कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १६६-१६७ : अ० ४ ] शस्त्राग्निरसप्रधिणि ६९५
(१) एकायने वा शैलस्तम्भवटखञ्जनान्तरुदके वा स्वभूमिबलेना-भिहन्युः । नदीसरस्तटाकसेतुबन्धभेदवेगेन वाप्लावयेयुः । धान्वनवननिम्न-दुर्गस्थं वा योगाग्निधूमाभ्यां नाशयेयुः ।
(२) सङ्कटगतमग्निना, धान्वनगतं धूमेन, निधानगतं रसेन, तोयाव-गाढं दुष्टग्राहैरुदकचरणैर्वा तीक्ष्णाः साधयेयुः ।
(३) आदीप्तावासात् निष्पतन्तं वा—
योगवामनयोगाभ्यां योगेनान्यतमेन वा ।
अमित्रमतिसन्दध्यात् सक्तमुक्तासु भूमिषु ॥
इति आवलीयसे द्वादशेऽधिकरणे शस्त्राग्निरसप्रणिधयो वीवधासारप्रसार-वधश्चेति चतुर्थोऽध्यायः, आदितोऽष्टत्रिंशदधिकशततमः ।
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के वेष में रहने वाले गुप्तचर रात में इकट्ठा सोते समय कूटयुद्ध प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से शत्रुओं को मार डालें ।
( १ ) अथवा पहाड़ी रास्ते से या ऊबड़-खाबड़, दलदल तथा जल से गुजरती हुई शत्रुसेना को नष्ट किया जाय; अथवा यथावसर नदी, झील तथा बड़े-बड़े तालाबों के बाँधों को तोड़ कर शत्रुसेना को उसमें बहा दिया जाय, अथवा धान्वनदुर्ग, वनदुर्ग तथा निम्नदुर्ग में ठहरे हुए शत्रुदल को योगाग्नि ( विशेष द्रव्यों के योग से उत्पन्न कपट अग्नि ) और योगधूम ( विषैली गैस ) के द्वारा नष्ट किया जाय ।
( २ ) कंटकाकीर्ण तथा दुर्गम प्रदेश में प्रविष्ट हुई शत्रुसेना को अग्नि के द्वारा, धान्वन दुर्ग में ठहरे शत्रुदल को विशेष गैस द्वारा; गुप्तप्रदेश में छिपे हुए शत्रुओं को विष के द्वारा; जल के भीतर छिपे हुए शत्रु को भयंकर मगरमच्छ आदि जल-जन्तुओं के द्वारा अथवा जल में जाने योग्य अन्य साधनों के द्वारा तीक्ष्ण गुप्तचर उनको कैद कर लें या नष्ट कर दें ।
( ३ ) अथवा आग लगे हुए घर से भागते हुए राजा को तथा अपनी रक्षा के लिए धान्वन आदि स्थानों में ठहरे हुए शत्रु को योगवामन और योग के द्वारा अथवा केवल योग के द्वारा वश में किया जाय ।
आवलीयस नामक बारहवें अधिकरण में शस्त्राग्निरसप्रणिधि-
वीवधासारप्रसारवध नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
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