कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्र० १६६-१६७ : अ० ४ ] शस्त्राग्निरसप्रधिणि ६९५
(१) एकायने वा शैलस्तम्भवटखञ्जनान्तरुदके वा स्वभूमिबलेना-भिहन्युः । नदीसरस्तटाकसेतुबन्धभेदवेगेन वाप्लावयेयुः । धान्वनवननिम्न-दुर्गस्थं वा योगाग्निधूमाभ्यां नाशयेयुः ।
(२) सङ्कटगतमग्निना, धान्वनगतं धूमेन, निधानगतं रसेन, तोयाव-गाढं दुष्टग्राहैरुदकचरणैर्वा तीक्ष्णाः साधयेयुः ।
(३) आदीप्तावासात् निष्पतन्तं वा—
योगवामनयोगाभ्यां योगेनान्यतमेन वा ।
अमित्रमतिसन्दध्यात् सक्तमुक्तासु भूमिषु ॥
इति आवलीयसे द्वादशेऽधिकरणे शस्त्राग्निरसप्रणिधयो वीवधासारप्रसार-वधश्चेति चतुर्थोऽध्यायः, आदितोऽष्टत्रिंशदधिकशततमः ।
—: ० :—
के वेष में रहने वाले गुप्तचर रात में इकट्ठा सोते समय कूटयुद्ध प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से शत्रुओं को मार डालें ।
( १ ) अथवा पहाड़ी रास्ते से या ऊबड़-खाबड़, दलदल तथा जल से गुजरती हुई शत्रुसेना को नष्ट किया जाय; अथवा यथावसर नदी, झील तथा बड़े-बड़े तालाबों के बाँधों को तोड़ कर शत्रुसेना को उसमें बहा दिया जाय, अथवा धान्वनदुर्ग, वनदुर्ग तथा निम्नदुर्ग में ठहरे हुए शत्रुदल को योगाग्नि ( विशेष द्रव्यों के योग से उत्पन्न कपट अग्नि ) और योगधूम ( विषैली गैस ) के द्वारा नष्ट किया जाय ।
( २ ) कंटकाकीर्ण तथा दुर्गम प्रदेश में प्रविष्ट हुई शत्रुसेना को अग्नि के द्वारा, धान्वन दुर्ग में ठहरे शत्रुदल को विशेष गैस द्वारा; गुप्तप्रदेश में छिपे हुए शत्रुओं को विष के द्वारा; जल के भीतर छिपे हुए शत्रु को भयंकर मगरमच्छ आदि जल-जन्तुओं के द्वारा अथवा जल में जाने योग्य अन्य साधनों के द्वारा तीक्ष्ण गुप्तचर उनको कैद कर लें या नष्ट कर दें ।
( ३ ) अथवा आग लगे हुए घर से भागते हुए राजा को तथा अपनी रक्षा के लिए धान्वन आदि स्थानों में ठहरे हुए शत्रु को योगवामन और योग के द्वारा अथवा केवल योग के द्वारा वश में किया जाय ।
आवलीयस नामक बारहवें अधिकरण में शस्त्राग्निरसप्रणिधि-
वीवधासारप्रसारवध नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण १६८-१७० | योगातिसन्धानं दण्डातिसन्धानम्, |
|---|---|
| अध्याय ५ | एकविजयश्च |
(१) दैवतेज्यायां यात्रायाममित्रस्य बहूनि पूज्यागमस्थानानि भक्तितः। तत्रास्य योगमुब्जयेत्। (२) देवतागृहप्रविष्टस्योपरि यन्त्रमोक्षणेन गूढभित्तिं शिलां वा पातयेत्। शिलाशस्त्रवर्षमुत्तमागारात्कपाटमवपातितं वा भित्तिप्रणिहितमेकदेशबन्धं वा परिघं मोक्षयेत्। देवतादेहस्थप्रहरणानि वास्योपरिष्टात्पातयेत्। स्थानासनगमनभूमिषु वास्य गोमयप्रदेहेन गन्धोदकावसेकेन वा रसमतिचारयेत् पुष्पचूर्णोपहारेण वा। गन्धप्रतिच्छन्नं वास्य तीक्ष्णं धूममतिनयेत्। शूलकूपमवपातनं वा शयनासनस्याधस्ताद् यन्त्रबद्धतलमेनं कील-
कपट उपायों या दण्ड प्रयोगों द्वारा और आक्रमण के द्वारा विजयोपलब्धि
(१) देवपूजन अथवा देवयात्रा के ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब कि शत्रु राजा अपनी भक्ति के अनुसार पूजा के लिए वहाँ आता-जाता है; ऐसे ही अवसरों पर कूट उपायों द्वारा उसके विनाश का यत्न करना चाहिए।
(२) जब शत्रुराजा देवगृह के अन्दर प्रविष्ट हो तब उसके ऊपर यन्त्र को छोड़ कर गूढभित्ति और शिला को गिरा दिया जाय; अथवा मकान की छत से उसके ऊपर पत्थरों तथा हथियारों की वर्षा की जाय; या किवाड़ों को उखाड़ कर उस पर फेंक दिया जाय; अथवा दीवार से छिपे हुए तथा एक ओर से बँधे हुए अर्गला को ही उस पर गिराया जाय; या देवता की देह पर बँधे हुए हथियार उस पर गिरा दिये जायँ; अथवा उसके ठहरने, उठने तथा बैठने के स्थानों में विषमिश्रित गोबर का लेप किया जाय; या देवता के प्रसाद के रूप में उसे विष मिली फूलों की बुकनी दी जाय; अथवा विष की गन्ध को मारने वाली तीव्र गैस उसको सुँघायी जाय; अथवा उसके सोने या बैठने के स्थान के नीचे एक छिपे हुए गढे में तेज शलाकाएँ गाड़कर उसके ऊपर शत्रु राजा की चारपाई या कुर्सी आदि को यन्त्र के द्वारा अधर पर बाँध दिया जाय और जब वह उस पर सोये या बैठे तब उस यन्त्रकील को खींच कर चारपाई या कुर्सी समेत उसको गढे में डाल दिया जाय; अथवा यदि शत्रु अपने निकटस्थ देश का हो तो अपने कार्य में बाधा डालने वाले उसके जनपदवासियों को
प्र० १६८-१७० : अ० ५] योग-दण्डादि द्वारा विजय ६९७
मोक्षणेन प्रवेशयेत् । प्रत्यासन्ने वामित्रे जनपदाज्जनमवरोधक्षममतिनयेत् । दुर्गाच्चानवरोधक्षममपनयेत् । प्रत्यादेयममिविषयं वा प्रेषयेत् । जनपदं चैकस्थं शैलवननदीदुर्गेष्वटवीव्यवहितेषु वा पुत्रभ्रातृपरिगृहीतं स्थापयेत् । (१) उपरोधहेतवो दण्डोपनतवृत्ते व्याख्याताः । (२) तृणकाष्ठम् आ योजनाद् दाहयेत् । उदकानि च दूषयेद्; अवास्त्रावयेच्च । कूटकूपावपातकण्टकिनीश्च बहिरुब्जयेत् । (३) सुरुङ्गाममित्रस्थाने बहुमुखीं कृत्वा विचयमुख्यानभिहारयेद्, अमित्रं वा । परप्रयुक्तायां वा सुरुङ्गायां परिखामुदकान्तिकीं खानयेत्, कूपशालामनुसालं वा । अतोयकुम्भान् कांस्यभाण्डानि वा शङ्कास्थानेषु स्थापयेत् खाताभिज्ञानार्थम् । ज्ञाते सुरुङ्गापथे प्रतिसुरुङ्गां कारयेत् । मध्ये भित्त्वा धूममुदकं वा प्रयच्छेत् ।
पकड़ कर जेल में बन्द कर दिया जाय; और बाधा पहुँचाने में असमर्थ शत्रु की जेल में बन्द हुए व्यक्तियों को छुड़ा दिया जाय । शत्रुदेश के ऐसे व्यक्ति को, जिसे अवश्यमेव लौटाना पड़े, स्वयं ही शत्रु देश को भेज दिया जाय । जिन जनपदों पर शत्रु राजा का एकच्छत्र राज्य हो वहाँ के पर्वतदुर्गों, नदीदुर्गों और वनदुर्गों को तथा घने जंगलों से घिरे दूसरे प्रदेशों को शत्रु राजा के पुत्र या बन्धुओं के अधिकार में करा देना चाहिए ।
( १ ) उपरोध ( घेरा डालना ) के उपायों का निरूपण दण्डोपनत नामक प्रकरण में यथास्थान किया जा चुका है ।
( २ ) शत्रु के सैनिक पड़ाव के चारों ओर चार कोस तक की सब घास, लकड़ी आदि जला देनी चाहिए और पानी को विष मिला कर दूषित कर देना चाहिए । उस स्थान के आस-पास के जितने तालाब या बाँध हैं उनको तोड़कर सब पानी बाहर बहा देना चाहिए और शत्रु सेना के मार्ग में अँधेरे कुंए, घास-फूस से ढके गड्ढे तथा जगह-जगह काँटेदार लोहे के जाल बिछा देने चाहिए ।
( ३ ) शत्रु के सैन्य शिविर में एक बहुमुखी सुरंग बनाकर शत्रु के प्रधान व्यक्तियों को उसमें फँसा देना चाहिए; अथवा अवसर आने पर शत्रु राजा को भी उसी में फँसा देना चाहिए । यदि विजिगीषु के दुर्ग में आने के लिए शत्रु सुरंग बनाये तो दुर्ग के चारों ओर इतनी गहरी खाई खुदवानी चाहिए कि नीचे का पानी निकल आवे । यदि ऐसा करने में अधिक असुविधा हो तो परकोटे के चारों ओर गहरे-गहरे कुएँ खुदवाये जायें । अथवा जिन स्थानों में सुरंग बनाये जाने की आशंका हो वहाँ खाली घड़ों को या काँसे के छोटे-छोटे खंभों या काँसे के टुकड़ों को रख दिया जाय; जिससे कि सुरंग खोदने का पता लग जाय । शत्रु की सुरंग का पता लग जाने पर दूसरी
६९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
६९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) प्रतिविहितदुर्गो वा मूले दायादं कृत्वा प्रतिलोमामस्य दिशं गच्छेत्–यतो वा मित्रैर्बन्धुभिराटविकैर्वा संसृज्येत, परस्यामित्रैर्दूष्यैर्वा महद्भिः; यतो वा गतोऽस्य मित्रैर्वियोगं कुर्यात्, पाष्णिं वा गृह्णीयात्, राज्यं वास्य हारयेत्, वीवधासारप्रसारान् वा वारयेत्; यतो वा शक्नुयाद् आक्षिकवदपक्षेपेणास्य प्रहर्तुं; यतो वा स्वं राज्यं त्रायेत, मूलस्योपचयं वा कुर्यात्। यतः सन्धिमभिप्रेतं लभते, ततो वा गच्छेत्। (२) सहप्रस्थायिनो वास्य प्रेषयेयुः–‘अयं ते शत्रुरस्माकं हस्तगतः; पण्यं विप्रकारं वापदिश्य हिरण्यमन्तस्सारबलं प्रेषयस्व, एनमर्पयेम बद्धं प्रवासितं वा' इति। प्रतिपन्ने हिरण्यं सारबलं चाददीत। (३) अन्तपालो वा दुर्गसम्प्रदानेन बलैकदेशमतिनीय विश्वस्तं घातयेत्।
सुरंग खुदवा देनी चाहिए अथवा उसको बीच ही में तोड़ कर उसमें विषैला धुआँ या पानी भर देना चाहिए।
(१) अथवा पूरी शक्ति लगा देने पर भी यदि दुर्ग की रक्षा असम्भव जान पड़े तो दुर्बल राजा को चाहिए कि राजधानी में अपने पुत्र को नियुक्त करके वह शत्रु की ऐसी प्रतिकूल दिशा में चला जाय, जहाँ से वह शत्रु का अपकार कर सके; अथवा जिस दिशा में जाकर वह अपने मित्रों, बन्धु-बांधवों और आटविकों की सहायता लेकर शत्रु की हानि कर सके, अथवा शत्रु के शत्रु और अत्यन्त बलवान् उसके दूष्य पुरुषों से मिलकर शत्रु का नुकसान कर सके; अथवा जहाँ जाकर शत्रु के मित्रों को उससे अलग करवा सके; अथवा शत्रु पर पीछे से आक्रमण कर सके; अथवा शत्रु के राज्य का अपहरण कर सके; अथवा जहाँ जाकर शत्रु के वीवध, आसार और प्रसार को शत्रु के पास तक न पहुँचने दे; अथवा जिस दिशा से वह जुआरी की तरह कपट प्रयोगों के द्वारा शत्रु पर प्रहार कर सके; अथवा जहाँ जाकर वह अपने राज्य की सुरक्षा का प्रबन्ध कर सके; अथवा अपनी राजधानी को समृद्ध बना सके; अथवा जहाँ से उसको इच्छानुसार सन्धि करने का अवसर मिल सके, उस दिशा में चला जाय।
(२) अथवा दुर्बल राजा के साथ-साथ जाने वाले गुप्तचर शत्रु के पास इस प्रकार का संदेश भेजें: 'यह तुम्हारा शत्रु इस समय हमारे कब्जे में है, इसलिए तुम किसी सौदे के बहाने धन भेजकर और किसी अपकार के बहाने अन्तःसार सेना को हमारे पास भेज दो। उसके बाद कैद किये या मारे गये इस शत्रु को हम तुम्हारे हवाले कर देंगे।' जब शत्रु राजा इस बात पर राजी होकर धन और सेना भेज दें तो दुर्बल राजा उसको अपने अधीन कर ले।
(३) अथवा अन्तपाल को चाहिए कि वह अपना दुर्ग शत्रु के सुपुर्द करके उसकी
प्र० : १६८-१७० अ० ५ ] योग-दण्डादि द्वारा विजय ६९९
(१) जनपदमेकस्थं वा घातयितुममित्रानीकमावाहयेत्; तदवरुद्धदेशमतिनीय विश्वस्तं घातयेत् ।
(२) मित्रव्यञ्जनो वा बाह्यस्य प्रेषयेत्—‘क्षीणमस्मिन्दु दुर्गे धान्यं स्नेहाः क्षारो लवणं वा; तदमुष्मिन्देशे काले च प्रवेक्ष्यति, तदुपगृहाण’ इति । ततो रसविद्धं धान्यं स्नेहं क्षारं लवणं वा दूष्यामित्राटविकाः प्रवेशयेयुः, अन्ये वा अभित्यक्ताः ।
(३) तेन सर्वभाण्डवीवधग्रहणं व्याख्यातम् ।
(४) सन्धि वा कृत्वा हिरण्यैकदेशमस्मै दद्यात् । विलम्बमानः शेषम् । ततो रक्षाविधानान्यपस्रावयेत्, अग्निरसशस्त्रैर्वा प्रहरेत्, हिरण्यप्रतिग्राहिणो वास्य वल्लभाननुगृह्णीयात् ।
(५) परिक्षीणो वास्मै दुर्गं दत्त्वा निर्गच्छेत्सुरुङ्गया । कुक्षिप्रदरेण वा प्राकारभेदेन निर्गच्छेत् ।
सेना के कुछ भाग को ऐसी जगह ले जाय, जहां से उसका लौटना असम्भव हो और विश्वासघात कर उसे वहीं मरवा डाले ।
( १ ) अथवा किसी एकत्र हुए उच्छृङ्खल जनपद को काबू में करने के लिए अन्तपाल शत्रुसेना को बुलाये और उसके बाद उस सेना को ऐसे देश में ले जाय, जहाँ से वह वापस न लौट सके; वहाँ ले जाकर उसको मरवा डाले ।
( २ ) अथवा मित्र के वेष में रहने वाले सभी गुप्तचर शत्रुराजा के पास इस प्रकार का सन्देश भिजवायें : शत्रु के इस दुर्ग में अन्न, घी, तेल, गुड़ तथा नमक आदि सब पदार्थ समाप्त हो चुके हैं । यह सब सामान अमुक स्थान से अमुक समय में ले जाया जायेगा । तुम उसको रास्ते में ही लूट लेना ।' तदनन्तर विजिगीषु के दूष्य, शत्रु तथा आटविक विषमिश्रित उक्त सामान को उसी समय उन्हीं मार्गों से लेकर गुजरें अथवा दूसरे वध्य पुरुष उस सामान को ले जायँ ।
( ३ ) इसी प्रकार दूसरे विषयुक्त खाद्यपदार्थों को शत्रु राजा तक पहुँचाने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।
( ४ ) अथवा दुर्बल राजा, शत्रु राजा के साथ सन्धि करके प्रतिज्ञात धन का कुछ हिस्सा तत्काल ही उसे दे दे और शेष भाग को विलम्ब से देने का वादा कर, उसे भी ठीक समय पर अदा कर दे । इस प्रकार जब शत्रु का उस पर विश्वास हो जाय तो अपनी रक्षा के लिए चारों ओर तैनात शत्रुसेना को वह हटा ले और स्वतन्त्र होकर विष, अग्नि तथा शस्त्रों द्वारा शत्रु पर प्रहार करे; अथवा काबू में आने वाले शत्रु के अवरुद्ध बन्धु-बांधवों को धन देकर उन्हीं के द्वारा शत्रु को मरवा दे ।
( ५ ) अथवा यदि दुर्बल राजा शत्रु का प्रतीकार करने में सर्वथा असमर्थ हो तो
७०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
७०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) रात्राववस्कन्दं दत्त्वा सिद्धस्तिष्ठेत्, असिद्धः पार्श्वेनापगच्छेत्, पाषण्डच्छद्मना मन्दपरिवारो निर्गच्छेत्, प्रेतव्यञ्जनो वा गूढैर्निर्ह्रियेत, स्त्रीवेषधारी वा प्रेतमनुगच्छेत् । (२) दैवतोपहारश्राद्धप्रवहणेषु वा रसविद्धमन्नपानमवसृज्य कृतोपजापो दूष्यव्यञ्जनैर्निष्पत्य गूढसैन्योऽभिहन्यात् । (३) एवं गृहीतदुर्गो वा प्राश्यप्राशं चैत्यमुपस्थाप्य दैवतप्रतिमाच्छिद्रं प्रविश्यासीत, गूढभित्तिं वा दैवतप्रतिमायुक्तं भूमिगृहम् । विस्मृते सुरुङ्गया रात्रौ राजावासमनुप्रविश्य सुप्तममित्रं हन्यात् । यन्त्रविश्लेषणं वा विश्लेष्याधस्तादवपातयेत् । रसाग्नियोगेनावलिप्तं गृहं जतुगृहं वाधिशयानममित्रमादीपयेत् । (४) प्रमदवनविहाराणामन्यतमे वा विहारस्थाने प्रमत्तं भूमिगृहसुरुङ्गागूढभित्तिप्रविष्टास्तीक्ष्णा हन्युः, गूढप्रणिहिता वा रसेन । स्वपतो वा निरुद्धे देशे गूढाः स्त्रियः सर्परसाग्निधूमानुपरि मुञ्चेयुः ।
अपना दुर्ग वह शत्रु को देकर सुरंग के रास्ते बाहर निकल जाय; अथवा सुरंग न होने पर जहाँ से परकोटे की दीवार कच्ची हो उसको तोड़ कर बाहर निकल जाय ।
( १ ) रात में सोते समय शत्रु के ऊपर छापा मारने में यदि कार्यसिद्धि सम्भव हो तो दुर्बल राजा अपने दुर्ग में डटा रहे और यदि ऐसी आशा न हो तो पास से होकर निकल भागे । बाहर निकलने के लिए उसको चाहिए कि पाषण्डी का वेष बनाकर थोड़ा-सा परिवार साथ लेकर अथवा अर्थी पर रखकर गुप्तचरों के द्वारा या स्त्री का वेष धारण कर किसी मृतक की अर्थी के पीछे—इन तरीकों से वह बाहर निकल जाय ।
( २ ) देवबलि ( दैवतोपहार ), श्राद्ध तथा पार्टियों (प्रवहण) आदि के अवसरों पर शत्रु को विषाक्त अन्नादि देकर; या दूष्य गुप्तचरों द्वारा शत्रुपक्ष का उपजाप करके छिपी हुई सेना को लेकर दुर्बल राजा अपने शत्रु पर धावा बोल दे ।
( ३ ) इस प्रकार शत्रु के द्वारा अपना दुर्ग ले लिये जाने पर विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह पर्याप्त खाद्यसामग्री रखकर किसी देवालय की प्रतिमा में छेद करके उसके भीतर घुस कर बैठ जाय; अथवा किसी दीवार पर छेद करके वहाँ बैठ जाय; या किसी देवप्रतिमा से युक्त तहखाने ( भूमिगृह ) में बैठ जाय । जब शत्रु राजा, विजिगीषु को सर्वथा नष्ट हुआ जानकर सर्वथा भुला दे तब सुरंग के द्वारा रात में राजा के शयनागार में प्रविष्ट होकर वह राजा को मार डाले; अथवा शयनागार में लगे यन्त्र को ढीला करके उसको राजा के ऊपर गिरा दे; अथवा अग्निरक्षित घर में या लाख के घर में सोते हुए शत्रु राजा को मार डाले ।
( ४ ) अथवा प्रमदवन और विहार में या केवल विहार में मदविह्वल शत्रु राजा
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में योगातिसन्धान-
प्र० १६८-१७० : अ० ५ ] योग-दण्डादि द्वारा विजय ७०१
(१) प्रत्युत्पन्ने वा कारणे यद्यदुपपद्येत तत्तदमित्रेऽन्तःपुरगते गूढसञ्चारः प्रयुञ्जीत, ततो गूढमेवापगच्छेत्, स्वजनसंज्ञां च प्ररूपयेत् । (२) द्वाःस्थान् वर्षवरांश्चान्यान् निगूढोपहितान् परे । तूर्यसंज्ञाभिराहूय द्विषच्छेषाणि घातयेत् ॥
इति आबलीयसे द्वादशेऽधिकरणे योगातिसन्धानं दण्डातिसन्धानम् एकविजयश्चेति पञ्चमोऽध्यायः, आदित एकोनचत्वारि- शदधिकशततमोऽध्यायः । समाप्तमिदमाबलीयसं नाम द्वादशमधिकरणम् ।
—: ० :—
को सुरंगों या तहखानों में छिपे हुए गुप्तचर मार डालें; अथवा छिपकर रहने वाले रसोइया तथा मांस बनाने वाले गुप्तचर विष देकर शत्रु को मार डालें; या किसी निषिद्ध एकान्त में सोते हुए राजा के ऊपर गुप्त वेषधारी स्त्री, सर्प, विष या अग्नि का प्रयोग कर उसको मार डाले ।
( १ ) अथवा समयानुसार जैसे कारण उपस्थित हों उन्हीं के अनुकूल उपायों द्वारा विजिगीषु अन्तःपुर में गये हुए शत्रु राजा को छिपकर मार डाले और छिपकर ही बाहर निकल आवे । अपने छिपे हुए व्यक्तियों को वह इशारों से उक्त अभिप्राय को समझा दे ।
( २ ) द्वारपाल, नपुंसक तथा अन्तःपुर आदि के अन्य गुप्तचर वेषधारी कर्मचारियों को तथा शत्रु के ऊपर छिपे तौर पर नियुक्त दूसरे गुप्तचरों को बाजे आदि के विशेष संकेतों द्वारा बुलाकर शत्रु के बाकी आदमियों को भी मार डाला जाय ।
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में योगातिसन्धान- दण्डातिसन्धान-एकविजय नामक पांचवां अध्याय समाप्त ।
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इस पृष्ठ पर छपा हुआ पाठ अत्यधिक धुंधला और अस्पष्ट (illegible/faded) होने के कारण पढ़ने योग्य नहीं है।
तेरहवाँ अधिकरण
तेरहवाँ अधिकरण
दुर्गलम्भोपाय
| प्रकरण १७१ | उपजापः |
|---|---|
| अध्याय १ |
(१) विजिगीषु परग्राममवाप्तुकामः सर्वज्ञदैवतसंयोगख्यापनाभ्यां स्वपक्षमुद्धर्षयेत्, परपक्षं चोद्वेजयेत् । (२) सर्वज्ञख्यापनं तु-गृहगुह्यप्रवृत्तिज्ञानेन प्रत्यादेशो मुख्यानां, कण्टक-शोधनापसर्पागमेन प्रकाशनं राजद्विष्टकारिणां, विज्ञाप्योपायनख्यापनम-दृष्टसंसर्गविद्यासंज्ञादिभिः, विदेशप्रवृत्तिज्ञानं तदहरेव गृहकपोतेन मुद्रा-संयुक्तेन । (३) दैवतसंयोगख्यापनं तु-सुरुङ्गामुखेनाग्निचैत्यदैवतप्रतिमाच्छिद्रानु-प्रविष्टैरग्निचैत्यदैवतव्यञ्जनैः सम्भाषणं पूजनं च, उदकादुत्थितैर्वा नाग-वरुणव्यञ्जनैः सम्भाषा पूजनं च, रात्रावन्तरुदके समुद्रवालुकाकोशं प्रणि-
उपजाप
(१) यदि विजिगीषु राजा अपने शत्रु के गाँव या शहर पर अधिकार करने का इच्छुक हो तो उसे चाहिए कि वह स्वयं को सर्वज्ञ तथा देवता का साक्षात्कार करने वाला प्रसिद्ध करके अपने पक्ष को उत्साहित करे और शत्रुपक्ष में बेचैनी फैला दे ।
(२) सर्वज्ञता की प्रसिद्धि के तरीके : अपनी सर्वज्ञता का प्रचार-प्रसार करने के लिये विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने गुप्तचरों द्वारा, प्रमुख व्यक्तियों के घरों में छिपे तौर पर होने वाले बुरे कार्यों का पता लगाकर, उन प्रमुख व्यक्तियों को ऐसे कार्य करने से वर्जित करे । कण्टक शोधन अधिकरण में निर्दिष्ट अपसर्पोपदेश के द्वारा अपने शत्रुओं के गुप्त-भेदों को जानकर उन्हें उनके सामने प्रकट करे और ऐसा करने से उन लोगों को रोके । दूसरे लोगों से अज्ञात संसर्ग विद्या (नाचना, गाना) के संकेतों द्वारा अथवा गुप्तचरों से पता लगाकर राजा के लिए भेंटस्वरूप आने वाली वस्तुओं को वह पहिले ही बतला दे । विदेश में घटित होने वाली घटना को वह मुद्रायुक्त कपोत के द्वारा अपने घर पर बैठा ही बतला दे ।
(३) दैवसाक्षात्कार की प्रसिद्धि के तरीके : अपने दैव-साक्षात्कार के प्रचार-प्रसार के लिए विजिगीषु को चाहिए कि सुरंग के द्वारा आग के बीच में तथा देवताओं की पोली प्रतिमाओं के बीच में और समाधि (चैत्य) के बीच में गुप्तचरों को भेजकर राजा उनसे बातचीत करे एवं उनका पूजन करे; अथवा पानी से निकले
४५ कौ०
| ७०६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तेरहवां अधिकरण |
|---|
धायाग्निमालादर्शनम्, शिलाशिक्यावगृहीते प्लवके स्थानम्, उदकबस्तिना जरायुणा वा शिरोऽवगूढनासः पृषतान्त्रकुलीरनक्रशिशुमारोद्भवसाभिर्वा शतपाकं तैलं नस्तः प्रयोगः तेन रात्रिगणशश्चरति इत्युदकचरणानि, तैर्वरुणनागकन्यावाक्यक्रिया सम्भाषणं च, कोपस्थानेषु मुखादग्निधूमोत्सर्गः । (१) तदस्य स्वविषये कार्तान्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकपौराणिकैक्षणिकगूढपुरुषाः साचिव्यकरास्तद्दर्शिनश्च प्रकाशयेयुः । परस्य विषये दैवतदर्शनं दिव्यकोशदण्डोत्पत्तिं च अस्य ब्रूयुः । दैवतप्रश्ननिमित्तवायसाङ्गविद्यास्वप्नमृगपक्षिव्याहारेषु चास्य विजयं ब्रूयुः, विपरीतममित्रस्य सदुन्दुभिमुल्कां च परस्य नक्षत्रे दर्शयेयुः ।
नागदेव तथा वरुण के वेष में रहने वाले गुप्तचर से बातचीत करे और उनकी पूजा भी करे । रात में मजबूत एवं जिनके भीतर पानी प्रवेश न कर सके, ऐसी पेटियों में रेता भर कर उनको पानी में छिपा दिया जाय और फिर उसके द्वारा पानी में आग लगाकर दिखाया जाय । रस्सियों में पत्थर बांध कर उनको नाव के नीचे से पानी में लटका दिया जाय, जिससे कि तेज धारा में नाव स्थिर खड़ी रह जाय । उदकबस्ती ( वाटरप्रूफ कपड़ा ) अथवा जरायु ( गर्भाशय के समान बनी हुई चमड़े की थैली ) से शिर और नासिका ढककर, साँभर की आंत ( पृषतान्त्र ), केंकडा ( कुलीर ), मगर ( नक्र ), शिरस नामक मछली ( शिशुमार ) और ऊद ( उद्भ ) नाम की मछली की चर्बी के साथ तेल को सौ बार पका कर उसका जो घोल तैयार हो उसको नाक में डाल दिया जाय । ऐसा करने से रात में झुंड के झुंड पुरुष जल में संतरण कर सकते हैं । जल में तैरते हुए वे पुरुष वरुण या नाग की कन्याओं जैसी आवाज निकालें और राजा उनके साथ बातचीत करे । क्रोधावेश प्रकट करते समय राजा औषधियों के द्वारा अपने मुँह से आग और धुआँ उगले ।
( १ ) राजा की उक्त आश्चर्यमयी बातों को उसके सहायक तथा दैवज्ञ ( कार्तान्तिक ), शुभाशुभ फल को बताने वाले ( नैमित्तिक ), ज्योतिषी ( मौहूर्तिक ), कथा-वाचक ( पौराणिक ), प्रश्नवक्ता ( ईक्षणिक ) और गुप्तपुरुष सर्वत्र प्रचारित करें । शत्रुदेश में भी ये लोग राजा के दैव-साक्षात्कार तथा स्वेच्छया दिव्यकोष एवं दिव्य सेना को पैदा कर देने की सनसनीपूर्ण खबर फैला दें । दैवतप्रश्न ( भाग्यप्रश्न ), शकुन ( निमित्त ), काकविद्या ( वायसविद्या ), अंग को देखकर फलाफल का निर्देश ( अंगविद्या ), स्वप्न, पशु-पक्षी आदि सभी निमित्तों से राजा की विजय को सूचित किया जाय और उल्कापात आदि को दिखाकर यह प्रसिद्धि करें कि शत्रु का कोई बड़ा अनिष्ट होने वाला है ।
प्र० १७१ : अ० १ ] उपजाप ७०७
(१) परस्य मुख्यान्मित्रत्वेनापदिशन्तो दूतव्यञ्जनाः स्वामिसत्कारं ब्रूयुः । स्वपक्षबलाधानं परपक्षप्रतिघातं च तुल्ययोगक्षेमममात्यानामायुधीयानां च कथयेयुः । येषु व्यसनाभ्युदयावेक्षणमपत्यपूजनं प्रयुञ्जीत ।
(२) तेन परपक्षमुत्साहयेद्यथोक्तं पुरस्तात् । भूयश्च वक्ष्यामः—साधारणगर्दभेन दक्षान्, लकुटशाखाहननाभ्यां दण्डचारिणः, कुलैडकेन चोद्विग्नान्, अशनिवर्षेण विमानितान्, विदुलेनावकेशिना वायसपिण्डेन कैतवजमेघेन वा विहताशान्, दुर्भगालङ्कारेण द्वेषिणेति पूजाफलान्, व्याघ्रचर्मणा मृत्युकूटेन चोपहितान्, पीलुविखादनेन करकयोष्ट्र्या गर्दभीक्षीराभिमन्थनेनेति ध्रुवापकारिण इति ।
(१) शत्रुमुख्यों के साथ मित्ररूप में रहने वाले गुप्तचर उनके सामने अपने स्वामी के द्वारा प्राप्त अपने आदर-सत्कार की खूब बड़ाई करें । शत्रु-प्रकृति तथा शत्रु-सेना के सामने वे गुप्तचर अपने पक्ष की सेना की उन्नति और शत्रुपक्ष की सेना के ह्रास अथवा दोनों के समान योगक्षेम की चर्चा करें । अमात्यों और सैनिकों के सामने वे कहें कि उनका राजा विपत्ति के समय अपने अनुचरों की पूरी सहायता करता है तथा अभ्युदय के समय दान, मान, संमान से सबको खुश करता है । किसी भी अधीनस्थ कर्मचारी के मर जाने पर उसके पुत्रों को सत्कृत करता है ।
(२) उक्त सभी कारणों का बखान कर शत्रु के अधीनस्थ कर्मचारियों को उससे भिन्न कर दिया जाय । शत्रुपक्ष में भेद डालने के लिए कुछ उपायों का वर्णन पीछे कर दिया गया है और कुछ विशेष उपाय इस प्रकार हैं : कार्यपटु एवं कर्मठ व्यक्तियों से यह कह दिया जाय कि राजा ने तुमको बिल्कुल गधा बना दिया है । इसी प्रकार सैनिकों से कहा जाय कि राजा ने उन्हें लठैत बना रखा है । शत्रु राजा से भयभीत कर्मचारियों को कहा जाय कि उन्हें झुंड से बिछड़े हुए या जीवन से निराश एक मेढ़े या बकरे की तरह बना दिया है । तिरस्कृत व्यक्तियों को कहा जाय कि किस प्रकार उन्होंने इतने वज्रपात के समान अपमान को चुपचाप पी लिया है । सर्वथा निराश व्यक्तियों को फलहीन बेंत, अखाद्य अन्नपिण्ड या न बरसने वाले बादल की उपमा देकर स्वामी राजा के विरोध में उकसाया जाय । ससंमान आभूषण आदि देकर पुरस्कृत व्यक्तियों से कहा जाय कि व्यभिचारिणी स्त्री को गहना पहनाने से क्या लाभ ? शत्रु द्वारा ठगे गये व्यक्तियों को मृत्यु स्थान; बनावटी व्याघ्र जैसे राजा का उदाहरण दिया जाय । शत्रु के निकटवर्ती सदा ही अपकार करने वाले व्यक्तियों को कहा जाय कि उन्हें तो पीलु वृक्ष का फल खिलाकर, ओले दिखाकर, ऊँटनी तथा गदही का दूध मथने का काम दिया गया है ।
७०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
(१) प्रतिपन्नान् अर्थमानाभ्यां योजयेत् । द्रव्यभक्तच्छिद्रेषु चैनान् द्रव्यभक्तदानैरनुगृह्णीयात् । अप्रतिगृह्णतां स्त्रीकुमारालङ्कारानभिहरेयुः । (२) दुर्भिक्षस्तेनाटव्युपघातेषु च पौरजानपदानुत्साहयन्तः सत्रिणो ब्रूयुः—'राजानमनुग्रहं याचामहे, निरनुग्रहाः परत्र गच्छामः' इति । (३) तथेति प्रतिपन्नेषु द्रव्यधान्यपरिग्रहैः । साचिव्यं कार्यमित्येतदुपजापादद्भुतं महत् ॥
इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे उपजापो नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितश्चत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
—: ० :—
( १ ) जो लोग उकसाने में आकर शत्रु राजा का विरोध करने लगें उन्हें अच्छी तरह सत्कृत किया जाय और उन पर धन-अन्न का संकट आने पर उनकी पूरी सहायता की जाय । यदि वे लोग गौरव नष्ट होने के विचार से इस प्रकार अन्न-धन की सहायता लेना मंजूर न करें तो उनके स्त्री-पुत्रों के लिए आभूषण बना कर भेज दिये जायें ।
( २ ) दुर्भिक्ष के समय चोर और आटविकों की लूट-मार की दशा में गुप्तचर शत्रु राजा के ग्रामवासियों; नगरवासियों तथा जनपदवासियों को उत्साहित करते हुए कहें कि 'हम लोग राजा से सहायता की याचना करें । यदि राजा हमारी सहायता नहीं करता है तो हम लोगों को दूसरे राजा के आश्रय में चला जाना चाहिए ।' इस प्रकार शत्रु देश की प्रजा को राजा से भिन्न किया जाय ।
( ३ ) जब शत्रु देश की प्रजा गुप्तचरों की बात से राजी हो जाय तो विजिगीषु राजा को चाहिये कि धन, धान्य और निवास की सुविधा देकर उनकी सहायता करें । शत्रुपक्ष को शत्रु से भिन्न करने का यह अद्भुत उपाय है ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में उपजाप नामक प्रथम अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण १७२ | ## योगवामनम् |
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| अध्याय २ |
(१) मुण्डो जटिलो वा पर्वतगुहावासी चतुर्वर्षशतायुर्ब्रुवाणः प्रभूतजटिलान्तेवासी नगराभ्याशे तिष्ठेत् । शिष्याश्चास्य मूलफलोपगमनैरमात्यान् राजानं च भगवद्दर्शनाय योजयेयुः । समागतश्च राज्ञा पूर्वराजदेशाभिज्ञानानि कथयेत्—‘शते शते च वर्षाणां पूर्णेऽहमग्निं प्रविश्य पुनर्बालो भवामि, तदिह भवत्समीपे चतुर्थमग्निं प्रवेक्ष्यामि । अवश्यं मे भवान्मानयितव्यः, त्रीन् वरान् वृणीष्व’ इति । प्रतिपन्नं ब्रूयात्—‘सप्तरात्रमिह सपुत्रदारेण प्रेक्षाप्रहवणपूर्वं वस्तव्यम्’ इति । वसन्तमवस्कन्देत ।
(२) मुण्डो वा जटिलो वा स्थानिकव्यञ्जनः प्रभूतजटिलान्तेवासी बस्तशोणितदिग्धां वेणुशलाकां सुवर्णचूर्णेनावलिप्य वल्मीके निदध्यादुपजिह्विकानुसरणार्थं, स्वर्णनालिकां वा । ततः सत्री राज्ञः कथयेत्—‘असौ सिद्धः
कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना
( १ ) मुण्डित या जटाधारी साधु के वेश में पहाड़ की गुफा में अपने अनेक शिष्यों सहित रहने वाले गुप्तचर अपनी आयु को चार सौ वर्ष की बताकर नगर के समीप डेरा डालें । वे शिष्य लोग राजा तथा उसके अमात्यों को कन्द, मूल, फल लेकर उस भगवत्स्वरूप सिद्ध पुरुष के दर्शन करने के लिए उत्साहित करें । जब राजा उसके दर्शनार्थ जाये तब वह साधुवेशधारी गुप्तचर प्राचीन राजाओं और देशों के संबंध में अनेक बातें बताये तथा कहे ‘मैं सौ वर्ष बीत जाने पर अग्नि में प्रवेश करके फिर बालक बन जाता हूँ । अब यहाँ पर आपके सामने चौथी बार अग्नि में प्रवेश करूँगा । कुछ वरदान देकर मैं आपको संमानित करना चाहता हूँ । अपने इच्छानुसार आप मुझसे तीन वर माँग सकते हैं ।’ यदि राजा इन बातों को मान ले तो आगे कहें ‘आप अपने स्त्री-पुत्रों सहित सात रात्रि तक खेल-तमाशा कराते हुए तथा उत्सव मनाते हुए यहाँ मेरे आश्रम पर निवास करें ।’ जब वह राजा सपरिवार वहाँ रहने लगे तो सोते समय चुपके से उसको मार दिया जाय ।
( २ ) अथवा मुंडित या जटाधारी के वेश में अनेक शिष्यों सहित किसी स्थान में रहने वाला मठाधीश गुप्तचर बकरे के खून से सनी तथा स्वर्ण चूर्ण से लिपटी, या सुवर्ण युक्त एक बाँस की नली को जंगल में जाकर पहिचान के लिए किसी बाँबी में रख दे । वह बाँस की नली ऐसे स्थान पर रख दी जाय जिससे सांप आसानी से
| ७१० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तेरहवां अधिकरण |
|---|
पुष्पितं निधिं जानाति' इति । स राज्ञा पृष्टः 'तथा' इति ब्रूयात् । तच्चाभिज्ञानं दर्शयेत् । भूयो वा हिरण्यमन्तराधाय ब्रूयाच्चैनम्-'नागरक्षितोऽयं निधिः प्रणिपातसाध्यः इति । प्रतिपन्नं ब्रूयात्-'सप्तरात्रम्' इति समानम् । (१) स्थानिकव्यञ्जनं वा रात्रौ तेजनानिग्नयुक्तमेकान्ते तिष्ठन्तं सत्रिणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयुः-'असौ सिद्धः सामैधिकः' इति । तं राजा यमर्थं याचेत, तमस्य करिष्यमाणः 'सप्तरात्रम्' इति समानम् । (२) सिद्धव्यञ्जनो वा राजानं जम्भकविद्याभिः प्रलोभयेत् । 'तं राजा' इति समानम् । (३) सिद्धव्यञ्जनो वा देशदेवतामभ्यर्हितामाश्रित्य प्रहवणैरभीक्ष्णं प्रकृतिमुख्यानभिसंवास्य क्रमेण राजानमतिसन्दध्यात् । (४) जटिलव्यञ्जनमन्तरुदकवासिनं वा सर्वश्वेतं तटसुरुङ्गाभूमिगृहापसरणं वरुणं नागराजं वा सत्रिणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयुः । 'तं राजा' इति समानम् ।
भीतर-बाहर आ-जा सके। तदनंतर सत्री गुप्तचर राजा से जाकर कहे 'अमुक सिद्ध पुरुष जमीन में गड़े हुए खजाने को बता सकता है।' राजा के पूछने पर अपनी अभिज्ञता को स्वीकार कर ले और तत्संबंधी कुछ चिह्न भी बताये। अथवा वहाँ और भी धन गाड़कर राजा से कहे कि 'यह खजाना साँपों से सुरक्षित है। इसलिए इसको बड़ी तजवीज से ही प्राप्त किया जा सकता है।' जब राजा, सिद्ध को बातों को मान ले तब उससे कहे 'आपको सात रात तक सपरिवार मेरे समीप रहना होगा।' तदनन्तर सोते समय रात में उसको मार डाला जाय।
(१) अथवा रात्रि के एकांत में अपने शरीर को अग्नि के समान प्रज्वलित कर बैठे हुए उस सिद्ध महात्मा को सत्री गुप्तचर राजा को दिखायें तथा राजा से कहें कि 'यह सिद्ध पुरुष भावी समृद्धि को बता सकता है।' तदनंतर राजा उस सिद्ध पुरुष से जिस समृद्धि की याचना करे उसको भविष्य में पूरा कर देने का वायदा कर राजा को सात रात्रि तक सपरिवार आश्रम में रहने के लिए कहा जाय और फिर पूर्ववत् उसको मार डाला जाय।
(२) अथवा सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर राजा को कपट विद्याओं से प्रलोभन में फँसाकर पूर्ववत् मार डाले।
(३) अथवा सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर किसी प्रसिद्ध देवता के मंदिर में रहकर निरंतर सहभोज और उत्सव के द्वारा राजा की अमात्यप्रकृति को अपने वश में करके उस प्रकृतिवर्ग के ही द्वारा राजा को मरवा डाले।
(४) इसी प्रकार मुण्डित या जटाधारी गुप्तचर उदकचरी विद्याओं के
प्र० १७२ : अ० २ ] योगवामन ७११
(१) जनपदान्तेवासी सिद्धव्यञ्जनो वा राजानं शत्रुदर्शनाय योजयेत् । प्रतिपन्नं बिम्बं कृत्वा शत्रुमावाहयित्वा निरुद्धे देशे घातयेत् । (२) अश्वपण्योपयाता वैदेहकव्यञ्जनाः पण्योपायननिमित्तमाहूय राजानं पण्यपरीक्षायामासक्तमश्वव्यतिकीर्णं वा हन्युः, अश्वैश्च प्रहरेयुः । (३) नगराभ्याशे वा चैत्यमारुह्य रात्रौ तीक्ष्णाः कुम्भेषु नालीन् वा विदलानि धमन्तः-‘स्वामिनो मुख्यानां वा मांसानि भक्षयिष्यामः, पूजा नो वर्तताम्’ इत्यव्यक्तं ब्रूयुः । तदेषां नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः ख्यापयेयुः । (४) मङ्गल्ये वा ह्रदे तटाकमध्ये वा रात्रौ तेजनतैलाभ्यक्ता नागरूपिणः शक्तिमुसलान्ययोमयानि निष्पेषयन्तस्तथैव ब्रूयुः । ऋक्षचर्मकञ्चुकिनो वा अग्निधूमोत्सर्गयुक्ता रक्षोरूपं वहन्तस्त्रिरपसव्यं नगरं कुर्वाणाः श्वशृगाल-
द्वारा अपने आप को जल के भीतर छिपा कर अपने स्वरूप को स्वच्छ, श्वेत एवं दिव्य, देवता के रूप की तरह बना लें । फिर सत्री गुप्तचर उसको वरुण देवता या नागराज कहकर उसका प्रचार करे । जब राजा उस पर विश्वास कर अपनी मनो-कामना पूर्ण करने की याचना करे तो उसे पूर्ववत् मार डाला जाय ।
( १ ) अथवा जनपद की सीमा में रहने वाला सिद्धवेष गुप्तचर वहाँ के राजा को शत्रु राजा से मिला देने का प्रपंच रचे । जब राजा इस पर राजी हो जाय तो पूर्व निर्धारित सांकेतिक चिह्नों के द्वारा शत्रु राजा को वहाँ बुलाकर फिर उस फँसाये गये राजा को एकांत में मार दिया जाय ।
( २ ) घोड़ों के व्यापारी गुप्तचर अच्छे-अच्छे घोड़ों को लेकर शत्रु राज्य में जायें और सौदे के बहाने शत्रु को अपने पास बुलायें । जब राजा घोड़ों की परीक्षा कर ले या घोड़ों से घिर जाय तब उसको मार दिया जाय और उन्हीं घोड़ों पर सवार होकर उसकी राजधानी पर हमला बोल दिया जाय ।
( ३ ) अथवा नगर के समीपस्थ किसी समाधि या श्मशान में खड़े वृक्ष पर चढ़ कर सत्री गुप्तचर रात में अव्यक्त रूप से इस प्रकार बोलें 'हम इस राजा के या इसकी मुख्य प्रकृतियों के मांस को अवश्य खायेंगे, हमारी पूजा होनी चाहिए ।' इस इस बात को शकुनवक्ता ( नैमित्तिक ) तथा ज्योतिषी ( मौहूर्तिक ) के वेष में रहने वाले गुप्तचर सर्वत्र प्रकाशित कर दें ।
( ४ ) अथवा किसी मांगलिक गहरे जलाशय में रात के समय वे गुप्तचर नाग का रूप बनाकर तथा शरीर में जलने वाले तेल की मालिश कर हाथ में लोहे की बनी हुई शक्ति और मूसल लेकर उन्हें परस्पर रगड़ते हुए चिल्लायें कि हम राजा और उसके मंत्रियों का मांस खायेंगे; हमारी पूजा होनी चाहिए' । अथवा रीछ की खाल को ओढ़ कर राक्षसों का वेष बनाये मुँह से आग-धुआं उगलते हुए, नगर के
७१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
वाशितान्तरेषु तथैव ब्रूयुः । चैत्यदैवप्रतिमां वा तेजनतैलेनाभ्रपटलच्छन्नेना- ग्निना वा रात्रौ प्रज्वाल्य तथैव ब्रूयुः । तदन्ये ख्यापयेयुः ।
(१) दैवतप्रतिमानाभ्यर्हितानां वा शोणितेन प्रस्रावमतिमात्रं कुर्युः । तदन्ये देवरुधिरसंस्रावे संग्रामे पराजयं ब्रूयुः ।
(२) सन्धिरात्रिषु श्मशानप्रमुखे वा चैत्यमूर्ध्वभक्षितैर्मनुष्यैः प्ररूप- येयुः । ततो रक्षोरूपी मनुष्यकं याचेत । यश्चात्र शूरवादिकोऽन्यतमो वा द्रष्टुमागच्छेत् तमन्त्ये लोहमुसलैर्हन्युः, यथा रक्षोभिर्हत इति ज्ञायेत । तद- द्भुतं राज्ञस्तद्दर्शिनः सत्रणश्च कथयेयुः । ततो नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः शान्ति प्रायश्चित्तं ब्रूयुः—'अन्यथा महदकुशलं राज्ञो देशस्य च' इति । प्रति- पन्नम्—'एतेषु सप्तरात्रमेकैक मन्त्रबलिहोम स्वयं राज्ञा कर्तव्यम्' इति ब्रूयुः । ततः समानम् ।
चारों ओर बाँई ओर से तीन परिक्रमा करते हुए वे गुप्तचर कुत्तों तथा सियारों की भाषा में ऊपर की तरह आवाज लगायें । अथवा जलने वाले तेल ( तेजनतैल ) में अभ्रक मिलाकर उसके बीच में श्मशान के देवता की ढकी हुई मूर्ति को रात में जलाकर वे गुप्त पुरुष राजा तथा उसके मंत्रियों को खा जाने की बात कहें । दूसरे सभी गुप्तचर इन बातों को नगर भर में फैला दें ।
( १ ) अथवा गुप्तचर देवप्रतिमाओं के भीतर से बकरे आदि के खून को इस प्रकार बहाये कि देखने वालों को ऐसा प्रतीत हो कि देवप्रतिमाएँ स्वयं ही खून उगल रही हैं । तदनन्तर गुप्तचर इस अपशकुन को नगर भर में यह कह कर प्रचारित करे कि संग्राम में अवश्य ही राजा की पराजय होगी ।
( २ ) अथवा पूर्णिमा या अमावस की रातों में ऊपर के भाग जिनके खाये गये हैं ऐसे मनुष्यों द्वारा चिता के चिह्नों को दिखाया जाय । तदनन्तर राक्षस बना हुआ कोई गुप्तचर वहीं प्रकट होकर अपने भोजन के लिए एक पुरुष को माँगे । अपने आप को बहादुर कहने वाला जो-कोई भी व्यक्ति वहाँ देखने के लिए आया हो उसको दूसरे सभी गुप्तचर लोहे के मूसलों से मार डालें, जिससे सब लोगों को यही मालूम हो कि अमुक व्यक्ति को राक्षसों ने मार डाला है । इस अद्भुत घटना को देखने वाले लोग तथा गुप्तचर इस बात को राजा तक पहुँचायें । तदनन्तर गुप्तचरों के वेष में रहने वाले नैमित्तिक तथा मौहूर्तिक लोग राजा से शान्ति और प्रायश्चित्त के लिए कहें कि यदि ऐसा न किया गया तो राजा-प्रजा का बड़ा अनिष्ट होगा । जब राजा इस बात को स्वीकार कर ले तो उस दुर्निमित्त शान्ति के लिए राजा को सात रात्रि तक बलि, मंत्र तथा होम करने को राजी कर पूर्ववत् उसका वध किया जाय ।
प्र० १७२ : अ० २] योगवामन ७१३
(१) एतान् वा योगानात्मनि दर्शयित्वा प्रतिकुर्वीत, परेषामुपदेशार्थम् । ततः प्रयोजयेद्योगान् । योगदर्शनप्रतीकारेण वा कोशाभिसंहरणं कुर्यात् । (२) हस्तिकामं वा नागवनपाला हस्तिना लक्षण्येन प्रलोभयेयुः, प्रतिपन्नं गहनमेकायनं वाऽतिनीय घातयेयुः, बद्ध्वा वापहरेयुः । (३) तेन मृगयाकामो व्याख्यातः । (४) द्रव्यस्त्रीलोलुपमाढ्यविधवाभिर्वा परमरूपयौवनाभिः स्त्रीभिर्दायादनिक्षेपार्थमुपनीताभिः सत्रिणः प्रलोभयेयुः । प्रतिपन्नं रात्रौ सत्रिच्छन्नाः समागमे शस्त्ररसाभ्यां घातयेयुः । (५) सिद्धप्रव्रजितचैत्यस्तूपदैवतप्रतिमानाम्भीक्ष्णाभिगमनेषु वा भूमिगृहसुरुङ्गागूढभित्तिप्रविष्टास्तीक्ष्णाः परमभिहन्युः । (६) येषु देशेषु याः प्रेक्षाः प्रेक्षते पार्थिवः स्वयम् । यात्राविहारे रमते यत्र क्रीडति वाम्भसि ॥
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि उक्त सभी योगों को वह स्वयं तथा अपने गुप्तचरों, अपने सहायकों को सिखलाये और तब अपने ऊपर किये जाने वाले इस प्रकार के योगों का प्रतीकार कराये । यथावसर उन प्रयोगों द्वारा शत्रु को अपने वश में करे । अथवा इन्हीं प्रयोगों के द्वारा अपना कोष बढ़ाये ।
( २ ) अथवा विजिगीषु के हस्तिवनों के रक्षक पुरुष अच्छे हाथियों को दिखाकर, हाथी की इच्छा रखने वाले शत्रु राजा को, प्रलोभन दें । जब वह इस बात पर राजी हो जाय तो घने जंगल में ले जाकर उसको मार दिया जाय; अथवा गिरफ्तार कर अपने राजा के पास ले आवें ।
( ३ ) इसी प्रकार शिकार की इच्छा रखने वाले शत्रुराजा के संबंध में भी समझना चाहिए ।
( ४ ) अथवा जो राजा धन तथा स्त्रियों की कामना करता हो उसको सत्री गुप्तचर धनसंपन्न विधवा स्त्रियों के द्वारा या दायभाग तथा अमानत के मुकदमों के बहाने वहाँ लायी गयी अत्यंत रूपवती जवान स्त्रियों के जाल में फँसा दिया जाय । जब राजा उनके काबू में हो जाय तब संयोग के लिए किसी एकांत स्थान को नियुक्त कर, वहाँ रात के समय शस्त्र या विष के द्वारा उस राजा को मार दिया जाय ।
( ५ ) अथवा ऐसे अवसरों पर जबकि राजा किसी सिद्ध पुरुष, किसी उच्च भिक्षु या श्मशान के स्तूप, या देवताओं के दर्शनार्थ बार-बार आये-जाये उस समय सुरंग, भूमिगृह तथा गूढभित्तियों में छिपे हुए गुप्तचर उसको मार डालें ।
( ६ ) शत्रुराजा जिन देशों में नाच, गाना, या तमाशा आदि को देखने जाता हो तथा उत्सवों में शामिल होता हो अथवा जहाँ जलक्रीडा करता हो; अथवा जहाँ
७१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
७१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
चाटूक्तचांदिषु कृत्येषु यज्ञप्रहवणेषु वा ।
सूतिकाप्रेतरोगेषु प्रीतिशोकभयेषु वा ॥
प्रमादं याति यस्मिन्वा विश्वासात्स्वजनोत्सवे ।
यत्रास्यारक्षिसञ्चारो दुर्दिने सङ्कुलेषु वा ॥
विप्रस्थाने प्रदीप्ते वा प्रविष्टे निर्जनेऽपि वा ।
वस्त्राभरणमाल्यानां फेलाभिः शयनासनैः ॥
मद्यभोजनफेलाभिस्तूर्यैर्वाभिहतैः सह ।
प्रहरेयुररींस्तीक्ष्णाः पूर्वप्रणिहितैः सह ॥
(१) यथैव प्रविशेयुश्च द्विषतः सत्रहेतुभिः ।
तथैव चापगच्छेयुरित्युक्तं योगवामनम् ॥
इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे योगवामनं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदित एकचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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पर धिक्कार के योग्य कार्य करता हो, या यज्ञ, उत्सव, सूतिका, मृत्यु, रोग, प्रीति, शोक, भय आदि में प्रसन्न, दुःखी और भयभीत होता हो; अथवा जब किसी सगे-संबंधी के यहाँ उत्सव में सम्मिलित होकर प्रमत्त हो जाता हो, अथवा जहाँ रक्षित पुरुषों के बिना ही जाता-आता हो, अथवा किसी दुर्दिन या भीड़-भिड़ाके के अवसरों पर, अथवा निर्जन स्थान में, अथवा नगर में आग लग जाने पर, या नीरव घने जंगल में शत्रु के प्रविष्ट हो जाने पर—ऐसी स्थितियों में पहिले ही से छिपे हुए गुप्तचर, ज्यों ही इशारे के लिए वस्त्र, आभरण, माला, शयन, आसन, मद्य, भोजन आदि अवसरों पर तूर्यघोष हो, वैसे ही वे धावा बोल दें ।
( १ ) जिस प्रकार सत्री आदि गुप्तचर शत्रुओं के बीच में प्रविष्ट हुए हों, उसी छल से वे बाहर निकल आवें, अन्यथा उनके पकड़े जाने की संभावना हो सकती है । यहाँ तक योगवामन ( कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना ) का निरूपण किया गया ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में योगवामन नामक दूसरा अध्याय समाप्त
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