भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 794
७१०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ तेरहवां अधिकरण

पुष्पितं निधिं जानाति' इति । स राज्ञा पृष्टः 'तथा' इति ब्रूयात् । तच्चाभिज्ञानं दर्शयेत् । भूयो वा हिरण्यमन्तराधाय ब्रूयाच्चैनम्-'नागरक्षितोऽयं निधिः प्रणिपातसाध्यः इति । प्रतिपन्नं ब्रूयात्-'सप्तरात्रम्' इति समानम् । (१) स्थानिकव्यञ्जनं वा रात्रौ तेजनानिग्नयुक्तमेकान्ते तिष्ठन्तं सत्रिणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयुः-'असौ सिद्धः सामैधिकः' इति । तं राजा यमर्थं याचेत, तमस्य करिष्यमाणः 'सप्तरात्रम्' इति समानम् । (२) सिद्धव्यञ्जनो वा राजानं जम्भकविद्याभिः प्रलोभयेत् । 'तं राजा' इति समानम् । (३) सिद्धव्यञ्जनो वा देशदेवतामभ्यर्हितामाश्रित्य प्रहवणैरभीक्ष्णं प्रकृतिमुख्यानभिसंवास्य क्रमेण राजानमतिसन्दध्यात् । (४) जटिलव्यञ्जनमन्तरुदकवासिनं वा सर्वश्वेतं तटसुरुङ्गाभूमिगृहापसरणं वरुणं नागराजं वा सत्रिणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयुः । 'तं राजा' इति समानम् ।


भीतर-बाहर आ-जा सके। तदनंतर सत्री गुप्तचर राजा से जाकर कहे 'अमुक सिद्ध पुरुष जमीन में गड़े हुए खजाने को बता सकता है।' राजा के पूछने पर अपनी अभिज्ञता को स्वीकार कर ले और तत्संबंधी कुछ चिह्न भी बताये। अथवा वहाँ और भी धन गाड़कर राजा से कहे कि 'यह खजाना साँपों से सुरक्षित है। इसलिए इसको बड़ी तजवीज से ही प्राप्त किया जा सकता है।' जब राजा, सिद्ध को बातों को मान ले तब उससे कहे 'आपको सात रात तक सपरिवार मेरे समीप रहना होगा।' तदनन्तर सोते समय रात में उसको मार डाला जाय।

(१) अथवा रात्रि के एकांत में अपने शरीर को अग्नि के समान प्रज्वलित कर बैठे हुए उस सिद्ध महात्मा को सत्री गुप्तचर राजा को दिखायें तथा राजा से कहें कि 'यह सिद्ध पुरुष भावी समृद्धि को बता सकता है।' तदनंतर राजा उस सिद्ध पुरुष से जिस समृद्धि की याचना करे उसको भविष्य में पूरा कर देने का वायदा कर राजा को सात रात्रि तक सपरिवार आश्रम में रहने के लिए कहा जाय और फिर पूर्ववत् उसको मार डाला जाय।

(२) अथवा सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर राजा को कपट विद्याओं से प्रलोभन में फँसाकर पूर्ववत् मार डाले।

(३) अथवा सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर किसी प्रसिद्ध देवता के मंदिर में रहकर निरंतर सहभोज और उत्सव के द्वारा राजा की अमात्यप्रकृति को अपने वश में करके उस प्रकृतिवर्ग के ही द्वारा राजा को मरवा डाले।

(४) इसी प्रकार मुण्डित या जटाधारी गुप्तचर उदकचरी विद्याओं के