भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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७१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

वाशितान्तरेषु तथैव ब्रूयुः । चैत्यदैवप्रतिमां वा तेजनतैलेनाभ्रपटलच्छन्नेना- ग्निना वा रात्रौ प्रज्वाल्य तथैव ब्रूयुः । तदन्ये ख्यापयेयुः ।

(१) दैवतप्रतिमानाभ्यर्हितानां वा शोणितेन प्रस्रावमतिमात्रं कुर्युः । तदन्ये देवरुधिरसंस्रावे संग्रामे पराजयं ब्रूयुः ।

(२) सन्धिरात्रिषु श्मशानप्रमुखे वा चैत्यमूर्ध्वभक्षितैर्मनुष्यैः प्ररूप- येयुः । ततो रक्षोरूपी मनुष्यकं याचेत । यश्चात्र शूरवादिकोऽन्यतमो वा द्रष्टुमागच्छेत् तमन्त्ये लोहमुसलैर्हन्युः, यथा रक्षोभिर्हत इति ज्ञायेत । तद- द्भुतं राज्ञस्तद्दर्शिनः सत्रणश्च कथयेयुः । ततो नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः शान्ति प्रायश्चित्तं ब्रूयुः—'अन्यथा महदकुशलं राज्ञो देशस्य च' इति । प्रति- पन्नम्—'एतेषु सप्तरात्रमेकैक मन्त्रबलिहोम स्वयं राज्ञा कर्तव्यम्' इति ब्रूयुः । ततः समानम् ।


चारों ओर बाँई ओर से तीन परिक्रमा करते हुए वे गुप्तचर कुत्तों तथा सियारों की भाषा में ऊपर की तरह आवाज लगायें । अथवा जलने वाले तेल ( तेजनतैल ) में अभ्रक मिलाकर उसके बीच में श्मशान के देवता की ढकी हुई मूर्ति को रात में जलाकर वे गुप्त पुरुष राजा तथा उसके मंत्रियों को खा जाने की बात कहें । दूसरे सभी गुप्तचर इन बातों को नगर भर में फैला दें ।

( १ ) अथवा गुप्तचर देवप्रतिमाओं के भीतर से बकरे आदि के खून को इस प्रकार बहाये कि देखने वालों को ऐसा प्रतीत हो कि देवप्रतिमाएँ स्वयं ही खून उगल रही हैं । तदनन्तर गुप्तचर इस अपशकुन को नगर भर में यह कह कर प्रचारित करे कि संग्राम में अवश्य ही राजा की पराजय होगी ।

( २ ) अथवा पूर्णिमा या अमावस की रातों में ऊपर के भाग जिनके खाये गये हैं ऐसे मनुष्यों द्वारा चिता के चिह्नों को दिखाया जाय । तदनन्तर राक्षस बना हुआ कोई गुप्तचर वहीं प्रकट होकर अपने भोजन के लिए एक पुरुष को माँगे । अपने आप को बहादुर कहने वाला जो-कोई भी व्यक्ति वहाँ देखने के लिए आया हो उसको दूसरे सभी गुप्तचर लोहे के मूसलों से मार डालें, जिससे सब लोगों को यही मालूम हो कि अमुक व्यक्ति को राक्षसों ने मार डाला है । इस अद्भुत घटना को देखने वाले लोग तथा गुप्तचर इस बात को राजा तक पहुँचायें । तदनन्तर गुप्तचरों के वेष में रहने वाले नैमित्तिक तथा मौहूर्तिक लोग राजा से शान्ति और प्रायश्चित्त के लिए कहें कि यदि ऐसा न किया गया तो राजा-प्रजा का बड़ा अनिष्ट होगा । जब राजा इस बात को स्वीकार कर ले तो उस दुर्निमित्त शान्ति के लिए राजा को सात रात्रि तक बलि, मंत्र तथा होम करने को राजी कर पूर्ववत् उसका वध किया जाय ।