्वाहारयेयुः, मुख्यांश्चाभिहन्युः—‘एवं क्रियन्ते, ये शून्यपालस्य न शुश्रूषन्ते’ इति । शून्यपालस्थानेषु च सशोणितानि ‘शस्त्र-वित्तबन्धनान्युत्सृजेयुः । ततः सत्रिणः—‘शून्यपालो घातयति विलोपयति च’ इत्यावेदयेयुः ।
(२) एवं जानपदान्समाहर्तुर्भेदयेयुः ।
महामात्र के सामने प्रकट कर दें । ठीक उसी समय व्यापारी के वेष में रहने वाला गुप्तचर महामात्र के पास आकर साक्षी रूप में कहे कि ‘राजा के कहने से मैंने तुम्हारे सूद और आरालिक को विष दिया था; मैं नहीं जानता कि वे किस उद्देश्य के लिए ले गये थे ।’ और यह भी बता दे कि ‘इस विष से तत्काल ही मृत्यु हो सकती है ।’ इस प्रकार विजिगीषु के गुप्तचर एक, दो या तीनों प्रयोगों से महामात्र को राजा के विरुद्ध बनाकर दोनों को युद्ध के लिए उभाड़ दें ।
( १ ) शत्रु के स्थानीय दुर्गों में रहने वाले शून्यपाल की ओर सभी गुप्तचर नगरवासियों तथा जनपदवासियों से कहे ‘शून्यपाल ने सेनाओं और राजकर्मचारियों से कहा है कि राजा महान् विपत्ति में फँस गया है । कहा नहीं जा सकता कि वह जीवित लौट भी सकेगा या नहीं ! इसलिए बलपूर्वक आप यथेच्छया जनता से धन लूटें और जो बाधा डाले उसको मार डालें ।’ जब शून्यपाल की यह आज्ञा सर्वत्र फैल जाय तब तीक्ष्ण गुप्तचर अपने आदमियों को रात में नगर की लूट-पाट करने के लिए प्रेरित करें और नगर के प्रमुख व्यक्तियों को मरवा डालें । सब जगह इस बात को फैला दें कि ‘जो शून्यपाल का कहना न मानेंगे उनकी यही हालत की जायेगी ।’ इसी बीच वे रक्त से भीगे अस्त्र-शस्त्र तथा रस्सी आदि को शून्यपाल के स्थान में रखवा दें । तदनन्तर सभी गुप्तचर इस बात का प्रचार करें कि ‘यह शून्यपाल ही सब लोगों को मरवाता तथा लुटवाता है’ इस तरीके से शून्यपाल तथा प्रजा में लड़ाई करा दी जाय ।
( २ ) इसी प्रकार समाहर्त्ता ( टैक्स कलैक्टर ) और जनपदवासियों के बीच फूट डाली जाय ।
प्र० १६३ : अ० २ ] मन्त्रयुद्ध ६८७
(१) समाहर्तृपुरुषांस्तु ग्राममध्येषु रात्रौ तीक्ष्णा हत्वा ब्रूयुः—'एवं क्रियन्ते, ये जनपदमधर्मेण बाधन्ते' इति । (२) समुत्पन्ने दोषे शून्यपालं समाहर्त्तारं वा प्रकृतिकोपेन घातयेयुः । तत्कुलीनमवरुद्धं वा प्रतिपादयेयुः । (३) अन्तःपुरपुरद्वारद्रव्यधान्यपरिग्रहान् । दहेयुस्तांश्च हन्युर्वा ब्रूयुरस्यार्तवादिनः ॥
इति आबलीयसे द्वादशेऽधिकरणे मन्त्रयुद्धं नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितः षट्त्रिंशदधिकशततमः ।
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( १ ) समाहर्त्ता के आदमियों को रात के समय गाँव के मध्य में मारकर तीक्ष्ण गुप्तचर यह प्रचार करें कि 'जो लोग अधर्मपूर्वक प्रजावर्ग को पीड़ित करते हैं उनकी यही दशा होती है ।'
( २ ) जब शून्यपाल और समाहर्ता, दोनों के ऐसे कुकर्म सर्वत्र फैल जायें और उनसे प्रजाजन पूरी तरह कुपित हो जायें, तब सभी गुप्तचर उनका भी वध कर डालें और उस शत्रु राजा के किसी बन्धु-बांधव को या नजरबन्द राजकुमार को सिंहासन पर बैठा दें ।
( ३ ) उसके बाद तीक्ष्ण गुप्तचर अंतःपुर, पुरद्वार ( नगर का प्रधान द्वार ), द्रव्य परिग्रह ( लकड़ी-वस्त्र के गोदाम ) और धान्य परिग्रह ( अन्नभंडार ) आदि को जला दें तथा उन स्थानों के रक्षकों को मार डालें। तदनन्तर स्वयं इस दुर्घटना के लिए हार्दिक दुःख प्रकट करते हुए, इस कार्य को नगर या गाँव के लोगों का किया हुआ बतायें ।
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में मन्त्रयुद्ध नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १६४-१६५ | ## सेनामुख्यवधः मण्डलप्रोत्साहनं च |
|---|---|
| अध्याय ३ |
(१) राज्ञो राजवल्लभानां चासन्नाः सत्रिणः पत्त्यश्वरथद्विपमुख्यानां ‘राजा क्रुद्धः’ इति सुहृद्विश्वासेन मित्रस्थानीयेषु कथयेयुः । बहुलीभूते तीक्ष्णाः कृतरात्रिचारप्रतीकाराः गृहेषु ‘स्वामिवचनेन आगम्यताम्’ इति ब्रूयुः तान्निर्गच्छत एवाभिहन्युः । ‘स्वामिसन्देशः’ इति चासन्नान् ब्रूयुः । ये च प्रवासितास्तान् सत्रिणो ब्रूयुः—‘एतत्तद् यदस्माभिः कथितं जीवितुकामेन अपक्रान्तव्यम्’ इति ।
(२) येभ्यश्च राजा याचितो न ददाति तान् सत्रिणो ब्रूयुः—‘उक्तः शून्यपालो राज्ञा—अयाच्यमर्थमसौ चासौ मा याचते, मया प्रत्याख्याताः शत्रु-संहिताः, तेषामुद्धरणे प्रयतस्व’ इति । ततः पूर्ववदाचरेत् ।
सेनापतियों का वध और राजमण्डल की सहायता
( १ ) राजा तथा राजा के प्रियजनों के निकट मित्र बनकर रहने वाले सभी गुप्तचर : पैदल, घुड़सवार, रथसवार तथा हाथीसवार सेनाओं के अध्यक्षों और महामात्रों के मित्रों के यहाँ जाकर अत्यन्त विश्वासी मित्रों की तरह उससे कहें कि ‘सेनाध्यक्ष आदि पर राजा कुपित हो गया है ।’ जब यह प्रवाद सर्वत्र फैल जाय तब, रात्रिभ्रमण की निषेधाज्ञा में भ्रमण करने की अनुमति प्राप्त कर सभी गुप्तचर घर-घर में जाकर सेनाध्यक्ष आदि से कहें कि ‘स्वामी की आज्ञा से आप लोगों को तत्काल स्वामी के पास जाना चाहिए ।’ और जब वे बाहर निकलें तो उन्हें मरवा डालें । तदनन्तर मित्र के वेष में रहने वाले तीक्ष्ण गुप्तचर सभी गुप्तचरों से कहें कि हमने यह सब कार्य स्वामी की आज्ञा से किया है । जो सेनापति आदि पहिले ही राजा को छोड़ कर चले गये हैं उनसे सभी गुप्तचर कहें ‘देखिए, जो हमने कहा था वही हुआ न, कि जो भी अपनी जान बचाना चाहे वह यहाँ से भाग जाय ।’
( २ ) किसी के द्वारा कोई वस्तु माँगी जाने पर राजा जब उस वस्तु को न दे तो उस माँगने वाले से सभी गुप्तचर यों कहें ‘राजा ने शून्यपाल से कह दिया है कि अमुक-अमुक व्यक्तियों ने मुझ से न माँगी जाने योग्य वस्तुएँ माँगी हैं । मैंने देने से इनकार कर दिया । इसलिए कि वे लोग शत्रु से मिल गये हैं । अतः उनको नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील रहो ।’ ऐसा कहने के बाद पूर्ववत् सब कार्य किया जाय;
प्र० १६४-१६५ : अ० ३ ] मण्डलप्रोत्साहन ६८९
(१) येभ्यश्च राजा याचितो ददाति, तान् सत्रिणो ब्रूयुः—'उक्तः शून्य-पालो राज्ञा—अयाच्यमर्थमसौ चासौ च मा याचते, तेभ्यो मया सोऽर्थो विश्वासार्थं दत्तः, शत्रुसंहिताः। तेषामुद्धरणे प्रयतस्व' इति। ततः पूर्व-वदाचरेत्। (२) ये चैनं याच्यमर्थं न याचन्ते, तान् सत्रिणो ब्रूयुः—'उक्तः शून्यपालो राज्ञा—याच्यमर्थमसौ चासौ च मा न याचते; किमन्यत् स्वदोषशङ्कितत्वात्, तेषामुद्धरणे प्रयतस्व' इति। ततः पूर्ववदाचरेत्। (३) एतेन सर्वः कृत्यपक्षो व्याख्यातः। (४) प्रत्यासन्नो वा राजानं सत्री ग्राहयेत् 'असौ चासौ च ते महामात्रः शत्रुपुरुषैः सम्भाषते' इति। प्रतिपन्ने दूष्यानस्य शासनहरान् दर्शयेत्—'एत-त्तत्' इति। (५) सेनामुख्यप्रकृतिपुरुषान् वा भूम्या हिरण्येन वा लोभयित्वा स्वेषु
अर्थात् तीक्ष्ण गुप्तचर रात में कुछ आदमियों को मार दें; जिनको न मारें उनको वध का भय दिखाकर राजा से फोड़ दें।
(१) माँगने पर जिन्हें राजा कोई वस्तु दे दे उनसे सभी गुप्तचर कहें कि 'राजा ने शून्यपाल से कहा है कि अमुक-अमुक व्यक्तियों ने मुझसे न माँगने योग्य वस्तु माँगी है, मैंने उनको वह वस्तु इसलिए दे दी है कि उनका मुझ पर विश्वास बना रहे; किन्तु वे व्यक्ति शत्रु से मिले हैं, अतः उनका वध करने के लिए तुम्हें यत्नशील रहना चाहिए' ऐसा कहने के बाद पूर्ववत् सब कार्य किया जाय।
(२) जो महामात्र आदि माँगने योग्य वस्तु भी राजा से नहीं माँगते उनसे सभी गुप्तचर कहें 'राजा ने शून्यपाल को कह दिया है कि अमुक-अमुक व्यक्ति मुझसे माँगने योग्य वस्तुओं को भी नहीं माँगते। इसका कारण इसके सिवा दूसरा क्या हो सकता है कि वे अपने दोषों के कारण मुझसे शंकित रहते हैं और इसलिए मेरे पास नहीं आते हैं। तुम उनका वध करने के लिए यत्नशील रहो।' ऐसा कहने के बाद पूर्ववत् सब कार्य किया जाय।
(३) इसी प्रकार क्रुद्ध, लुब्ध, भीत आदि कृत्यपक्ष के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए।
(४) अथवा राजा के पास कपटपूर्वक रहने वाले सभी गुप्तचर राजा से कहें कि 'अमुक-अमुक महामात्र तुम्हारे शत्रुओं के साथ मिले हुए हैं।' जब राजा को इस बात पर विश्वास हो जाय तो सभी राजद्रोहियों द्वारा महामात्र का सन्देश ले जाते हुए दिखा दे और कहे 'देखिए, वही बात हुई, जो मैंने आपसे कही थी।'
(५) अथवा सेना के अध्यक्षों, अमात्य आदि प्रकृतियों और अन्य राजकर्म-चारियों को सभी गुप्तचर धन तथा भूमि आदि के लोभ में फँसाकर उनके अपने ही
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| ६९० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ बारहवां अधिकरण |
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विक्रमयेदपवाहयेद्वा। योऽस्य पुत्रः समीपे दुर्गे वा प्रतिवसति, तं सत्रिणोप- जापयेत्—'आत्मसम्पन्नतस्त्वं पुत्रः तथाप्यन्तर्हितः, तत् किमुपेक्षसे। विक्रम्य गृहाण, पुरा त्वा युवराजो विनाशयति' इति। (१) तत्कुलीनमवरुद्धं वा हिरण्येन प्रतिलोभ्य ब्रूयात्—'अन्तर्बलं प्रत्यन्त- स्कन्धमन्यं वास्य प्रमृद्नीहि' इति। (२) आटविकानर्थमानाभ्यामुपगृह्य राज्यमस्य घातयेत्। (३) पार्ष्णिग्राहं वास्य ब्रूयाद्—'एष खलु राजा मामुच्छिद्य त्वामुच्छे- त्स्यति; पार्ष्णिमस्य गृहाण; त्वयि निवृत्तस्याहं पार्ष्णि ग्रहीष्यामि' इति। मित्राणि वास्य ब्रूयात्—'अहं वः सेतुः, मयि विभिन्ने सर्वानैष वो राजाप्ला- यिष्यति' इति। 'सम्भूय वास्य यात्रां विहनाम' इति। तत्संहतानां च प्रेष-
आदमियों पर उनके द्वारा चढ़ाई करा दे; या उनको राजा के यहाँ से कहीं दूसरी जगह भगा दें। तदनन्तर सभी गुप्तचर राजधानी में या अन्तपाल के पास दुर्ग में रहने वाले राजकुमार को इस प्रकार फुसलाएँ 'राजा ने जिस पुत्र को युवराज बनाया है, तुम्हारी योग्यता उससे किसी कदर कम नहीं है; फिर भी राजा ने तुम्हें नियन्त्रित कर रखा है। अब तुम इस बात की लापरवाही न करके राजा पर धावा बोल दो और राज्य को अपने अधीन कर लो। अन्यथा बहुत सम्भव है कि युवराज तुम्हें ही मार डाले।'
(१) अथवा शत्रु के किसी बन्धु-बांधव को या नजरबन्द राजकुमार को धन का प्रलोभन देकर सभी गुप्तचर इस प्रकार फुसलाएँ 'तुम राजा के मौलबल को या सीमा पर नियुक्त सेना को अथवा दूसरी किसी सेना को नष्ट कर डालो और आटविकों को धन तथा सत्कार से वश में करके उन्हीं के द्वारा शत्रु के राज्य पर चढ़ाई करा दो।'
(२) आटविकों को धन तथा सत्कार से वश में करके शत्रु के राज्य को उन्हीं के द्वारा नष्ट करवा दे। यहाँ तक सेनामुख्यों को वश में करने की युक्तियों का निरूपण किया गया है।
(३) विजिगीषु राजा शत्रु राजा के पार्ष्णिग्राह से कहे—'देखो, यह राजा मेरा उच्छेद करके फिर तुम्हारा भी अवश्यमेव उच्छेद करेगा। अतः तुम इसके पार्ष्णिग्राह बनकर पीछे से इस पर आक्रमण करो। जब वह तुम पर आक्रमण करेगा तब मैं उसकी पार्ष्णि ग्रहण कर उस पर आक्रमण कर दूँगा।' अथवा विजिगीषु शत्रु के मित्रों से कहे 'मैं ही तुम्हारा पुल हूँ। मेरे नष्ट हो जाने पर यह राजा तुमको भी नष्ट कर डालेगा। इसलिए हम सब मिलकर इसके आक्रमण का मुकाबला करें।' तदनन्तर विजिगीषु राजा अपने शत्रु के मित्रों तथा शत्रुओं को यह सन्देश भेजे कि 'निश्चित
प्र० १६४-१६५ : अ० ३ ] मण्डलप्रोत्साहन ६९१
येत्—'एष खलु राजा मामुत्पाटच भवत्सु कर्म करिष्यति । बुध्यध्वम्, अहं वः श्रेयानभ्यवपत्तुम्' इति ।
(१) मध्यमस्य प्रहिणुयादुदासीनस्य वा पुनः । यथासन्नस्य मोक्षार्थं सर्वस्वेन तदर्पणम् ॥
इति आबलीयसे द्वादशेऽधिकरणे सेनामुख्यवधः मण्डलप्रोत्साहनं चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितोः सप्तत्रिंशदुत्तरशततमः ।
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ही यह राजा मेरा उच्छेद कर के तुम्हारा भी उच्छेद कर डालेगा । अतः आप लोग विचार करें और समझें कि इस आपत्ति में आपको मेरी रक्षा करनी चाहिए या नहीं ।'
(१) दुर्बल राजा को चाहिए कि बलवान् शत्रु से अपनी रक्षा के लिए वह मध्यम, उदासीन और अपने समीपस्थ सभी राजाओं को यह संदेश भेजे कि 'सर्वस्व देकर मैं आप लोगों के सामने आत्मसमर्पण कर चुका हूँ । मैं आप लोगों के आश्रय से अलग नहीं हो सकता हूँ । अतः यथाशक्ति आप लोगों को मेरी रक्षा करनी चाहिए ।'
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में सेनामुख्यवध-मण्डलप्रोत्साहन नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १६६-१६७ | शस्त्राग्निरसप्रणिधयः, वीवधासार-प्रसारवधश्च |
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| अध्याय ४ |
(१) ये चास्य दुर्गेषु वैदेहकव्यञ्जनाः, ग्रामेषु गृहपतिकव्यञ्जनाः, जनपदसन्धिषु गोरक्षकतापसव्यञ्जनाः, ते सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धानां पण्यागारपूर्वं प्रेषयेयुः—'अयं देशो हार्य' इति । आगतांश्चैषां दुर्गे गूढपुरुषा-नर्थमानाभ्याम् अभिसत्कृत्य प्रकृतिच्छिद्राणि प्रदर्शयेयुः । तेषु तैः सह प्रहरेयुः । (२) स्कन्धावारे वास्य शौण्डिकव्यञ्जनः पुत्रमभित्यक्तं स्थापयित्वा अवस्कन्दकाले रसेन प्रवासयित्वा 'नैषेचनिकम्' इति मदनरसयुक्तान् मद्य-कुम्भाञ्छतशः प्रयच्छेत् । शुद्धं वा मद्यं पाद्यं वा मद्यं दद्यादेकमहः, उत्तरं रससिद्धं प्रयच्छेत् । शुद्धं वा मद्यं दण्डमुख्येभ्यः प्रदाय मदकाले रससिद्धं प्रयच्छेत् ।
शस्त्र, अग्नि तथा रसों का गूढ प्रयोग, और वीवध, आसार तथा प्रसार का नाश
(१) शत्रु राजा के दुर्गों में जो वैदेहक, गाँवों में जो गृहपतिक, सरहदी इलाकों में जो ग्वाले और तापस आदि के वेष विजिगीषु के गुप्तचर नियुक्त हों, उन्हें चाहिए कि वे शत्रु के साथ स्वभावतः ही वैर रखने वाले सामंत, आटविक, शत्रु के बन्धु-बान्धव और नजरबंद राजकुमार आंदि हों, कुछ भेंट सामग्री रख कर, उनके पास यह संदेश भेजें कि 'शत्रु के अमुक दुर्बल प्रदेश का आप लोग सहज ही में अपहरण कर सकते हैं।' इस बात के लिए उद्यत होकर जब उन सामंत आदि के गुप्तचर आ जायँ तो उनका धन-मान से सत्कार करके तब उनके सामने शत्रु राजा के प्रकृतिवर्ग के समस्त दोषों को खोल कर रखा जाय । जब शत्रु के सभी दोष उनको ज्ञात हो जायँ तो उनकी सहायता प्राप्त कर शत्रु पर आक्रमण किया जाय ।
(२) अथवा शत्रु की छावनी में शराब बेंचने वाले सभी गुप्तचर किसी वध्य पुरुष को अपना पुत्र बताकर रात्रि के अंतिम प्रहर में विष देकर उसकी हत्या कर डालें और तब अपने मृतक पुत्र के निमित्त 'यह नैषेचनिक द्रव्य है' ऐसा कह कर विषमिश्रित शराब के सैकड़ों घड़े फौजियों को पिला दे, अथवा विश्वास के लिए पहिले दिन विषरहित ही शराब दे, अथवा पहिले दिन चौथाई हिस्सा विषमिश्रित शराब दे और बाद में पर्याप्त विषमिश्रित शराब पिलाये अथवा सेना के अध्यक्षों
प्र० १६६-१६७ : अ० ४] शस्त्राग्निरसप्रणिधि ६९३
(१) दण्डमुख्यव्यञ्जनो वा 'पुत्रमभित्यक्तम्' इति-समानम् ।
(२) पक्वमांसिकौदनिकशौण्डिकापूपिकव्यञ्जना वा पण्यविशेषमव-घोषयित्वा परस्परसङ्घर्षेण कालिकं समर्घतरमिति वा परानाहूय रसेन स्वपण्यान्युपचारयेयुः ।
(३) सुराक्षीरदधिसर्पिस्तैलानि वा तद्व्यवहर्तृहस्तेषु गृहीत्वा स्त्रियो बालाश्च रसयुक्तेषु स्वभाजनेषु परिकिरेयुः, 'अनेनार्घेण विशिष्टं वा भूयो दीयताम्' इति तत्रैवावकिरेयुः ।
(४) एतान्येव वैदेहकव्यञ्जनाः पण्यविक्रयेणाहर्तारो वा हस्त्यश्वानां विधायवसेषु रसमासन्ना दद्युः ।
(५) कर्मकरव्यञ्जना वा रसाक्तं यवसमुदकं वा विक्रीणीरन् । चिर-संसृष्टा वा गोवाणिजका गवामजावीनां वा यूथान्यवस्कन्दकालेषु परेषां मोहस्थानेषु प्रमुञ्चेयुः । अश्वखरोष्ट्रमहिषादीनां दुष्टांश्च तद्व्यञ्जना वा
को पहिले विषरहित शराब दे और वाद में जब वे बेहोश हो जायें तब उन्हें विष-मिश्रित शराब दे ।
( १ ) अथवा सेनामुख्य के वेष में सभी गुप्तचर किसी वध्य पुरुष को अपना पुत्र बताकर बाकी कार्य उपर्युक्त विधि से संपन्न करे ।
( २ ) अथवा पका मांस, पका अन्न, शराब तथा विविध व्यंजन और मालपुआ या पकौड़े आदि बेचने के वेष में सभी गुप्तचर एक-दूसरे से होड़ लगाकर अपनी-अपनी दूकानों की खूब तारीफ कर कम-ज्यादे मूल्य पर अथवा उधार ही शत्रु के आदमियों को विष मिले पदार्थ खिला दें ।
( ३ ) स्त्री तथा बालक शराब, दूध, घी, दही तथा तेल आदि का व्यवहार करने वाले लोगों के हाथ से लेकर इन वस्तुओं को अपने जहरीले वर्तनों में डलवा दें और वाद में उनके साथ यह झगड़ा करें कि 'अमुक वस्तु हमें इतने मूल्य पर दो, नहीं तो हम खरीदा हुआ सामान भी लौटा देंगे ।' जब दुकानदार इस बात पर राजी न हों तो उन, शराब, दूध आदि वस्तुओं को उन्हीं दुकानदारों के वर्तनों में उलट दें, ऐसा करने से सभी चीजें जहरीली हो जायँगी ।
( ४ ) फिर छावनी के साथ व्यापारी वेष में रहने वाले गुप्तचर या शराब बेचने के बहाने दूसरे लोग इन्हीं सब जहरीली वस्तुओं को हाथो घोड़ों के राशन में मिलाकर उन्हें खिला दें ।
( ५ ) अथवा मजदूर के वेष में रहने वाले गुप्तचर विषमिश्रित घास अथवा जल बेचें, अथवा बहुत समय से मित्र बनकर रहने वाले गुप्तचर अपने गाय, बकरी के समूहों को मध्य रात्रि में मोहग्रस्त ( निद्राग्रस्त ) शत्रुओं को व्याकुल करने के लिए छोड़ दें । इसी प्रकार व्यापारी वेष में रहने वाले गुप्तचर अपने घोड़ा, गधा, ऊँट
| ६९४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ बारहवां अधिकरण |
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चुचुन्दरीशोणिताक्ताक्षान्, लुब्धकव्यञ्जना वा व्यालमृगान् पञ्जरेभ्यः प्रमुञ्चेयुः, सर्पग्राहा वा सर्पानुग्रविषान्, हस्तिजीविनो वा हस्तिनः । (१) अग्निजीविनो वा अग्निमवसृजेयुः । (२) गूढपुरुषा वा विमुखान् पत्त्यश्वरथद्विपमुख्यानभिहन्युः, आदीपये- युर्वा मुख्यावासान् । दूष्यामित्राटविकव्यञ्जनाः प्रणिहिताः पृष्ठाभिघात- मवस्कन्दप्रतिग्रहं वा कुर्युः । वनगूढा वा प्रत्यन्तस्कन्धमुपनिष्कृष्याभिहन्युः । (३) एकायने वीवधासारप्रसारान् वा । ससङ्केतं वा रात्रियुद्धे भूरितूर्य- माहत्य ब्रूयुः—'अनुप्रविष्टाः स्मो, लब्धं राज्यम्' इति । राजावासमनु- प्रविष्टा वा सङ्कुलेषु राजानं हन्युः । (४) सर्वतो वा प्रयातमेनं म्लेच्छाटविकदण्डचारिणः सत्रापाश्रयाः स्तम्भवटापाश्रया वा हन्युः । लुब्धकव्यञ्जना वावस्कन्दसङ्कुलेषु गूढयुद्ध- हेतुभिरभिहन्युः ।
तथा गाय, भैंस आदि चौंकने वाले जानवरों की आँखों में छछून्दर के खून का अञ्जन लगाकर छोड़ दें; इसी प्रकार शिकारी के वेष में रहने वाले गुप्तचर अपने हिंसक जानवरों को छोड़ दें; संपेरों के वेष में रहने वाले गुप्तचर अपने जहरीले साँपों को; और हाथियों के व्यापारी गुप्तचर अपने हाथियों को छोड़ दें ।
( १ ) इसी प्रकार रसोइये, लुहार आदि, जो गुप्तचर आग से अपनी जीविका चलाते हों, वे शत्रु की छावनी में आग लगा दें ।
( २ ) गुप्तचरों को चाहिए कि वे युद्ध से विमुख हुए पैदल, घुड़सवार, रथसवार तथा हाथीसवार सेनाओं के अध्यक्षों को मार डालें; अथवा उनके घरों में आग लगा दें; अथवा दूष्य, शत्रु या आटविक के वेष में रहने वाले गुप्तचर युद्ध से लौटी हुई सेना के पीछे से धावा बोल दें; अथवा सोते समय उसको नष्ट कर दें; अथवा उसका मुकाबला करें; अथवा बन में छिप कर रहने वाले गुप्तचर सरहदी इलाकों की सुरक्षा के लिए नियुक्त सेना को किसी बहाने अपनी ओर खींच कर मार डालें ।
( ३ ) जिस समय वीवध ( धान्य ), आसार ( मित्रसेना ) और प्रसार ( लकड़ी घास ) आदि को किसी तंग रास्ते से ले जाया जा रहा हो उस समय उसे नष्ट कर दिया जाय; अथवा रात्रि युद्ध में विशेष संकेतों के साथ बाजों को खूब जोर से बजाते हुए इस प्रकार की घोषणा की जाय कि 'हम लोग शत्रु दल को चीर कर भीतर प्रविष्ट हो गये हैं; हमने राज्य को प्राप्त कर लिया है' इत्यादि । अथवा राजा के घर में प्रविष्ट होकर उसको मार दिया जाय ।
( ४ ) जिस ओर से भी राजा भागे, वहीं से सत्र तथा स्तम्भवट को लेकर सैनिक के वेष में घूमने वाले म्लेच्छ और आटविक उसको मार डालें, अथवा शिकारी
प्र० १६६-१६७ : अ० ४ ] शस्त्राग्निरसप्रधिणि ६९५
(१) एकायने वा शैलस्तम्भवटखञ्जनान्तरुदके वा स्वभूमिबलेना-भिहन्युः । नदीसरस्तटाकसेतुबन्धभेदवेगेन वाप्लावयेयुः । धान्वनवननिम्न-दुर्गस्थं वा योगाग्निधूमाभ्यां नाशयेयुः ।
(२) सङ्कटगतमग्निना, धान्वनगतं धूमेन, निधानगतं रसेन, तोयाव-गाढं दुष्टग्राहैरुदकचरणैर्वा तीक्ष्णाः साधयेयुः ।
(३) आदीप्तावासात् निष्पतन्तं वा—
योगवामनयोगाभ्यां योगेनान्यतमेन वा ।
अमित्रमतिसन्दध्यात् सक्तमुक्तासु भूमिषु ॥
इति आवलीयसे द्वादशेऽधिकरणे शस्त्राग्निरसप्रणिधयो वीवधासारप्रसार-वधश्चेति चतुर्थोऽध्यायः, आदितोऽष्टत्रिंशदधिकशततमः ।
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के वेष में रहने वाले गुप्तचर रात में इकट्ठा सोते समय कूटयुद्ध प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से शत्रुओं को मार डालें ।
( १ ) अथवा पहाड़ी रास्ते से या ऊबड़-खाबड़, दलदल तथा जल से गुजरती हुई शत्रुसेना को नष्ट किया जाय; अथवा यथावसर नदी, झील तथा बड़े-बड़े तालाबों के बाँधों को तोड़ कर शत्रुसेना को उसमें बहा दिया जाय, अथवा धान्वनदुर्ग, वनदुर्ग तथा निम्नदुर्ग में ठहरे हुए शत्रुदल को योगाग्नि ( विशेष द्रव्यों के योग से उत्पन्न कपट अग्नि ) और योगधूम ( विषैली गैस ) के द्वारा नष्ट किया जाय ।
( २ ) कंटकाकीर्ण तथा दुर्गम प्रदेश में प्रविष्ट हुई शत्रुसेना को अग्नि के द्वारा, धान्वन दुर्ग में ठहरे शत्रुदल को विशेष गैस द्वारा; गुप्तप्रदेश में छिपे हुए शत्रुओं को विष के द्वारा; जल के भीतर छिपे हुए शत्रु को भयंकर मगरमच्छ आदि जल-जन्तुओं के द्वारा अथवा जल में जाने योग्य अन्य साधनों के द्वारा तीक्ष्ण गुप्तचर उनको कैद कर लें या नष्ट कर दें ।
( ३ ) अथवा आग लगे हुए घर से भागते हुए राजा को तथा अपनी रक्षा के लिए धान्वन आदि स्थानों में ठहरे हुए शत्रु को योगवामन और योग के द्वारा अथवा केवल योग के द्वारा वश में किया जाय ।
आवलीयस नामक बारहवें अधिकरण में शस्त्राग्निरसप्रणिधि-
वीवधासारप्रसारवध नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १६८-१७० | योगातिसन्धानं दण्डातिसन्धानम्, |
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| अध्याय ५ | एकविजयश्च |
(१) दैवतेज्यायां यात्रायाममित्रस्य बहूनि पूज्यागमस्थानानि भक्तितः। तत्रास्य योगमुब्जयेत्। (२) देवतागृहप्रविष्टस्योपरि यन्त्रमोक्षणेन गूढभित्तिं शिलां वा पातयेत्। शिलाशस्त्रवर्षमुत्तमागारात्कपाटमवपातितं वा भित्तिप्रणिहितमेकदेशबन्धं वा परिघं मोक्षयेत्। देवतादेहस्थप्रहरणानि वास्योपरिष्टात्पातयेत्। स्थानासनगमनभूमिषु वास्य गोमयप्रदेहेन गन्धोदकावसेकेन वा रसमतिचारयेत् पुष्पचूर्णोपहारेण वा। गन्धप्रतिच्छन्नं वास्य तीक्ष्णं धूममतिनयेत्। शूलकूपमवपातनं वा शयनासनस्याधस्ताद् यन्त्रबद्धतलमेनं कील-
कपट उपायों या दण्ड प्रयोगों द्वारा और आक्रमण के द्वारा विजयोपलब्धि
(१) देवपूजन अथवा देवयात्रा के ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब कि शत्रु राजा अपनी भक्ति के अनुसार पूजा के लिए वहाँ आता-जाता है; ऐसे ही अवसरों पर कूट उपायों द्वारा उसके विनाश का यत्न करना चाहिए।
(२) जब शत्रुराजा देवगृह के अन्दर प्रविष्ट हो तब उसके ऊपर यन्त्र को छोड़ कर गूढभित्ति और शिला को गिरा दिया जाय; अथवा मकान की छत से उसके ऊपर पत्थरों तथा हथियारों की वर्षा की जाय; या किवाड़ों को उखाड़ कर उस पर फेंक दिया जाय; अथवा दीवार से छिपे हुए तथा एक ओर से बँधे हुए अर्गला को ही उस पर गिराया जाय; या देवता की देह पर बँधे हुए हथियार उस पर गिरा दिये जायँ; अथवा उसके ठहरने, उठने तथा बैठने के स्थानों में विषमिश्रित गोबर का लेप किया जाय; या देवता के प्रसाद के रूप में उसे विष मिली फूलों की बुकनी दी जाय; अथवा विष की गन्ध को मारने वाली तीव्र गैस उसको सुँघायी जाय; अथवा उसके सोने या बैठने के स्थान के नीचे एक छिपे हुए गढे में तेज शलाकाएँ गाड़कर उसके ऊपर शत्रु राजा की चारपाई या कुर्सी आदि को यन्त्र के द्वारा अधर पर बाँध दिया जाय और जब वह उस पर सोये या बैठे तब उस यन्त्रकील को खींच कर चारपाई या कुर्सी समेत उसको गढे में डाल दिया जाय; अथवा यदि शत्रु अपने निकटस्थ देश का हो तो अपने कार्य में बाधा डालने वाले उसके जनपदवासियों को