कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 780, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १६८-१७० | योगातिसन्धानं दण्डातिसन्धानम्, |
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| अध्याय ५ | एकविजयश्च |
(१) दैवतेज्यायां यात्रायाममित्रस्य बहूनि पूज्यागमस्थानानि भक्तितः। तत्रास्य योगमुब्जयेत्। (२) देवतागृहप्रविष्टस्योपरि यन्त्रमोक्षणेन गूढभित्तिं शिलां वा पातयेत्। शिलाशस्त्रवर्षमुत्तमागारात्कपाटमवपातितं वा भित्तिप्रणिहितमेकदेशबन्धं वा परिघं मोक्षयेत्। देवतादेहस्थप्रहरणानि वास्योपरिष्टात्पातयेत्। स्थानासनगमनभूमिषु वास्य गोमयप्रदेहेन गन्धोदकावसेकेन वा रसमतिचारयेत् पुष्पचूर्णोपहारेण वा। गन्धप्रतिच्छन्नं वास्य तीक्ष्णं धूममतिनयेत्। शूलकूपमवपातनं वा शयनासनस्याधस्ताद् यन्त्रबद्धतलमेनं कील-
कपट उपायों या दण्ड प्रयोगों द्वारा और आक्रमण के द्वारा विजयोपलब्धि
(१) देवपूजन अथवा देवयात्रा के ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब कि शत्रु राजा अपनी भक्ति के अनुसार पूजा के लिए वहाँ आता-जाता है; ऐसे ही अवसरों पर कूट उपायों द्वारा उसके विनाश का यत्न करना चाहिए।
(२) जब शत्रुराजा देवगृह के अन्दर प्रविष्ट हो तब उसके ऊपर यन्त्र को छोड़ कर गूढभित्ति और शिला को गिरा दिया जाय; अथवा मकान की छत से उसके ऊपर पत्थरों तथा हथियारों की वर्षा की जाय; या किवाड़ों को उखाड़ कर उस पर फेंक दिया जाय; अथवा दीवार से छिपे हुए तथा एक ओर से बँधे हुए अर्गला को ही उस पर गिराया जाय; या देवता की देह पर बँधे हुए हथियार उस पर गिरा दिये जायँ; अथवा उसके ठहरने, उठने तथा बैठने के स्थानों में विषमिश्रित गोबर का लेप किया जाय; या देवता के प्रसाद के रूप में उसे विष मिली फूलों की बुकनी दी जाय; अथवा विष की गन्ध को मारने वाली तीव्र गैस उसको सुँघायी जाय; अथवा उसके सोने या बैठने के स्थान के नीचे एक छिपे हुए गढे में तेज शलाकाएँ गाड़कर उसके ऊपर शत्रु राजा की चारपाई या कुर्सी आदि को यन्त्र के द्वारा अधर पर बाँध दिया जाय और जब वह उस पर सोये या बैठे तब उस यन्त्रकील को खींच कर चारपाई या कुर्सी समेत उसको गढे में डाल दिया जाय; अथवा यदि शत्रु अपने निकटस्थ देश का हो तो अपने कार्य में बाधा डालने वाले उसके जनपदवासियों को